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Showing posts from August, 2022

छात्रों का नैतिक पतन क्यों हो रहा

 मेरी 85% मूलनिवासी साथियो, सोहम, जय गुरुदेव! आप आए दिन यह सुनते आ रहे हैं, कि अमुक स्थान पर अमुक छात्र ने अमुक छात्रा के साथ अश्लील हरकत की है, अमुक छात्र ने अमुक छात्रा के ऊपर तेजाब फेंक कर उसे जला दिया है, अमुक छात्रा ने अमुक छात्र को ब्लैकमेल कर के उसके साथ अनुचित संबंध बनाए हैं, अमुक छात्रा ने अमुक छात्र को बुरी तरह पिटावाया, मगर ये घटनाएं क्यों घट रही हैं? इस पर कोई चिंतन नहीं हो रहा है, अगर हो भी रहा है तो उस को अमलीजामा नहीं पहनाया जा रहा है और कानूनी कार्रवाई कर के छात्र और छात्राओं को पथभ्रष्ट कर के और अधिक अनुशासनहीन बनाया जा रहा है, जब कि शिक्षा का लक्ष्य ही विकृत मानसिकता वाले लोगों को अच्छे इंसान बनाना है, जिस के लिए शिक्षा का अच्छा ज्ञान देना बहुत जरूरी है मगर दुख इस बात का है कि जो मुख्यमंत्री, शिक्षा मंत्री, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति बन रहे हैं, उन का अपना ही शैक्षिक ज्ञान अधूरा है। शिक्षा मंत्री ही पांच- दस कक्षा पढ़े लिखे बनाए जाते हैं, जिन लोगों ने कभी ज्ञान अर्जित करने के लिए स्कूल का दरवाजा तक नहीं देखा वही प्रधान बन रहे, जो लोगों को खुद ही झगड़ों में उलझाते है...

वोटिंग मशीन से चुनाव बंद क्यों नहीं किए जाते

  मेरे 85% मूलनिवासी साथियो, सोहम, जय गुरुदेव! साहिब कांशीराम जी ने बहुजन आंदोलन शुरू करते समय आप लोगों को कहा था कि, "भारत में 85% लोगों के ऊपर 15% लोग गुंडागर्दी कर के राज करते आ रहे हैं", इसलिए ही उन्होंने मनुवादी लोगों को कहा था कि अब "वोट हमारा राज तुम्हारा नहीं चलेगा, नहीं चलेगा" जिस से घबरा कर के मनुवाद आंतरिक रुप से इकट्ठा हो गया और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सोचा कि किस प्रकार वोट चोरी किये जाएं? जिस के लिए काग्रेस ने दिमाग लड़ाना शुरू कर दिया था, किस प्रकार चाणक्य नीति के अनुसार चुनाब जीता सके। जिस के परिणाम स्वरूप कांग्रेस पार्टी ने जापान से वोटिंग मशीन खरीदने का निर्णय ले लिया, ताकि वोटिंग मशीन को अपने वश में कर के वोटों की चोरी कर के ही सरकार बना ली जाए, क्योंकि भारत की 85% मूलनिवासी जनता समझ गई थी, कि जब हमारे 85% वोट हैं, तो फिर 15% मनुवादी लोग हमारे ऊपर राज क्यों करें और अंधाधुध मूलनिवासी साहिब कांशीराम जी के आह्वान पर एक मंच पर इकट्ठे होने लग पड़े थे। कांग्रेस पार्टी ने भाजपा के साथ सैटिंग कर के 10:10 साल के लिए राज करने के लिए समझौता क...

इधर मूलनिवासी आजादी की लड़ाई लड़ रहे थे उधर मनुवादी घात लगा रहे थे

 मेरे 85% मूलनिवासी साथियो, सोहम, जय गुरुदेव!  प्रथम विश्वयुद्ध की आग अभी धधक ही रही थी मगर दूसरे विश्व युद्ध की आहट दरवाजे के ऊपर सुनाई देने लग पड़ी थी।1931की जन गणना के समय भारत की आबादी 35.28 करोड़ थी, जिस में 3% ब्राह्मण थे, जिन की उस समय केवल एक करोड़ आठ लाख, 5% राजपूत एक करोड़ अस्सी लाख, 6% वानियों की दो करोड़ पन्द्रह लाख के करीब जनसंख्या थी, जिस का मतलब लगभग पांच करोड़ मनुवादी लोग भारत में रह रहे थे, बाकी तीस करोड़ लोग मूलनिवासी थे। दूसरे विश्वयुद्ध में अंग्रेजों ने भारत के लगभग पच्चीस लाख सैनिक विश्व युद्ध में झोंक दिए गए थे।  मेरी माता जी के मामा स्वतंत्रता सेनानी एक्स मिलिट्री सर्विस मैंन बलंदा राम, बसंता राम, प्रजा राम और लौंगू राम बताते थे, कि दूसरे विश्व युद्ध की आहट के कारण गांव-गांव में जा कर के सैनिक एजेंट युवाओं को ढूंढ ढूंढ कर के सेना में भर्ती करवाने के लिए भर्ती कार्यालयों में ले जा रहे थे, जिन में हम पांच भाइयों में से 3 को सेना में भर्ती कर लिया गया था, इसी तरह मेरी माताश्री के पिता जी और  दो चाचा जी, एक ताया जी को एजेंटों ने भर्ती करवाया था, यह...

