गुरु रविदास जी ने, जातपात खत्म करवाई।।
।।गुरु रविदास जी ने, जातपात खत्म करवाई।।
गुरु रविदास जी को, पूजापाठ करने, कराने से रोकने के लिए, ब्राह्मणों ने नागरमल के पास, कई शिकायत पत्र दे दिए और फरियाद की, कि रविदास सत्संग कर के, हमारे आरक्षण में सेंध मार रहा है, जिसे पूजापाठ और भक्ति का कोई अधिकार नहीं है। ये अनाधिकार चेष्टा कर रहा है, इससे हमारा शास्त्रार्थ करवाया जाए ताकि इस की भक्ति की शक्ति का पता सब को चल सके। राजा नागरमल ने भी, ब्राह्मणों की झूठी शिकायत को सुन कर, गुरु रविदास जी महाराज और धूर्त ब्राह्मणों का नदी के किनारे शास्त्रार्थ करवाया, जिसमें शर्त रखी गई थी कि, दोनों पक्ष नदी में अपने अपने देवताओं को तैराएँगे, जिस में ढोंगी ब्राह्मण पत्थर तैरा नहीं सके, मगर गुरु रविदास जी ने दो मन की पत्थर की सिला तैरा दी, जिस के कारण राजा नागरमल और असँख्य लोगोँ ने गुरु रविदास जी को अपना गुरु स्वीकार कर के, उन से नाम दान की बख्शिश लेली। गुरु रविदास जी महाराज ने भी राजा नागरमल से छुआछूत और जातिपाँति समाप्त करने की शर्त पर राजा को ज्ञान दीक्षा दे दी जिस का वर्णन, स्वामी ईशरदास जी महाराज ने गुरु आदिप्रकाश ग्रँथ के पृष्ठ संख्या 445-446 पर किया है:----
।।शलोक।।
राजा नागरमल ने इह कानून बणाया। खूह बौली मंदर सभ दा हक रखाया। सुनो खत्रियो बाहमनो कर लवो हुणे पुकार। पाणी लंगर इक सम होसी खुआ बाहमन चमियार। गुरु रविदास नूँ मनण वाला चाहे होवे कोई। घिरणा करूगा जो, उस तऊ जुरमाना कैद होई दोई। सभना ने मनजूर कीआ जो कुछ भूप अलाया। चौदह सौ बाबन बिकर्मी इह सी कानून बणाया। दो हजार चौदह अब तक ना चालू होया। दास उस अला क्यों ना कानून आ बरतोया।
स्वामी ईशरदास जी महाराज फरमाते हैं कि जब राजा और ब्राह्मण बुरी तरह पराजित हो गए, तो राजा नागरमल ने, छुआछूत के खिलाफ कानून बना कर, सभी के लिए, कुएँ, बाबलियाँ, मंदिर और लंगर के सामूहिक अधिकार सुरक्षित कर दिए। राजा ने कहा, सुनो खत्रियो और ब्राह्मणों अब खुद ही विचार कर लो, पानी लँगर सभी के लिए एक समान होगा, चाहे कोई ब्राह्मण हो या चमार हो। गुरु रविदास जी महाराज को मानने वाला चाहे कोई भी हो, जो भी घृणा करेगा उसे जुर्माना और कैद दोनों ही सजाएं मिलेंगी। जो कुछ राजा ने कहा, सभी ने स्वीकार कर लिया। गुरु रविदास जी महाराज ने, केवल उन्नीस वर्ष की आयु में, अर्थात चौदह सौ बाबन बिकर्मी को ये कानून बनवाया था। स्वामी ईशरदास महाराज फरमाते हैं कि, आज बिकर्मी सम्मत बीस सौ चौदह ( सन1957) शुरू हो गया है मगर आज तक, उस समय का कानून लागू क्यों नहीं हुआ है?
।।शब्द मेघ।।
पूंजी शब्द दी राजे नूँ मिल गई, बजर कबाड़ खुल गए। होया गिआन राजे नूँ गुरां पासों माया मोह अबगुण भुल गए। अहं आद ज्योति अस्मि नूँ जाणिआ जातपात फिरके कुल गए। लाया हुकम राजे सभ कौमा नूँ खूह मन्दर बॉड़ी सभ खुल गए। कीती राजा दी मन्न लई सारियां इक गल उत्ते तूल गए। सारे हक हकूक दित्ते आछूतां नूँ नौकरी जमीन मुल गए।
स्वामी ईशरदास महाराज फरमाते हैं कि, ज्यों ही राजा नागरमल को सोहम की धन दौलत मिल गई, त्यों ही उसके दसवें दरवाजे के बज्र कबाड़ खुल गए। गुरु रविदास जी के ज्ञान से राजा के सारे अबगुण खत्म हो गए। अहं ज्योति को पा कर जातिपाँति को भूल गया। राजा ने आदेश जारी करके सारे कुएँ, बाबलियों और मंदिर सभी जातियों के लिए खोल दिए। राजा की सभी बातें तो मान लीं मगर एक बात पर सभी तूल गए कि नौकरी और जमीन नहीं देंगे।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
अक्टूबर 19, 2020।
Comments
Post a Comment