गुरु रविदास जी का कथन हिन्दू मुस्लिम का विश्वासः नहीं।
।।गुरु रविदास जी का कथन हिन्दू मुस्लिम का विश्वासः नहीं।।
गुरु रविदास जी महाराज, सभी धर्मों को त्याग कर धर्म को पकड़ कर रखने की बात सँगत को समझाते थे। उन्होंने धर्मों और उनके पूजा स्थलों को ठगी, लूटमार, छलकपट, लड़ाई, झगड़े की मूल जड़ बता कर, इंसानियत के खून के काले दस्तावेज ही घोषित किया है। इन्हीं धर्मों व धर्म स्थलों, धर्म के ठेकेदारों के कारण इंसानियत के टुकड़े टुकड़े हो गए हैं, एक दूसरे के घोर दुश्मन बने हुए हैं। भाई, भाई विभक्त हो चुका है, अगर एक भाई हिन्दू है तो दूसरा दुखी होकर मुस्लिम बन गया है, तीसरा क्रिश्चियन और चौथा बौद्ध बन कर आपस में लड़ मर रहे हैं और सत्य के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति आदधर्म के साए में जी रहा है, जिस के आगे पीछे चारों धर्म लगे हुए हैं। शाश्वत आदधर्म में कोई भी, किसी भी प्रकार का छलकपट, हेराफेरी, ऊँच-नीच, छूत-अछूत गोरा-काला, स्पर्शय-अस्पर्श्य नहीं है, आदधर्मी एक ही जन्मे है, जब कि चारों मजहब दो जन्में हैं। सभी अपने अपने पूजा स्थलों को श्रेष्ठ और उन के अलग अलग नमूने बनाए हुए हैं ,अलग अलग पहरावे पहन कर, इंसान के रंग रूप में बहरूपिये बने हुए है, इसीलिए स्वामी ईशरदास जी महाराज ने, गुरु आदि प्रगाश ग्रँथ साहिब के पृष्ठ संख्या 335-336 के ऊपर, गुरु रविदास जी को समर्पित करते हुए कहा है:-----
।।शब्द कलँगड़ा।।
जिंदड़िये तोड़ मजहवां दी फांसी। तूँ हिन्दू ना कहावीं, ना मोमन सदावीं ककियाँ दी कट गलोँ फांसी। गल्ल जनेऊ ना पाईं, ना खतना कराईं किरपाण ना गल पांसी। गंगा ना जांवीं, हज ना करावीं छडदे बुतप्रस्ति। वांग कलन्दर मजहब नूँ मरकट गरे गरे जियूँ मंगासी। समूह मजहवां दी तोड़ जंजीरी रख अगे गुर आद परगासी। दास कहे सुण रे जिंदड़िये टेक एक अविनासी।
स्वामी ईशरदास जी महाराज ने, गुरु रविदास जी को समर्पित करते हुए इस शब्द में फरमाया है कि, हे जिंदड़िये! तूँ असँख्य मज़हबों के फंदों को तोड़ कर एक आदधर्मी को पकड़। तूँ हिन्दू और मुसलमान मत कहलाना और पांच ककों ( कच्छा कंघा कड़ा केस किरपाण) के बन्धनों को काट देना। गले में जनेऊ और खतना मत करवाना और ना ही गले में कृपाण लटकाना। गंगा स्नान को मत जाना, ना ही हज को जाना, मूर्ति पूजा को भी छोड़ देना। कलन्दर (मदारी) बन्दर के गले में जंजीर डाल कर घर घर मांगता है, वैसे ही ये दाड़ी और सिर मुंडाने वाले फकीर और पुजारी भी मजहब के नाम पर भीख मांगते हैं। सारे ही धर्मों की जंजीरों को तोड़ कर किनारे रख दो, केवल गुरु आदि प्रगाश ग्रँथ साहिब को ही अपने सामने रख कर सर्व मजहबों की वाणी पढ़ना। स्वामी जी फरमाते हैं, हे जिंदड़िये! सुन ले, केवल एक निराकार, अविनाशी अर्थात जिस का विनाश नहीं होता, जो हमेशा अजर अमर है, जो निरंकार है, उसी की पूजा अर्चना करना।
।।शब्द कलँगड़ा।।
बसाह ना करिए दोहां दा, हिन्दू अंधा, मुसलम काणा। हिन्दू अबीना बुत पूजाए।सचा मारग हरि का भुलाए। ओह शरणाई गुर मनाणा।वेद कतेबां
दोऊ सुनाई।जनता बैकुंठ के संगल गल पाई। छड तूँ द्वै है कैदखाना। दींन मजहब दा झगड़ा भारा। हरि हरि कर इन से रहि निआरा।तूँ हर सिमरन कर लै दुनारा।जियूँ तपनी खल धाम गुआवे।
स्वामी जी फरमाते हैं कि, हे आदधर्मी! ये हिन्दू अंधा है और मुसलमान काणा है, इसलिए दोनों का ही विश्वासः मत करो। अज्ञानी हिन्दू मूर्तियों की पूजा औऱ अर्चना करवाता है और भगवान के मिलन का जो, सत्य का रास्ता है, उसे भुला देता है, इसलिए गुरु की खोज कर, उस की ही शरण में जा कर उसे मनाओ। हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही, दोनों वेद और कुरान आदि किताबों को सुनाते हैं, जिस से जनता को सुखी और सुनहरा जीवन जीने से, रोकने के लिये, इन्होंने पाँव में बेड़ियां डाल रखीं हुई हैं, ये दोनों ही जेलें है, जिन्हें तूँ छोड़ दे। दीन और मजहबों के बड़े भारी झगड़े हैं, सोहम सोहम कह कर ही, इन से अलग रह कर के, न्यारा बन कर भक्ति कर। तूँ भगवान का सिमरन कर के इन से दूर ही रहने का प्रयास कर।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
अक्टूबर 14, 2020।
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