देश के गद्दारों को गोली मारो सालों को

 मेरे 85% मूलनिवासी साथियो, सोहम, जय गुरुदेव! यूरेशिया से आए विदेशी, भारत की जनता को, आपस में लड़ाने, भड़काने और मूर्ख बनाने के लिए तो कई प्रकार के नारे, सलोगन लगाते रहते हैं, और लगा भी रहे हैं मगर जनता को आपस में समरसता सिखाने के लिए, इन के पास कोई सद्बुद्धि और दिमाग नहीं है, इसीलिए तो कुछ महामूर्ख कई प्रकार के घटिया सलोगन तैयार कर के बोट लेते आए हैं, "गरीबी हटाओ देश बचाओ", कांग्रेस के इस नारे ने सारे भारत के समस्त गरीब मूलनिवासी लोगों का मन मोह लिया था, सभी इस लुभावने नारे के आकर्षण से आकर्षित हो कर कांग्रेस के दिवाने हो गए थे और मूलनिवासियों ने इंदिरा गांधी की सरकार बना डाली मगर केवल नारे की चकाचोंध से ही मूलनिवासी लोगोँ का पेट भरा गया, गरीबी ना तो हटाई गई, ना हटाने के लिए ही प्रयास किया गया बल्कि गरीबों को ही हटाने के लिए कांग्रेस ने सब कुछ निजी क्षेत्र में दान देना शुरू कर दिया, जिस से गरीबों को सरकारी सेक्टर में जो कुछ मिलता था, वह भी छीन लिया जाने लगा। कांग्रेस की धोखेबाजी से छ्ले गए मूलनिवासी फिर भाजपा के लोलुप "सब का साथ, सब का विकास" नारे को सुन कर भाजपा क...

भारत में गिरते हुए शिक्षा विस्तार के लिए कौन जिम्मेदार

  मेरे 85% मूल निवासियो, सोहम, जय गुरुदेव! आप भली-भांति समझ चुके हैं, कि भारत की शिक्षा व्यवस्था की क्या दुर्दशा होती जा रही है। पहले बच्चों के एडमिशन पर कोई खर्चा नहीं होता था, ना ही किसी को कोई भारी भरकम राशि चुकानी पड़ती थी। बच्चों की किताबें भी छोटी-छोटी ही हुआ करती थी। पहली कक्षा में हमें केवल जोड़, घटाना, भाग, गुना ही सिखाया जाता था, जिस के लिए केवल एक छोटी सी स्लेट-स्लेटी, कलम, दवात और छोटी सी ही पुस्तक हुआ करती थी, उस के साथ भाषा सिखाने के लिए भी एक छोटी सी पुस्तक हुआ करती थी, इन दोनों पुस्तकों के पढ़ाने से ही गणित और भाषा का गूढ़ ज्ञान हो जाता था। इसी तरह अगली कक्षाओं में भी सामाजिक विज्ञान आदि विषय ही पांचवी तक पढ़ाए जाते थे। बच्चों के थैलों का वजन केवल एक या दो किलो हुआ करता था मगर इतनी कम किताबें होने के बाबजूद भी बच्चों का सामान्य ज्ञान वर्तमान बच्चों से अधिक ही होता था। बच्चों को पहाड़े मौखिक रूप से याद करवाए जाते थे और बच्चे भी उन पहाड़ों को तत्काल कंठस्थ कर के अपने गणित विषय के सवालों को तत्काल हल कर लेते थे मगर वर्तमान में केल्कुलेशन के लिए केलकुलेटर का ही प्रयोग...

मोदी राज में भारत अंधेर नगरी बन गया

 मेरे 85% मूलनिवासियो, सोहम, जय गुरुदेव!  जब से मोदी सत्ता में आया है, तब से संविधान को दरकिनार करके असंवैधानिक निर्णय लिए जा रहे हैं, जबकि उनसे पहले 2014 तक 50% काम संविधान के अनुसार होता था मगर मोदी के आने के बाद सारे संविधान को सस्पेंड कर दिया गया है और मनमाने ढंग से, संविधान की धज्जियां उड़ा कर निर्णय लिए जा रहे हैं। लोगों का शोषण जोरों पर हो रहा है। कर्मचारियों और अधिकारियों की भर्ती के लिए केंद्रीय लोकसेवा आयोग, सबार्डिनेट सर्विस कमिशन केंद्र और सभी राज्य सरकारों ने बनाए हुए हैं, जिन के माध्यम से उम्मीदवारों के प्रिलिमनरी टेस्ट होते थे, उस के बाद फाइनल टेस्ट होता था। फाइनल टेस्ट के बाद फिर साक्षात्कार होता था, तब जा कर के फाइनल सिलेक्शन सूची जारी होती थी। चयन लिस्ट मेरिट के आधार पर ही बनती थी, मगर कांग्रेस सरकार के मुख्यमन्त्री वीरभद्र सिंह ने अपने सवर्णों को चोर दरवाजे से भर्ती करना शुरू कर दिया है। मूलनिवासी लोगों को चकमा देने के लिए पार्ट टाइम और अस्थाई आदि कच्चे कर्मी नियुक्त कर अपने कांग्रेसियों को ही भर्ती किया गया है, भर्ती के 5 साल के बाद फिर तीन साल के बाद उन सभ...

