गुरु रविदास जी ने मीराबाई को सच्चा मार्ग बताया।

।।गुरु रविदास जी ने मीराबाई को सच्चा मार्ग बताया।।
गुरु रविदास जी महाराज ने, सर्व मॉनवता के लिए ही आजीवन अथक श्रम किया है, उन्होंने कभी भी किसी जाति पाति को अपने मार्ग में नहीं आने दिया। गुरु जी ने सभी वर्णों, जातियों, धर्मों, मजहबों के लोगों को गले लगाया था जिन में वाणियां जाति के गुरु नानकदेव को भी अपने नाम दान की बख्शिश की थी, राजपूत जाति की मीरांबाई को अपनी सर्वश्रेष्ठ शिष्या के रूप में मान्यता दी थी, नाई जाति के सेन को भी अपना शिष्य बना कर अपनी समन्वयवादी सोच को सँगत के सामने प्रस्तुत किया है। गुरु रविदास जी ने,  पद दलित नारी को जाति में मीरांबाई को सर्वोच्च स्थान दिया है और मीरांबाई ने भी कास्ट क्रीड, ऊँच-नीच को धता दिखा कर चमार गुरु को ही स्वीकार किया था, गुरु रविदास जी के आशीर्वाद से, मीरांबाई विश्व की सर्वश्रेष्ठ निर्गुण भक्ति की साधिका कहलाई है। मीरांबाई गुरु आदि प्रकाश ग्रँथ के पृष्ठ संख्या 567-568 पर स्वामी ईशरदास जी के शब्दों में कहती है:----
                  ।।शब्द सिंधड़ा।।
कीते तीरथ साधु ढूंढे इन्हां भेव नूँ पाया है। आई सरन गुरु रविदास सचे मारग लाया है। जे मैं ना सरन तुहारी आंदी। भवसागर में डूब जांदी। तुसीं नौका नाम दी लिआंदी। डुबदी नूँ पार लगाया है। मेरे खुल गए बजर कबाड़। मेरी मर गई अबगुण वाली धाड़। दीनी सखत खेत नूँ बाढ़। चरदा खेत बचाया है। कीती गिआन वाली बोध। मेरे मन नूँ दित्ता सोध। पुजा दिति हर जन गोद। बेअंत दा खेल वखाया है। धंन धंन गुरु रविदास। मेरी पूरी ही गई आस। कीउ हंसा नाम प्रकास। असली धाम पुजाया है।
मीरांबाई कहती है, मैं ने कई तीर्थ व्रत किए, कई साधु तलास कर के ज्ञानगोष्ठियां कीं परन्तु कहीं कोई संतुष्टि नहीं हुई, किसी से सत्य का भेद नहीं प्राप्त हुआ। जब मैं, गुरु रविदास जी की शरण में आई, उन्होंने ही मुझे सत्य का मार्ग बताया, यदि उन की शरण में नहीं आती तो संसार रूपी सागर में, अज्ञानता के पानी में डूब जाती। हे गुरु रविदास  जी! आप ने मेरे लिए ज्ञान की नैया ला दी, जिससे मंझदार में डूबती हुई को भवसागर के किनारे लगा दिया। दसवें दरवाजे के कंकरीट से बने किबाड़ खुल गए, मेरे अंदर निवास करने वाली अबगुणों की सेना मर गई। आप ने मेरे मन रूपी खेत को नाम की पक्की दीवार देदी। काम, क्रोध, मोह, लोभ और अहंकार मेरे खेतों को उजाड़ रहे थे। आप ने मुझे ज्ञान का बोध करवा दिया, मेरे मन को स्वच्छ कर के पवित्र कर दिया है, मुझे आदपुरुष की गोदी में पहुँचा कर बैठा दिया है। हे गुरु जी! आप ने मुझे अनंत दुनियावी खेल और कौतुक दिखा दिए हैं। आप तो गुरुजी, धन्य हैं, आप ने मेरी सभी आशाएं पूर्ण कर दीं  हैं। आप ने हंस प्राणयाम सिखा कर, मेरी आत्मा में दिव्य ज्योति प्रकट कर दी है, गुरु जी आप ने मुझे वास्तविक घर में पहुँचा दिया है।
                 ।। शब्द सिंधड़ा।।
रखीं प्रेम दी डोरी मीरां इस नूँ तोड़ चढ़ावीं तूँ। करीं साध सँगत की सेवा, सोहम सोहम नाम धियावीं तूँ। दित्ता नाम सिमरन दस। इस में रंचक करीं ना कच। खोटे करमा ते रहीँ बच। विराग विवेक जगावीं तूँ। इह तरने दे हन ढंग। सुरती चढ़े वांग पतंग। जाईं भव सागरों लँघ। इस विध मोखस पाँवीं तूँ। मीरां उमर तेरी नादानी। चढ़ के डिगीं ना वण जा सिआनी। इह जग झूठ ना देख लुभानी। सानूं दाग ना लांवीं तूँ। इस मन दे वेग हजारां। रुकदे हैं ना तीर तलवारां। शब्द गुरु का अंकुश भारा। निस दिन बहि समझावीं तूँ।
गुरु रविदास जी, मीरांबाई को दिव्य उपदेश देते हुए समझाते हैं, हे मीरां! प्रेमामार्ग की डोरी को संभाल कर रखना, इसे जी जान से चरम सीमा तक पहुँचाना। तूँ, हमेशा साध सँगतां की सेवा करना और सोहम-सोहम शब्द का ही जाप करना और ध्यान लगाना। तुझे भजन सिमरन बता दिया, अब इस में जरा भी कमी नहीं है, बुरे कर्मों से बच कर रहना, अपने अंदर वैराग और ज्ञान को जगाने का काम करना। ये भवसागर में तैर कर पार जाने के तरीके हैं, सुरती पतंग की तरह नाभि से चोटी तक चढ़ाती रहना, इस तरह भवसागर को पार कर लेना, इस ढंग से तूँ मोक्ष को प्राप्त करना। बेटी मीरां! तूँ अभी बिलकुल छोटी उमर की है, अभी बिलकुल ही नासमझ है, कहीं मुक्ति के जहाज पर सवार हो कर नीचे मत गिरना, तुझ में अभी बचपन है, तूँ बुद्धिमान बन जाना, ये संसार झूठ और आकर्षण का केंद्र है, कहीं इस के ललचाने मात्र से ही, लालच में मत फंस जाना। हमारे दामन को भी कोई धब्बा मत लगाना अर्थात कोई हमारे गुरुत्व को कलंक मत लगाना।  इस मन की गति बड़ी तेज है फिर इस के कई रास्ते हैं, जिन पर इस के असँख्य घोड़े बड़ी तीव्र गति से दौड़ते हैं, वे तीर और तलबारों के रोकने पर भी नहीं रुकते हैं, जिन को केवल गुरु का तेज अंकुश ही मार कर, काबू में किया जा सकता है। दिनरात इसी सोहम रूपी अंकुश को चला कर, मन को वश में रखना।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
अक्तूबर 27, 2020।

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