गुरु रविदास जी और मानव की इच्छाएं व्यर्थ।

।।गुरु रविदास जी और मानव की इच्छाएं व्यर्थ!
गुरु रविदास जी, मानव की वैश्विक संलिप्तता की, वास्तविकता को समझाते हुए, कहते हैं कि, ये संसार नश्वर है, यहां कोई चिरस्थाई नहीं रह सकता, कोई किसी का नहीं है, किसी का किसी से कोई संबधी नहीं है। सभी स्वार्थवश एक दूसरे से मिल कर रहते हैं इसीलिए वे फरमाते हैं, कि हे मानव! तूँ कुछ ही दिन का मेहमान है, फिर ये संसार का रंगीन उपवन त्यागना पड़ेगा, जब वह अंत समय आ ही जाता है, जब काल का जाल पड़ जाता है, फिर काल जाल से कोई भी निकल नहीं सकता है। गुरु रविदास जी के भावों को, स्वामी ईशरदास जी, गुरु आदि प्रकाश ग्रँथ के पृष्ठ 1034-1035 पर लिखते हैं कि:-----
               ।। शब्द पहाड़ी।।
रहिणी नहीं रात मिलदी जिस घर बिच मौजां सी मणिआँ। जा घर माहे गबरू सी होया। मिहनत कर कर अहिनिश खपोया। तांण बैठा तूँ लमीआँ तांणिआँ। वणज बपार लख हजार कीते। निस बासर ते बेशूमार कीते। वण बैठा बपारी तूँ वाणिआँ। जो कुछ खट खट घर को लिआवे। बराकट बराकट जोड़ करावे। सो पूंजी नहीं मिली लजाणिआँ। ऐह तन बन गई कची गागरी। काल उदक जावत भाजरी। कितने कु रोज होर लँघाणीआँ। इस घर बदले होंण लड़ाईआँ। बैर विरोध कर होईआँ सफाईआँ। अज छड गिआ बैठकां पुराणीआँ। रविदास कोई ना तेरा। सब कहत चक होत अंधेरा। सुरत संग शब्द धंन लाणिआँ।
गुरु रविदास जी, स्वामी ईशरदास जी के शव्दों में फरमाते हैं कि, जब काल अपने ताँम झांम को लेकर आ जाता है, तब एक रात भी आदमी को रुकने नहीं दिया जाता है, जिस घर में सारी आयु मौज मस्ती की थी, उस में काल रहने नहीं देता। जिस घर में जवान हुआ था, मेहनत करता हुआ दिन रात खपता रहा, और लंबी लंबी योजनाएँ बना कर बैठा रहा। बड़े भारी वणज और व्यापार करने वाला वाणियां बन कर, चौबीस घण्टे, दिन रात अनगिनत लाखों करोड़ों रुपयों के वणज और व्यापार करता रहा, वह धन दौलत जाती बार ले जाने नहीं मिली, शरीर मिट्टी की कच्ची गागर बन गई, जो मौत रूपी पानी के छूने से टूट जा रही थी, इस से कितने और दिन गुजरेगा। जिस घर में तूँ रहता था, उस के लिए, अनेकों बार आपस में झगड़े हुए, कई बार लड़ाईयां और समझौते हुए, आज तूँ अपनी पुरानी बैठने की जगहों को छोड़ गया। गुरु रविदास जी समझाते हैं कि, है मानव! यहां तेरा कोई भी अपना नहीं है, आज सभी यही कह रहे हैं कि, जल्दी करो, अंधेरा हो रहा है, अगर अंधेरा अधिक हो गया तो, जलाने के लिए देरी हो जाएगी। रात भर यहीं घर में रखना पड़ेगा, इसीलिए सभी कहते हैं कि जल्दी जल्दी शव को जलाने के लिए, श्मशान घाट को ले चलो। है मानव, आज चलती बार तूँ केवल उसी धन को साथ ले जा सकता जिसे तूँ ने, सुरति के साथ शब्द को मिला कर इकट्ठा किया है।
गुरु रविदास जी महाराज, मानव को समझा रहे हैं कि, धरती के ऊपर कोई किसी का नहीं है, कोई किसी का मां-वाप, भाई बहन, वाप बेटा पति पत्नी, नहीं हैं। जब काल अपने लाओ और लश्कर ले कर ले आ जाता है, तब कोई भी तुझे उनसे छुड़वाता नहीं है, ठीक इस के विपरीत सभी यही कहते हैं कि, जल्दी जल्दी करो, इस मुर्दे को उठाओ और श्मशानघाट को ले जाओ, रात हो जाएगी अर्थात कहीं रात हो गई तो, मुर्दा सारी रात घर में ही रखना पड़ेगा, जिससे सभी को परेशानी होगी। सभी मुर्दे को कूड़ा कर्कट समझते हैं। गुरु जी समझाते हैं कि, धरती पर सभी लोग स्वार्थी इसीलिए। हे मानव! अपनी मृत्यु को सुखदायक बनाने के लिए, सोहम शब्द को दिन रात याद कर।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
अक्तूबर 21, 2020।

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