भारत को सोने की चिड़िया बनने नहीं दूंगा

 मेरे 85% मूलनिवासी साथियो, सोहम, जय गुरुदेव!  ड्रामेबाज प्रधानमंत्री भारतवर्ष में कई ड्रामें खेल चुका है। मैं ईमानदार चौकीदार भारत के खजाने की चौकीदारी करूंगा मगर भारतवर्ष का ग्यारह लाख करोड़ रुपये चोर ले कर भाग गए और यह ईमानदार चौकीदार चुपचाप खजाने के बाहर खड़ा रहा। बड़े बड़े चोरों, डाकुओं को भागने का सुअवसर देता गया। भारतवर्ष को सोने की चिड़िया बना दूंगा जो अब 7 सालों में कोयले की चिड़िया बन चुकी है। शाइनिंग इंडिया की घोषणा कर के सारे देश के लोगों को मोहित कर लिया था। एक चमचमाती स्टेटमेंट ने सारे भारतवर्ष के लोगों के मुंह पर रोशनी ला दी थी मगर जब से मोदी नामक चमचमाता सितारा आकाश में चमकने लगा है, तब से भारत के अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़ी जाति और मुसलमान दंगों में खूब मारे जा रहे हैं और मरवाए जा रहे हैं।  भारतवर्ष को विश्व गुरु बनाने का दिवा स्वप्न दिखाने वाला चौकीदार लोगों में यह उम्मीद पैदा करता रहा कि, भारत विश्व का गुरु होगा मगर विश्व गुरु बनने से पहले ही इस महापुरुष ने सब से पहले 700 साल पुराने गुरु रविदास जी के मंदिर को दिल्ली के तुगलकाबाद में गिरा कर यह अनुमान ...

भारत के विक्रेता चौकीदार

  मेरे 85% मूल निवासियो, सोहम, जय गुरुदेव!  आप सभी को मालूम ही है कि सन 1914 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री के उम्मीदवार मिस्टर नरेंद्र मोदी अपने चुनावी अभियान के दौरान भाषणों में यह छाती ठोक कर कहते थे कि मेरी छप्पन इंच की छाती है, इसलिए मैं देश को बिकने नहीं दूंगा, मैं देश के खजाने के ऊपर इमानदारी से चौकीदारी करूंगा मगर इस व्यक्ति ने जो कुछ कहा था, उस से हम सभी प्रभावित हुए थे, इस के महाउपद्रव, महाझूठ को सुन कर आकर्षित हुए थे और इस महाझूठ बोलने वाले व्यक्ति के ऊपर भारतीयों ने पूर्ण विश्वास किया था। लोगों ने भारतीय जनता पार्टी को जीता दिया मगर जैसे ही ये व्यक्ति प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठा, त्यों ही इस व्यक्ति ने अपना गिरगिट की तरह रंग बदलना शुरू कर दिया। इस व्यक्ति ने जो जो वादे किए थे, उन सभी के विपरीत काम करना शुरू कर दिया। पूर्व उप प्रधानमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी, उच्च शिक्षा प्राप्त विद्वान शिक्षा मंत्री मनोहर लाल जोशी जैसे बड़े-बड़े बरिष्ठ नेताओं को खुड्डे लाइन लगाना शुरू कर दिया, बड़े बड़े योग्य और बुद्धिमान लोगों को मिट्टी में मिला दिया, भारत का चौकीदार बनते ही अपन...

85% मूलनिवासी 15% मनुवादियों के गुलाम हैं

 मेरे 85% मूल निवासियो, सोहम, जय गुरुदेव! बड़ी हैरानी की बात है कि भारत के मूलनिवासी 85% हैं और 85% लोगों का शोषण करने वाले केवल 15% लोग ही हैं। कहां 85% और कहां 15% लोग। 15% लोग अल्पसंख्यक हो कर के भारतवर्ष में पूरी एकता के साथ मिलकर रहते हैं इन लोगों ने आंतरिक रुप से एक समझौता कर रखा है, कि भारतवर्ष के मूलनिवासी, आदवंशी, आदिवासी लोगों को आपस में फूट डाल कर, लड़ा-झगड़ा झगड़ा कर के रखेंगे, ताकि ये लोग आपस में कभी इकट्ठे ही ना हो सकें, यदि एक गांव में सभी मूलनिवासी रहते हों तो वहां एक ब्राह्मण बसा दिया जाता है और वह ब्राह्मण सारे गांव को नारद मुनि की तरह सच झूठ कह कर के आपस में लड़ाता रहता है। कई बार तो इन मूर्ख आदिवासियों, मूलनिवासियों को, मनुवादी नारद मुनि एक दूसरे के खिलाफ चुगली लगा कर, षड्यंत्र रच कर इतना लड़ाते हैं, कि वे एक दूसरे के खून के प्यासे भी हो जाते हैं मगर ये मनुवादी लोग खुद धार्मिक और राजनीतिक रूप से एकता बना कर के जीवन यापन करते हैं। ब्राह्मणों ने तो ऐसा संकल्प लिया हुआ है कि वह किसी भी संगठन के चुनाव हों, उस में प्रधान पद तो हमेशा छल बल से ब्राह्मणों के लिए ही लेते...

