गुरु रविदास जी महाराज और क्रांतिकारी शूरवीर।।

।।गुरु रविदास जी महाराज और क्रांतिकारी शूरवीर।।
गुरु रविदास जी एक क्रान्तिनायक, क्रांतिकारी, और सामाजिक परिवर्तन के मसीहा हुए हैं। उन की वाणी ही उनकी सुरक्षा की ढाल थी और खूनी क्रांति की तलवार थी। गुरु जी ने गुलामी की निजात का एक ही मूल मंत्र बताया था और वह था खूनी क्रान्ति क्योंकि जब तक शोषक को शोषण से हटाने के लिए, आत्मबलिदान देने की हिम्मत, साहस आदमी में नहीं आता है तब तक शोषक गुलाम का शोषण करता ही जाता है, जिसे रोकने के लिए प्यार की तलवार कम ही काम करती है, उसे उस की ही भाषा में जबाब देना पड़ता है, जब खून के बदले खून होता है तब अत्याचारी भयभीत हो जाता है, अत्याचार करने से पूर्व वह लाख बार सोचता है कि कहीं मुकाबला हो गया तो, मुझे भी प्राणों के लाले पड़ सकते हैं। लड़ाई की जड़ केवल धर्म ही बना हुआ है और भविष्य में भी, यही खून कत्लोगारद का कारण बना रहे गा, जिससे मुक्ति केवल खून के बदले खून से ही हो सकती है, जिस के लिए मूल धर्म, आदधर्म के लिए बलिदान देने के लिए शूरवीर बनना अति आवश्यक है। गुरु रविदास जी, स्वामी ईशरदास जी के शब्दों में फरमाते हैं कि :----
                   ।। शब्द पीलो।।
मर जा धर्म दे कारने जिंद जांदी तां जाण दे। बार बार आणा ना इस भव, कहाँ जाएं तेरे हांण दे। धर्म दी खातर पाई शहीदी सो दरगाह मध ना हांण दे। मरना जीवणा इक कर जावण ज्वाल लोध ना मांण दे। रविदास सोई कायर कहावण शब्द गोली तन ना तांण दे।
सिंधुघाटी की सभ्यता के बाद, भारत का श्रमण, सनातन धर्म, यूरेशियन आर्यों ने नेशतनाबूद कर के अपना हिन्दू धर्म प्रचारित कर दिया है जिससे धर्म का वास्तविक स्वरूप ही बर्बाद हो चुका है, इससे पूर्व भी, बुद्ध के नाम से बौद्ध धर्म, ईसा मसीह के नाम पर ईसाई, पैगंबर मुहम्मद के नाम पर इस्लाम स्थापित किये जा चुके हैं जिनसे धर्म को वहुत आघात पहुँचा हुआ है। धर्म तो धर्म ही है, जिसे खण्डित नहीं किया जा सकता है, वह एक ही था, एक ही है और एक ही रहेगा, जिसे आदधर्म ही कहा जाएगा और कहा जाता रहेगा। क्योंकि गुरु रविदास जी ने स्पष्ट कहा है कि:----
आद से परगट भयो, जा को ना कोउ अंत।
आदधर्म रविदास का जाने कोउ विरला सन्त।
गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, आद अर्थात पहला आदमी जिससे संसार की उतपति हुई है, जिस का कोई अंत नहीं है, अर्थात वह आदपुरुष बेअंत, असीम, अनंत,अपरम्पार है। गुरु रविदास जी ने फरमाया है कि, मेरा धर्म केवल आदधर्म ही है, जिसके बारे में सत्य को जानने वाला सन्त बिरला ही है। गुरु जी ने, इसी आदधर्म की रक्षा के लिए, अपना सर्वस्व दांव पर लगा दिया था, खुद भी उन्होंने आदधर्म की रक्षा केलिए, मुल्लों, मौलाना, काजियों, पादरियों, पण्डों, पुजारियों और तिलकधारियों के अनेकों जुल्मों, सितमों, इल्जामों, अत्याचारों को बर्दाश्त किया था, राजे महाराजे, बादशाह उन के प्राणों के प्यासे बने रहे मगर वे लौह पुरूष, इनकी गुंडागर्दी के सामने चट्टानों की तरह अड़े रहे, खड़े रहे, जो उनके सामने अड़े वे झड़े जरूर हैं और उनके समक्ष आत्मसमर्पण करने के लिए विवश हुए थे। गुरु रविदास जी, फरमाते हैं कि धर्म की रक्षा के लिए मर जाओ, तुम्हारी जान भी जाती है तो जाने दो, क्योंकि धर्म ही मॉनवता कि रक्षा का प्रतीक है। धर्म ही इंसानियत का प्रतीक है, धर्म ही सभ्यता का द्योतक है, धर्म ही एकता का साधन है और धर्म ही मानवीय मूल्य पैदा करता है। इसीलिये 
गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, धर्म की रक्षा के लिए अगर मरना पड़े तो मर जाना चाहिए और किसी को मारना भी पड़े तो उसे मार ही देना चाहिए क्योंकि हम बार बार इस धरती पर नहीं आएंगे अर्थात यही जन्म मिला हुआ है जिसमे हमें धर्म के उसूलों के अनुसार ही जीवन जीना चाहिए अन्यथा जीना व्यर्थ है। जिन्होंने धर्म के रक्षार्थ शहीदी का सम्मान प्राप्त किया है, वे इसी धरती रूपी स्वर्ग में सम्मान पाते हैं। जो जीना और भरना एक समान मानते हैं, आग के शोलों को मान्यता नहीं देते हैं। गुरु रविदास फरमाते हैं कि, कायर उन्हीं को कहा जाता है, जो शब्द की गोली के सामने अपने शरीर को तान कर खड़े नहीं होते हैं अर्थात जो धर्म के रक्षार्थ सीने पर गोली खाने से डरते हैं, वे कायर कहलाते हैं। गुरु  जी शूरवीर के लक्षण बताते हुए कहते हैं कि :---
                     ।।शलोक।।
शूरवीर सोई जानिये जो लडूहूँ दल माहें। भन गुरु रविदास जो भाग गया सो तउ शूरा नाहिं। आप मरे जउ मार लये छाडे कबहूँ ना खेत। भन रविदास काटै कर रहै सुचेत। शूरा तिल तिल कट हो जाई निज मरे मन धरे ना शोक। सुन रविदास सो शूरवीर भले कहेंगे लोक। निज मुए तउ मुक्त है, दल काटे तां भी मोख।सुन रविदास सो शूरमा लागे काहू ना दोख। शूरवीर जियूँ तीर चले पापी देवत मार। सुन रविदास वह दल काटे कट हूँ कोट हजार। आपा मारा, मन मरा दल दिल हो के प्रवाह। सुन रविदास संगराम करो हो के बे प्रवाह। शूरवीर तउ शब्द करावन मन हंकार। सुन रविदास दल दलील मंद काटो बे शुमार।
गुरु रविदास जी खूनी भाषा में समझाते हैं कि, शूरवीर उसे ही समझो जो सैन्य दल, फ़ौज के बीच धर्म की रक्षा के लिए, लड़ता है। चाहे खुद मर जाए चाहे दुश्मन का कत्ल कर दे, मगर जीते जी वह रणक्षेत्र से भागता नहीं है, गुरु रविदास जी फरमान करते हैं कि, जब शूरवीर कत्लेआम करता है तब वह बड़ा चौकन्ना रहंता है। वह शूरवीर तिल तिल अर्थात, जिस का अंग अंग कट जाता है, वह अपने शहीद होने पर तनिक भी दुख नहीं मनाता है। गुरु रविदास जी बताते हैं कि, ऐसे शूरवीरों को ही लोग भला कहते हैं,अर्थात ऐसे ही शहीदों का लोग सम्मान करते हैं। शूरवीर धर्म की रक्षा के लिए, खुद मर जाए तो समझो कि मेरी मुक्ति हो गई और दुश्मन के सैन्य दल को मौत के घाट उतार दे तब भी मोक्ष ही प्राप्त होता है। गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, ऐसे शूरवीर को कोई कलंक, दोष नहीं लगता है क्योंकि यही योद्धा का धर्म, यही कर्म होता है। शूरवीर के जब तीर चलते हैं तब दुश्मन सैन्य दल खत्म हो जाता है। गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, ऐसा शूरवीर हजारों, लाखों दुश्मनों को काट देता है, इस प्रकार शूरवीर का अहंकार खत्म हो जाता है और मन को मार कर, दुश्मन की सेना को भी वेपरवाह हो कर मिटा देता है। वीर वहादुरों के ऊपर शब्द भी गर्व करते हैं, ऐसे शूरवीर तर्क पूर्ण ढंग से बेशुमार अर्थात असँख्य दुश्मनों का संहार करते हैं।
गुरु रविदास जी एक शूरवीर योद्धा के लक्षण बताते हुए फरमाते हैं कि, ऐसे योद्धा का दायित्व होता है कि वह निडर और निःसंकोच हो कर अपना कार्य करे क्योंकि उसे यही काम मिला हुआ है, उसे कायर नहीं बनना चाहिए, उसे डट कर दुश्मन का बुरी तरह से संहार करके विजय हासिल करनी चाहिए, अगर ना भी हो तो, डट कर कत्लेआम कर के शहीद हो जाना चाहिए, डट कर दुश्मन का भी कत्ल करना चाहिए ताकि उसकी शहादत के बाद भी, शूरवीर का यश बना रहे।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
अक्तूबर 09,2020।

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