गुरु रविदास जी और धरती मुसाफिर की सराँ।।

।।गुरु रविदास जी और धरती मुसाफिर की सराँ।।
गुरु रविदास महाराज ने, आजीवन साधु सन्तों का जीवन व्यतीत किया है। चार वर्ष की आयु में ही, ब्राह्मणों, पंडों से लोहा लेना शुरू कर दिया था। उन्होंने पूजा, पाठ, भक्ति, और साधना के एकाधिकार को चुनौती देंकर, ब्राह्मणवाद के किले में आग लगा कर, राजाओं को भी सन्न कर दिया था। ब्राह्मणों के स्वांग भर कर, ब्राह्मणों का मजाक उड़ा कर, ब्राह्मणों की नींद उड़ा दी थी। धोती पहन कर, तिलक बजाकर, शंख बजा कर पाँच हजार वर्षों से चले आ रहे, प्रत्येक क्षेत्र के ब्राह्मणी एकाधिकार और गुंडागर्दी को, पहली बार चैलेंज किया था, तो केवल गुरु रविदास जी ने ही किया था। ब्राह्मणों को, भगवान का कोई डर नहीं था कि, मरने से पहले आदमी को अपने कर्मो का फल भुगतना पड़ता हैं, कर्म गति को कोई टाल भी नहीं सकता है, कबीर साहिब ने भी कहा है कि "कर्म गति टारे ना टरे", अर्थात जो अच्छे बुरे कर्म किये जाते हैं, उन की चाल को कोई भी टाल नहीं सकता। स्वामी ईशरदास जी ने भी कर्म के बारे मे कहा है, "करनी का ढंग निराला साधो करनी का ढंग निराला"। चार पांच हजार सालों से, भारतीयों का जीवन नरक बना हुआ था। भारतीय नारी को तो विधवा होने पर जिंदा जलाया जाता था, शूद्रों और पशु पक्षियों को, गाजर मूली की तरह काटा जाता था, बलि के नाम पर कत्ल किया जाता था और जिंदा ही दफनाया जाता था, इतने घोर जघन्य अपराधों के बदले में जो ईश्वरीय यातनाएँ मिलती हैं, उन का इन्हें ना तो तब कोई भी अहसास था और ना ही अब अहसास है। गुरु रविदास जी ने, सभी को अहसास करवाया कि किसी को भी, किसी की आत्मा को भी दुख नहीं देना चाहिए, सभी जीवों को स्वतंत्रता से जीने का अधिकार है, सभी को भक्ति करने का अधिकार है, कोई ऊंचा या नीचा नहीं है, कोई इंसान छूत और अछूत नहीं है मगर ब्राह्मण नहीं समझे बल्कि और उग्र होते ही गए और गुरु रविदास जी को शासकों के पास, झूठी मूठी शिकायतें कर के, गुरु जी को अपराधियों की तरह पेश करवाया गया, सजाए ए मौत दिला कर, अपने रास्ते से हटाने के लिए, उन पर अनेकों ही इल्जाम लगाए गए मगर वे गुरु जी का एक भी बाल बांका नहीं कर सके, अपितु गुरु रविदास जी की दैवी शक्ति के सामने बौने ही पड़ते गए, गुरु जी फिर भी प्रेम और शालीनता ही प्रयोग करते रहे, वे विकृत मॉनसिकता को बड़े प्यार से सुधारते रहे। गुरु रविदास जी ने, समझाया कि, छल कपट किसी के काम नहीं आता है, मानव ही नहीं, समस्त प्राणी धरती पर मुसाफिर बन कर आते हैं और फिर चले जाते हैं, अर्थात प्राणी मर जाते है, इसी लिए इंसान धरती पर केवल यात्री बन कर रहता है और धरती रूपी सराँ ( दूर यात्रा करते समय मार्ग में रात पड़ने पर ठहरने का घर) में चार दिन काट कर पुनः छोड़ कर चला जाता है। इस लिये मानव को जिओ और जीने देने के, सिद्धांत पर ही धरती पर रहना चाहिए। गुरु रविदास जी के भावों को स्वामी ईशरदास जी, गुरु आदि प्रगाश ग्रँथ के पृष्ठ संख्या 1072-1073 पर लेखनी बद्ध करते हुए कहते हैं कि:--- 
                ।।शब्द सोरठ।।
धरनी साराँ वण गई दिन कट लै मुसाफर वण के। असंख करोड़ी आए मुसाफर। कोई धरमी कोई योगी काफर। सभ चले गए ताणा तंण के। इस धरती नूँ कहण मेरी। मांण करीं ना योगी की फेरी। लखां गए मल मल जण के। इस धरती तों मिली ना राई। अंत बकत जउ पड़ी दुहाई। जद स्वास घण्ड़ में खण के। छोछे आए छोछे जाणा नेकी खट लै बन्दा वण के। भँन रविदास बण जा सिआणा शब्द संग हण के।
गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, हे बंदे! ये धरती एक सराएँ ही है, ये केवल मार्ग में रात पड़ जाने पर, आराम करने के लिए, तेरे लिए अस्थायी घर बना हुआ है, इसलिए धरती के ऊपर एक यात्री बन कर, जो तुझे समय मिला हुआ है, उसे बिता ले, उसके बाद धरती पर तेरा कोई भी अधिकार नहीं रहेगा। जैसे मुसाफिर को सराएँ में रात भर सो कर आराम करने दिया जाता है और सुबह वहां से जाना ही पड़ता है, कोई भी दो चार दिनों के बाद, वहां नहीं रह सकता, वैसे ही आदमी को धरती पर कुछ ही दिन रहने दिया जाता है उसके बाद ये छोड़नी ही पड़ती है। गुरु जी फरमाते हैं कि, इस धरती पर कई लाखों करोड़ों यात्री आए जिन में कोई धर्मी हुए कोई काफर अर्थात नृशंस काफर, पॉपी, खूनी, और कातिल सभी अपनी करनी कर के चले गए और अपने किये कर्मों का फल भुगत कर मर गए। जो जो धरती को कहते हैं, कि ये धरती मेरी है, उन्हें ऐसा सोच कर घमंड नहीं करना चाहिए, इस धरती पर सभी योगियों की आते हैं और पुनः चले जाते हैं। लाखों लोगों ने, खून वहाया और इस धरती को अपने कब्जे में ले लिया मगर अंत में सभी छोड़ कर ही गए। कोई भी राई के बराबर कुछ यहाँ से नहीं ले जा सका, जब मृत्यु के समय, दिल को दहलाने देने वाली चीखें निकलती हैं, श्वास गले में ही अटक जाते हैं, बुरे कर्मों के कारण तब मौत भी नहीं होती, कई कई वर्षों तक इसी तरह श्वास गले में रुके रहते है, हाय हाय लगी रहती, मौत मागने पर पर भी नहीं आती है, तब ये धरती किसी की सहायता नहीं करती है। जिस परिवार के लिए, धरती छीनी जाती है, धरती पर अधिकार करने के लिए, खून की नदियां बहाई जाती हैं, पाप कर्म किये जाते, तब कोई भी मदद नहीं करते हैं और अत्याचारी को अकेले को ही नेचर की सजा भुगतनी पड़ती है, इसलिए गुरु रविदास महाराज समझाते हैं कि, हे बंदे! तूँ बुद्धिमान बन जा, मैं, मेरी छोड़ दे, ये धरती केवल मात्र एक विश्राम गृह मात्र ही है, यहां पर शब्द को सुरत के साथ जोड़ कर, शांति से, जो कुछ समय मिला हुआ है, उसे बिता।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
अक्टूबर 24, 2020।

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