गुरु रविदास जी महाराज ने कहा है जैसे को तैसा करो

 मेरे 85% मूलनिवासी साथियो सोहम, जय गुरुदेव! भारतवर्ष में मनुस्मृति के अनुसार शासन चल रहा था, जिसके अनुसार अंधाधुंध भारत के मूल निवासियों को प्रताड़ित किया जाता था, बलि दी जाती थी, पशुओं की तरह व्यवहार किया जाता था, मनुवादियों के इन कुकृत्यों को देख कर के ही गुरुओं के गुरु रविदास जी महाराज भारत की धरती पर आए थे। भारतवर्ष में काफर कातिलों, खूनी अत्याचारियों, व्याभिचारियों, अनाचारियों, दुराचारियों, बलात्कारियों का शासन चल रहा है, जिस से मासूम, भोलेभाले भारत के मूलनिवासी बड़ी निर्दयता और नृशंसता के साथ मारे जा रहे हैं, उन्हीं कातिलों को नकेल डालने के लिए ही वे अवतरित हुए थे। गुरु जी ने लक्षणा शब्द शक्ति में समझाया था कि:---- "सतिसंगति मिलि रहिओ माधो, जस मधुप मखीरा" गुरु रविदास जी महाराज नि:संकोच, निडर, निर्भय और स्वाभिमान से भारत के 85% मूल निवासियों को खोल कर समझाते हैं, कि आप अपने ही देश में गुलाम बन कर जीवन जी रहे हो! 5000 सालों से चली आ रही यूरेशियन आक्रांताओं की गुलामी के कारण आप की आत्मा मर चुकी है! आप का स्वाभिमान मर चुका है! आप ज्ञानहीन अनपढ़ हो कर पशुओं का जीवन जी रहे ह...

मूल निवासियों आपका भूमिहीन होना है आप की गुलामी का प्रतीक है

 मेरे 85% मूलनिवासियो, सोहम, जय गुरुदेव! आज से 4000 साल पहले आप के पूर्वजों का शासन था, जिस के अंतिम सम्राट शिव शंकर को ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने छलबल से मार कर के उस की राजसत्ता छीन कर आप की सिंधु घाटी की सभ्यता, संस्कृति को जला कर खत्म कर दिया था! आप को बुरी तरह गुलाम बना कर के रखा गया था! आप की धन-धरती को छीन कर के आप को बेघर कर दिया गया था! आप को अपने मुजारे बना कर के अपनी सेवा के लिए बंधुआ मजदूर बना कर के रख लिया था! जो लोग बंधुआ मजदूर नहीं बने थे, उन का बड़ी नृशंसता से कत्लेआम कर के मिटा दिया था! मगर जिन मूलनिवासी आदिवासियों ने जिंदा रहना स्वीकार किया था, यूरेशियन लोगों ने उन के साथ समझौता कर लिया था कि आप हमारे गुलाम बन कर रहोगे। तब से ही आप गुलामी भरा जीवन जीते आ रहे हैं! भारत की धरती, आप की अपनी धरती थी, जिस को पूरी तरह आर्यों ने छीन कर अपने कब्जे में ले रखा है! अंग्रेजों ने भारत में आकर के यूरेशियन लोगों की गुलामी के कानूनों के रद्द कर के खत्म किया था, जिस के फलस्वरूप आप लोग भारत की धरती के पुन: मालिक बनने शुरू हुए थे मगर वह भी बहुत कम मात्रा में जमीन दी गई। जब आप के मूल...

