गुरु रविदास जी का निर्देश अपनी वस्तु ही काम आती।

गुरु रविदास जी का निर्देश अपनी वस्तु ही काम आती।।
गुरु रविदास जी वचपन से ही स्वाभिमानी थे, वे  स्वयं तो स्वाभिमान से रहते थे, मगर सारे विश्व को भी स्वाभिमान से जीने के लिए प्रेरित करते थे। वे स्वाभिमान बनाए रखने के लिए, स्वराज, स्वधर्म, स्वधर्म ग्रँथ, स्वभाषा, स्वपन्थ के हामी थे। गुरु जी सेल्फ डिपेंडेंट बना कर शोषकों के शोषण से निजात दिलाना चाहते थे। दूसरों के सामने सीधा हाथ करना भिक्षा मांगना समझते थे और हाथ को उलटा कर के रखना किसी को कुछ देना मानते थे। गुरु रविदास जी पराई वस्तु को अपने लिए सम्मानजनक नहीं मानते थे, वे इसीलिए कहते हैं कि,:---- 
                      ।।छंद।।
वस्तु पराई राख कै, कितने कु दिन गुजारेंगे। एक तऊ वे लख लै जाई, शदियों के सूद भी नकारेंगे। आपणी वस्तु जोड़ कर खजाना पास। अपनी ही काम आएगी, भाई छोड बगानी आस। गीता सिमरती पोथियाँ पढ़े ग्रँथ हजार। जिहड़ी खींच कर ले गई अछूत मुरदार। उतों लुथफे खा लये करँग पये रुलेंदें। करंगा नूँ भी जगह नहीं, पराई थां रखेन्दे।
गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, दूसरों से उधार ली हुई वस्तु को अपने पास रख कर कितने कु दिन बिताएंगे, अर्थात कितने दिनों तक पराई वस्तु का सुख ले सकेंगे, एक ना, एक दिन, वह अपनी वस्तु को वापस अवश्य मांगेगा। उधार देने वाला पहले ही हजार की वस्तु के बदले में लाख लेगा, फिर सूद पर सूद भी और लगाऐगा। अपनी वस्तु को इकठ्ठा करके, अपना खजाना तैयार कर लो क्योंकि एक दिन, दूसरा अपनी वस्तु वापस अवश्य लेगा, फिर अपनी वस्तु काम आएगी, इसीलिए पराई वस्तु की इच्छाओं को त्याग दो। गीता और मनुस्मृतियों आदि हजारों  किताबें पढ़ीं मगर उनके कारण ही अछूत मुर्दों की तरह हो गए हैं। मुर्दों के ऊपर से मांस मांस तो वे खा गए अब केवल आप के शरीरों के ही अस्थिपंजर अर्थात करँग रूल रहे हैं, जिन के लिए भी कोई ऐसी जगह नहीं है, जहाँ उन्हें जलाया जा सके अर्थात अछूतों से ओबर काम लेकर, उनका मांस सूखा दिया जाता है, मरने पर उनके करँगों को भी, मनुबाद व ब्राह्मणवाद अपने श्मशान घाटों पर जलाने तक नहीं देते, ये मूलनिवासी करँग भी बिना अंतिम संस्कार किये ही धरती पर पड़े रहते हैं। ये सब इसीलिए होता आया है, क्योंकि मूलनिवासी गुलाम हैं, गुलामी से मुक्ति हासिल करने और स्वतंत्रता पाने के लिए, आत्मनिर्भर होना अति आवश्यक है तभी तो गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि:------
                   ।।दोहा।।
पराधीनता पाप है, जान लियो रे मीत।
रविदास पराधीन से, करे ना कोई प्रीत।।
गुरु रविदास महाराज फरमाते हैं कि, हे भाईयो! समझ लो, गुलामी पाप होती है। गुरु रविदास जी समझाते हैं कि हे भाई! गुलाम से कोई प्यार नहीं करता है।
                   ।।शब्द मलहार।।
निज ईष्ट नूँ मनावीं बच जांवीं, गुन गावीं आदि प्रगाश दे। आन मजहबों दे तप अधानो। आदि प्रगाश नूँ औखद जानों। आदधर्मी नित खांवीं दिल लांवीं सुख पाँवीं धरनी आकाश दे। और तरीका बचने का नाहीं। गुरु आदि प्रगाश के पाठ करावीं। सच जांवीं आदधर्मी जाई गर्मी पये नर्मी घुट पी हुबलासदे। ऐस जुगत बिन उजड़ कहावे। सिरकी बाजां वांग फरावे। आठ पुस्तक जऊ रखावे शोध पावे खुस जावे लछण भास दे। आन मजहबां दे धोखे ना आना। छड़िआ ना तेरा कोई टिकाना। आन मजहबी वश कीते, खोह लीते, कढ लीते सच कहने दासदे। 
स्वामी ईशरदास जी के शब्दों में गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, हे आदधर्मी! तूँ अपने ईष्ट को ही मान, तभी तूँ सांसारिक मुशीबतों से सुरक्षित हो सकता है, तूँ अपने धर्मग्रंथ गुरु आदि प्रगाश के ही गुणों से भरे शब्दों को गाना, दूसरे धर्मों के सारे नियम अधूरे हैं। गुरु आदि प्रगाश ग्रँथ को ही आध्यात्मिक परम औषधि समझो, इसी को प्रतिदिन प्रयोग करो, इसी से ही सभी बीमारियों का इलाज हो सकेगा, इसी से ही अपना दिल लगाओ, इसी से ही धरती और आसमान के सर्व सुख मिलेंगे। सांसारिक दुखों से बचने का यही तरीका है। गुरु आदि प्रगाश के ही पाठ करवाना, यही सत्य समझना, इसी से ही क्रोध रूपी गर्मी खत्म होगी, इसी से ही विनम्रता आएगी, जिससे खुशियों के जाम भर भर कर पीना, इस युक्ति के बिना उजड अर्थात मूर्ख कहते हैं, आदमी इस के बिना खानाबदोश लोगों की तरह, जगह जगह घूमने के लिये मजबूर होता है। गुरु आदि प्रगाश के अतिरिक्त कोई दूसरी पुस्तक रखेंगे, तो दुख पाओगे, जो कुछ आप के पास है, वह भी खो बैठोगे। यही लक्षण नजर आते हैं। दूसरे मजहबों के धोखे में मत आना, जिन्हों ने आप का कोई भी ठिकाना नहीं छोड़ा है। दूसरे मजहबों में आप ने विश्वासः किया है, जिन्हों ने आप के सारे हक हकूक छीन लिए हैं, तुम्हें घर से भी बेघर कर के निकाल दिया है, ये दास ने, आप को सच, सच बता दिया है।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।
अक्तूबर 15, 2020।

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