गुरु रविदास की शिष्या, "मीरांबाई" को भाई द्वारा जहर।।

।।गुरु रविदास की शिष्या, "मीरांबाई" को भाई द्वारा जहर।
गुरु रविदास जी ने, ऐसा कौतुक भरा नाटक रचा हुआ था कि, उस के पात्र भी हर वर्ग के चुन चुन कर लिये थे। गुरु जी ने अच्छे पात्र से अच्छे कर्म करवाए और बुरे पात्र से बुरे कर्म लिए मगर उन के इस कौतुक को केवल बुद्धिमान विद्वान लोग ही समझ सके मूर्ख और पथभ्रष्ट लोग, बुरे कर्मों में ही उलझे रहे और बेमौत मरते रहे। गुरु जी ने खलनायकों और खलनायिकाओं को कतई नही बख्शा था। कर्मों के अनुसार सभी को सुख और दुख अवश्य दिए। गुरु जी ने ये भी साबित किया कि, सत्पुरुषों की प्रीत के साथ सुख तो कम ही मिलते हैं मगर दुख अधिक मिलते हैं। जो साधक दुखों को सहन कर जाते हैं, वे ही अमर होते हैं। गुरु रविदास जी महाराज, के इन विचारों को गुरु आदिप्रकाश ग्रँथ के पृष्ठ संख्या 570- 572 पर, स्वामी ईशरदास जी महाराज, अपने शब्दों में लिखते हैं कि:----
               ।। शब्द आसा।।
सुखैन ना हुन्दी साहिबो, नाल भगतां प्रीति करनी। लगाऊंणी सवलड़ी निभाऊणी साहिबो मुशकलड़ी औखी नाम कमाई फ़रनी। गुर वाक मनाऊंणा संगल पांऊँणा औखा लगणा गुरां दी करनी। सम दम रोक कर बाहरों अतरवर मरना शब्द की मरनी। दास कहे इह पिंड छोड कै सुरत गगन मेँ चढ़नी।
स्वामी ईशरदास जी फरमाते हैं कि, हे साहिबो! भगतों के साथ प्रेम प्रीत लगाना सुखदायक नहीं होती है। भगतों के साथ प्रीत लगाना तो आसान होती है मगर निभाना मुश्किल होती है, नाम की कमाई करना भी कठिन होतीं है। गुरु की बात को मानना अपने गले में जंजीर डालना होता है, गुरुओं के चरणों से लगना भी कठिन काम है। बाहर से अपने (दम) श्वासों को रोक कर शान्ति पूर्वक मर जाना ही शब्द की मौत मरना होता है अर्थात जो लोग गुरुओं के दिये शब्दों को जपते हैं, वही आराम से शरीर को छोड़ते हैं, अर्थात मृत्यु से मुक्ति प्राप्त करते हैं, ऐसे लोग प्राणों को विसर्जित करते हुए तड़फते नहीं हैं। जो सोहम शब्द जपते जपते मरते हैं, वे अपना पिंड अर्थात शरीर छोड़ते समय सुरत के सहारे गगन में चढ़ते हैं। मीरांबाई के मायके और सुसराल जातीय घमंड के कारण, मीराँ के जानी दुश्मन बन गए थे, जिस के कारण मीराँबाई का भाई ही सब से अधिक निर्दयी बन गया था, उस ने भी मीराँ को मारने के लिए जहर का प्याला हाथ में देते हुए कहा था।
                 ।शब्द जिला ।।
इह लै मीराँ पकड़ लै, पिआला तूँ तां पी लै ऐस नूँ। साडी कुल नूँ दाग तैं लाया निंदिआं सारे देश नूँ। तूँ ना बिलकुल साथों डरदी। कहीऐ सिर पर जावैं चढ़दी। दफा उड़ाई साडे घरदी। भारी पाया कलेश नूँ। नित साधां दे तूँ जांदी। तैंनूं शर्म जरा ना आँदी। रात दिनें फिरें तूँ गांदी। कीता साध भेष नूँ। जिहड़ा जाति दा चमार। जांदी उस दे तूँ दुआर। मारूं पकड़ खिंच तलवार। जे ना पीता ऐस नूँ। कर मीराँ तूँ फरियाद। हुण करतां उस नूँ याद। कोसूँ तैंनूं वांग जल्लाद। पता लगू देश नूँ।
मीरांबाई का भाई, क्रोध में आ कर मीराँबाई को कहता है कि, ये प्याला पकड़ ले, इस को पी ले। तूँ ने हमारे राजकुल को दाग लगा दिया है अर्थात कलंकित कर दिया है, तूँ ने सारे देश में हमारी बेइज्जती कर दी है। तूँ तो हम से बिलकुल नहीं डरती है, समझाने पर सिर के ऊपर चढ़ती जाती है, तूंने हमारे घर की मिट्टी पलीत कर दी है, सारे परिवार को वहुत बड़ा कलेश खड़ा कर दिया है। तूँ प्रतिदिन साधुआँ के पास जाती रहती है, तुझे तनिक भी शर्म नहीं आती है, दिन रात तूँ गाती रहती है, तूंने अपना भेष भी, साधों वाला बना लिया है। जो चमार जाति का गुरु है, तूँ उस के घर जाती है, यदि तूंने इस प्याले को नहीं पिया तो, आज तुझे तलवार से कत्ल कर दूंगा, अब मीराँ तूँ अपने गुरु के पास फरियाद कर,उसे याद कर, आज मैं तुझे, जल्लाद की तरह पछ पछ कर काटूँगा, बार बार तुझे दुत्कारूंगा और बुरी तरह फटकारूँगा, जिस से सारे देशवासियों को पता चल जाएगा, कि चमार को गुरु धारण करने पर क्या होता है?
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
अक्तूबर 30, 2020।

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