मूलनिवासी नारियों का स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान

  मेरे 85% मूलनिवासी साथियो, सोहम, जय गुरुदेव! स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास पर नजर डालें तो कहीं भी आभास नहीं होता है, कि स्वतंत्रता आंदोलन में मूलनिवासी अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़ी जाति और अल्पसंख्यक नारियों ने भी कोई योगदान डाला था। जब भी हम स्वतंत्रता आंदोलन के बारे में पढ़ते हैं, तो उस में केवल मनुवादी नारियों का ही वर्णन मिलता है, क्योंकि ये लोग अपने नाम के साथ बर्मा, शर्मा, शुक्ला, तिवारी, दूबे, चौबे, मोदी, गांधी, नेहरू आदि शब्दों का प्रयोग करते हैं, जिस से स्पष्ट हो जाता है कि ये लोग केवल ब्राह्मण, राजपूत और वाणीया ही हैं, मगर 85% मूलनिवासियों को तनिक भी ज्ञान नहीं है कि हमें भी स्वाभिमान से अपनी पहचान के लिए ऐसे शब्दों का प्रयोग नि:संकोच करना चाहिए जिस प्रकार हमारे मूलनिवासी गुरु रविदास जी महाराज ने शब्द रचना करते समय अपने नाम के साथ "खलास चमारा" लिख कर अपनी जाति की पहचान लोगों बताई थी, यदि यह शब्द गुरु रविदास  जी महाराज नहीं लिखते तो उन की मूलनिवासी पहचान ही खत्म हो जाती है और ब्राह्मण लेखक गुरु रविदास जी महाराज को केवल तिलकधारी ब्राह्मण ही सिद्ध कर देते हैं, क्यो...

तिरंगा झंडा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

 मेरी 85% मूलनिवासी साथियो,   सोहम, जय गुरुदेव! बड़े हर्ष का विषय है कि हमारे देश के धीर, वीर, बहादुर नौजवानों ने भारत को मुसलमानों और अंग्रेजों से स्वतंत्र करवाने के लिए अपने प्राणों की परवाह ना करते हुए, गुलामी की बलिवेदी के ऊपर शहादत देते हुए गुलाम भारत को आजाद करवाया था। भारत के तिरंगे झंडे को हाथ में ले कर के नेफा, लद्दाख और कारगिल में दुश्मनों का सफाया कर के एक अरब भारतीयों की रक्षा के लिए सैनिक ने अपने प्राणों की आहुति देकर भारत को गुलाम होने से बचाया है। झंडा केवल डंडा और कपड़ा नहीं है, अपितु यह भारत की आजादी और स्वाभिमान का प्रतीक है। इस झंडे को लेकर के सैनिक सीमाओं पर मान सम्मान और स्वाभिमान से मस्तक ऊंचा कर के पहरा देते हैं। झंडा तनिक भी ना झुके उस के लिए वे अपने प्राणों की आहुति दे देते हैं। यदि कोई झंडे को झुकाने का प्रयास भी करें, तो उस को मौत के घाट उतार देते हैं। वीर सैनिक युद्ध क्षेत्र में दुश्मन के किले को फतेह करने के बाद तत्काल अपनी जीत और अधिपत्य को दिखाने के लिए उस स्थान पर अपने झंडे को गाड़ देते हैं, जिस से ज्ञात होता है, हम ने अमुक किले को फतेह कर ...

भारत में मूलनिवासी आज भी गुलाम है

 मेरे 85% मूलनिवासी साथियो, सोहम, जय गुरुदेव!  जालिम अत्याचारी अंग्रेजों के खिलाफ सर्वप्रथम 1780 ईस्वी में भारत के मूल निवासियों ने ही विद्रोह किया था और अंधाधुंध कत्लेआम कर के अंग्रेजों का मनोबल और धैर्य गिराया था, जिस परिदृश्य को देख कर के अंग्रेज दांतों में उंगली दबा कर के मूलनिवासियों को देखते ही सहम जाते थे, जिस का जिक्र मैंने पिछले लेख में किया है, यदि वीर मातादीन बाल्मीकि का वाद विवाद मंगल पांडे नामक ब्राह्मण से ना होता और मंगल पांडे मातादीन को अपना लौटा दे देता, तो शायद ब्राह्मणों में तनिक भी जागृति पैदा ना होती मगर जब मंगल पांडे ने मातादीन बाल्मीकि को जातीयता के आधार पर लताड़ा और फटकारा तब मातादीन ने कहा था, कि "जिस कारतूस को आप लोग मुंह से खोलते हैं और बंदूक में डालते हैं, वह कारतूस तो चर्बी से सने हुए होते हैं, तब क्या आप भ्रष्ट नहीं हो जाते हैं? इसी बात को सुन कर के मंगल पांडे और उस के साथियों ने क्रोधित हो कर के अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह किया था, मगर ये दो नंबर का विद्रोह है क्योंकि इस से पहले मूलनिवासी वीर बहादुर "उदैया जी" शहीद हो चुके थे, जिन्हे! फांसी प...

तिरंगे का सम्मान करने वाले प्रधानमंत्री

 मेरे 85% मूलनिवासी साथियो, सोहम, जय गुरुदेव! इस बार स्वतन्त्रता दिवस 15 अगस्त फिर आ गया है और प्रधानमंत्री, मंत्री और सांसद दो चार चार लाख के नए रंग बिरंगे चोले सिला कर के 15 अगस्त को भारत की सीमाओं पर अपनी जान देने वाले सजे धजे वीर सपूतों से सलामी लेने की तैयारी कर रहे हैं। प्रधानमंत्री तो लाखों करोड़ों रुपए का सूट पहन कर के भिन्न भिन्न प्रकार की अति सुंदर झांकियों का नजारा लेने के लिए, बिके हुए लाल किले के ऊपर झंडा फैहराएंगे। बिका हुआ लाल किला बेशर्म हो कर प्रधानमंत्री को अपने आगोश में ले कर के तिरंगे को लहराने के लिए तैयार बैठा है। भिन्न भिन्न राज्यों से लाखों, करोड़ों रुपए खर्च करके तैयार की गई झांकियां आ रही है, सुंदर सुंदर नर्तकियाँ अपने नर्तन का जौहर दिखाने के लिए बड़ी उत्सुकता के साथ सज धज कर के राजनेताओं का मनोरंजन करने के लिए आएंगी और आ कर के अपना जौहर दिखाएंगी, जिन से प्रभावित हो कर मंत्री और प्रधानमंत्री गरीबों की बर्बादी के लिए कोई न कोई खून चूसने वाली घोषणाएं अवश्य ही करेंगे क्योंकि यह दिन ही ये देखने के लिए मनाया जाता है, कि भारतवर्ष की जनता कितनी सुखी और दुखी है, द...

भारत छोड़ो आंदोलन में मूल निवासियों की भूमिका

 मेरे 85% मूलनिवासी साथियो, सोहम, जय गुरुदेव! 8 अगस्त 1942 को अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस मुंबई अधिवेशन के अनुसार मोहनदास करमचंद गांधी ने भारत छोड़ो आंदोलन शुरू किया था, जिस में ब्रिटिश सरकार से मांग की गई थी, कि ब्रिटिश सरकार के राजनेता तत्काल भारतीयों को आजाद कर के अपने देश इंग्लैंड चले जाएँ, जिस के कारण ब्रिटिश सरकार ने मोहनदास करमचंद गांधी को अरेस्ट कर के जेल में डाल दिया था, परंतु भारत के युवाओं ने गांधी के जेल में डाले जाने की कोई परवाह नहीं की थी और भारत छोड़ो आंदोलन में कूद पड़े थे।  सुभाष चंद्र बोस, लाल बहादुर शास्त्री, डॉ राजेंद्र प्रसाद, बाबू जगजीवन राम, साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवालिया, स्वामी अछूताननंद महाराज, राम मनोहर लोहिया, ललई राम, आदि अनेकों मूलनिवासी राजनेताओं ने भारत को स्वतंत्र करवाने के लिए अपना एड़ी चोटी का जोर लगाया था, जिस के फलस्वरूप ही भारतवर्ष को आजादी मिली थी, मगर जिन जिन अज्ञात मूल निवासियों ने स्वतंत्रता आंदोलन के महायज्ञ में अपने खून की आहुति दी है, उन को इतिहास के पन्नों में दर्ज नहीं किया गया है, जिस के कारण भारत के मूल निवासियों को अपने स्...

85% मूलनिवासी जनता का 1857 की क्रांति में योगदान

 मेरे 85% मूलनिवासी साथियो, सोहम, जय गुरुदेव! 1947 से ही बच्चों को भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास पढ़ाया जाता रहा है मगर मुझे याद है, कि हमें कहीं भी भारत के मूलनिवासी अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़ी जाति के शहीदों के बारे में कहीं कोई जिक्र नहीं मिला है। इन जातियों के वीर, बहादुर, जांवाज रणबांकुरे को इतिहास के पन्नों में कोई जगह नहीं दी गई और ना ही स्कूलों में बच्चों को इन के बारे में पढ़ाया गया। महारानी लक्ष्मी बाई की कविता जरूर पढ़ी थी कि वह "खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी" मगर जब वे किले में घिर गई थी और बाहर निकलने के लिए उस की हिम्मत नहीं पड़ रही थी, तब केवल मूलनिवासी वीरांगना झलकारी बाई जी ने लक्ष्मीबाई का पहरावा पहन कर के, हाथ में दमकती हुई तलवार लेकर के, घोड़े पर सवार हो कर के, कत्लेआम का खूनी खेल खेलती हुई, किले से बाहर निकली थी, जिससे अंग्रेजी सेना ने समझा कि यही झांसी की महारानी है और इस प्रकार झलकारी बाई ने अंग्रेजों को चकमा दे कर के महारानी झांसी के प्राणों को बचाने का प्रयास किया था और अंग्रेजों को किले से बाहर भागने के लिए विवश कर दिया था मगर जब...

मूल निवासी है प्रारंभिक क्रांति के मूलनायक थे

 मेरे 85% मूलनिवासी साथियो, सोहम, जय गुरुदेव! बड़ी दूर तक नजर दौड़ाने के बाद कभी-कभी यह महसूस होता है कि क्या आजादी की लड़ाई में हमारे मूल निवासियों का कोई योगदान था या नहीं, क्योंकि भारत के मनुवादी साहित्यकार मूलनिवासियों के इतिहास को तोड़ मरोड़ कर लिखते आए हैं, जिस के कारण मूलनिवासी समाज के रणबांकुरों की तस्वीर साफ नजर नहीं आती है। भारतवर्ष मुसलमानों और अंग्रेजों का लगभग पंद्रह सौ साल तक गुलाम रहा, इतने लंबे समय तक भारत के मूलनिवासी हिंदुओं, मुसलमानों और अंग्रेजों के अत्याचारों को सहन करते रहे परंतु सहन करने की एक सीमा होती है। जब उस की सीमा का अतिक्रमण हो जाता है, तो जनता विद्रोह कर देती है, जिस से लगता है कि भारत के मूलनिवासियों ने हिंदुओं, सिखों, मुसलमानों और अंग्रेजों के अत्याचारों से लोहा लिया होगा, जिस में वे भी शहीद भी हुए होंगे, मगर मनुवादी लेखकों और साहित्यकारों ने मूल निवासियों के बलिदानों को नजरअंदाज कर के केवल हिंदू और मुसलमान शहीदों के इतिहास को ही सुनहरी अक्षरों में लिखा है, जब कि इन की जनसंख्या नाम मात्र ही है, परंतु जिन कुछ मनुवादी लोगों ने शहादत दी है, उन के नाम ...

कंपनियों को बंद करना भारत को बर्बाद करना है

  मेरे 85% मूलनिवासी साथियो, सोहम, जय गुरुदेव! 15 अगस्त 1947 को जब भारत आजाद हुआ तो उस समय भारत की अर्थव्यवस्था छिन्न-भिन्न हो चुकी थी मगर फिर भी देश में 70 कंपनियां चल रही थी, जब कि भारतवासियों को उस समय रोजी-रोटी के भी लाले पढ़ रहे थे। विदेशों से घटिया किस्म का अनाज लेकर के भारतीयों का पेट भरा जा रहा था। 1914 तक आते आते लाखों कंपनियां रजिस्टर्ड हो करके भारतीयों को रोजगार के अवसर उपलब्ध करवा रही थी मगर सुप्रसिद्ध अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री मोदी ने अनुभव किया कि कंपनी जगत में सब कुछ ठीक-ठाक नहीं चल रहा है! कंपनी के मालिक टैक्स चोरी कर रहे हैं! कुछ कंपनियों के रिकार्ड से ज्ञात हो रहा था कि वे सरकार को अरबों खरबों रुपए का चूना लग रहा है! इसीलिए 2016-17 में 7943 कंपनियों को रजिस्ट्र से हटा दिया गया। 2018-19 में 234 371 को रजिस्टर से हटाया गया। 2018-19 में 138446 थी! इस प्रकार केंद्र सरकार ने 5 सालों में 3.96 लाख कंपनियों को बंद कर दिया और सरकारी रिकॉर्ड से हटा दिया गया! सरकार ने इन कंपनियों को बंद करने की जानकारी देते हुए राज्यसभा में बताया था' कि इन कंपनियों में अनुपालन में कमी...

भारत के मूलनिवासी राजनेता कभी इकट्ठा नहीं होते

  मेरे 85% मूलनिवासी साथियो, सोहम, जय गुरुदेव! आदि पुरुष से लेकर के सम्राट सिद्धचानो जी महाराज और उन की राजेश्वरी लोना जी उर्फ कामाख्या देवी ने मक्का मदीना से ले कर कन्याकुमारी तक सुशासन किया था, जिन के अंतिम सम्राट शिवशंकर भोले हुए हैं। यह अत्यंत भोला भाला और ईश्वर भगत शासक था, जिस में इंसानियत कूट-कूट कर भरी हुई थी, उन की महारानी गौरजां अत्यंत कुशल गृह मंत्री थी जिस की शासन और प्रशासन पर मजबूत पकड़ थी। वह भोले भाले शिवशंकर के शासन और प्रशासन को बड़ी कुशलता पूर्वक चलाया करती थी, जिस के भय से कोई भी विदेशी भारतवर्ष की सीमा में घुस तक नहीं सकता था, जो घुसने का प्रयास करता था, उस को तत्काल मौत के घाट उतार दिया जाता था, इसी कारण यूरेशियन आर्यों ने उस को छल बल से मौत के घाट उतार दिया और दक्ष की सुंदर कन्या पार्वती के साथ भोले भाले शिव शंकर को अपने जाल में फंसा लिया था। पार्वती से उस को धीमा जहर और भांग पिला पिला कर के मार दिया था, जिस के कारण यूरेशियन लोगों ने भारतवर्ष की सीमा में घुसपैठ की थी। सम्राट शिवशंकर के अधीनस्थ दानवीर महाराजा बलि, महाराजा महिषासुर भारतवर्ष के योग्य शासकों मे...

धन के लालची मूल निवासी लोग ही मूलनिवासी राज के दुश्मन।

  85% मूलनिवासी साथियो, सोहम, जय गुरुदेव! बड़ी हैरानी की बात है, कि 85% मूलनिवासी समाज के नेताओं ने अपनी जान हथेली पर रख कर के हिंदू, मुस्लिम और अंग्रेजों के साथ खूनी संघर्ष कर के गुलामों के गुलाम मूल निवासियों को मौलिक अधिकार दिलाए थे, जब कि हम मूलनिवासियों को 1911 के एक्ट के अनुसार भूमि खरीदने का अधिकार तक नहीं था। भूमि के ऊपर हम मकान तक बना नहीं सकते थे, हम लाल कपड़े तक नहीं पहन सकते थे, हमारे पूर्वज मूलनिवासी धार्मिक प्रवचन ना तो कर सकते थे और ना ही सुन सकते थे, छुआछूत इतनी कड़ाई से लागू की गई थी, कि मूलनिवासी  ब्राह्मणों, राजपूतों और वानियों की परछाईं भी ना तो ले सकते थे और ना ही अपनी उन पर डाल सकते थे, उन के मुहल्लों की गलियों से जूते हाथ में लेकर, नंगे पाँव गुजरना पड़ता था। भारत के असली मूलनिवासियों को अछूत घोषित किया गया था, हमारे पूर्वजों से गंदे से गंदा काम लिया जाता था, जिस के बदले में बासी साग और लस्सी के साथ बासी मक्की की रोटी ही खाने को दी जाती थी। 85% मूल निवासियों के पूर्वज ना तो धार्मिक प्रवचन सुन सकते थे और ना कर सकते थे, ना अच्छा खा सकते थे, ना ही पी सकते...

सरकारी शिक्षा संस्थान केवल गरीबों के लिए

  मेरे 85% मूलनिवासी साथियो, सोहम, जय गुरुदेव! बड़ी हैरानी की बात है, कि जिन सरकारी स्कूलों में अत्यंत जीनियस प्रोफेसर, वैज्ञानिक, डॉक्टर, इंजीनियर, बनते थे, जिन स्कूलों से आईएएस, आई एफ एस, आईपीएस, आदि अनेकों योग्य प्रशासनिक अधिकारी शिक्षा ग्रहण कर के बनते थे, शिक्षा संस्थानों से शिक्षा ग्रहण करने के उपरांत उच्च पदों पर जाते थे, जिन का ज्ञान का स्तर ऊँचा हुआ करता था, वैज्ञानिक, डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर आईएएस, आईएफएस, और आईपीएस लोग बिना कोचिंग सेंटरों के ही इन परीक्षाओं को पास कर के इन बड़े बड़े पदों पर जाते थे, उस समय लोगों के पास इतना पैसा भी नहीं होता था, कि वे भारी भरकम फीस दे कर प्री मेडिकल, प्री इंजीनियरिंग, आईएएस, आईपीएस, आई एफ एस आदि की कोचिंग, कोचिंग सेंटरों में जा कर ले सकें, परंतु उस के बावजूद भी जो विद्यार्थी इन सेवाओं में जाते थे, वे सभी अत्यंत कुशलतापूर्वक अपनी सेवाएं दिया करते थे मगर आज धन्ना सेठों के बच्चे कोचिंग सेंटरों में तोतों की तरह रटाए जा रहे हैं| छ्दमी ज्ञान को हजम कर के परीक्षाएं दे रहे हैं और केवल रटे-रटाए ज्ञान के कारण प्री मेडिकल, प्री इंजीनियरिंग, आई...

सुप्रीम कोर्ट का अन्याय पूर्ण व्यवहार

 मेरे 85% मूलनिवासी साथियो,  सोहम, जय गुरुदेव! मुंशी प्रेमचंद जी ने अपनी प्रसिद्ध कहानी "पंच परमेश्वर" मैं लिखा है कि पंचों के दिलों में ही "परमेश्वर" निवास करते हैं और इस पंच परमेश्वर कहानी के माध्यम से उस ने अधिकारियों, न्याय विद्धों, शिक्षा शास्त्रियों, कर्मचारियों को मार्ग दर्शन करने के लिए ही यह कहानी लिखी थी, जिस को पढ़ कर के अन्याय करने वाले लोग भी मित्रता और शत्रुता को तिलांजलि देकर न्याय करने के लिए विवश हो जाते हैं और वास्तव में जो व्यक्ति न्याय की कुर्सी पर बैठता है, वह सचमुच परमपिता परमेश्वर, आदि पुरुष ही होता है। उस के मुख से निकली हुई आवाज सत्पुरुष की आवाज होती है, क्योंकि आदि पुरुष कभी भी किसी के साथ अन्याय नहीं करता है, जिस का आभास हम ने साक्षात किया हुआ है, जिन जिन लोगों ने हमारे साथ अन्याय, अत्याचार किया है, ईश्वर ने उन को कड़ी से कड़ी सजा दी है। विदेशी शासक अंग्रेजों ने भारत के सभी वर्गों को पूर्ण न्याय दिया है। बेदर्द राक्षसों ने सती प्रथा, बलि प्रथा, बाल विवाह और छुआछूत आदि प्रथाएं बना रखी थी, जिन के खिलाफ अंग्रेजों ने ही कानून बना कर के इन राक्...