भारत में मूलनिवासी आज भी गुलाम है
मेरे 85% मूलनिवासी साथियो,
सोहम, जय गुरुदेव!
जालिम अत्याचारी अंग्रेजों के खिलाफ सर्वप्रथम 1780 ईस्वी में भारत के मूल निवासियों ने ही विद्रोह किया था और अंधाधुंध कत्लेआम कर के अंग्रेजों का मनोबल और धैर्य गिराया था, जिस परिदृश्य को देख कर के अंग्रेज दांतों में उंगली दबा कर के मूलनिवासियों को देखते ही सहम जाते थे, जिस का जिक्र मैंने पिछले लेख में किया है, यदि वीर मातादीन बाल्मीकि का वाद विवाद मंगल पांडे नामक ब्राह्मण से ना होता और मंगल पांडे मातादीन को अपना लौटा दे देता, तो शायद ब्राह्मणों में तनिक भी जागृति पैदा ना होती मगर जब मंगल पांडे ने मातादीन बाल्मीकि को जातीयता के आधार पर लताड़ा और फटकारा तब मातादीन ने कहा था, कि "जिस कारतूस को आप लोग मुंह से खोलते हैं और बंदूक में डालते हैं, वह कारतूस तो चर्बी से सने हुए होते हैं, तब क्या आप भ्रष्ट नहीं हो जाते हैं? इसी बात को सुन कर के मंगल पांडे और उस के साथियों ने क्रोधित हो कर के अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह किया था, मगर ये दो नंबर का विद्रोह है क्योंकि इस से पहले मूलनिवासी वीर बहादुर "उदैया जी" शहीद हो चुके थे, जिन्हे! फांसी पर लटकाया जा चुका था मगर भारतवर्ष में मूलनिवासियों की जनसंख्या 85% है और मनुवादियों की जनसंख्या 15% है, जिस से अनुमान लगाया जा सकता है, कि 85% लोगों में से अधिक लोग स्वतंत्रता संग्राम में शहीद हुए हैं और 15% मनुवादियों में से अत्यंत कम शहीद हुए हैं।
स्वतंत्रता के बाद मूलनिवासी शहीदों के परिजनों को स्वतंत्रता नहीं दी गई और उंगली काट कर खून निकालने वाले मनुवादियों ने, वास्तविक स्वतंत्रता सेनानियों का इतिहास नष्ट करके उन्हें भुला दिया है और उनके वारिसों को गुलाम बना कर के रखा गया है। उन के परिजनों को आज 75 साल बीत जाने के बाद भी धन-धरती से महरूम रखा गया है, जो कुछ नौकरियां दी गई हैं, उन को भी छीन कर खत्म कर दिया जा रहा है। सरकारी नौकरियां ना दी जा सकें, जिस के लिए मनुवादी प्रधानमंत्रियों ने निजीकरण कर के मूलनिवासियों को स्वतंत्रता के पूर्व की स्थिति में ला खड़ा कर दिया है। फिर मनुवादी सरकारें यही चाहती हैं, कि भारत के मूलनिवासी उन के पुराने ढरे पर खड़े हो कर उन के गुलाम बन कर के, उन की चाकरी ही करते रहें मगर ये लोग भूल गए हैं, कि यदि भारत के मूलनिवासी भारत को आजाद करवाने के लिए अपने खून की नदियां बहा सकते हैं, बिरसा मुंडा और उदैया वीर ही नहीं, कोरेगांव के लड़ाके चमार अपनी आजादी को प्राप्त करने के लिए किसी भी सीमा तक जा सकते हैं, तो उस का अनुमान मनुवादी नहीं लगा रहे हैं, इसलिए समय है, कि भारतवर्ष के सभी जातियों के गरीबों को धन-धरती और नौकरी बराबर वितरित की जाएं अन्यथा सवर्णों के अपने सभी गरीब ही, अमीर सवर्णों को खा जाएंगे, क्योंकि जब कोई भूखा मरता है तो फिर उस को कुछ नजर नहीं आता है, उसे केवल रोटी ही नजर आती है और उस रोटी को पाने के लिए वह कुछ भी कर देता है, ऐसा समय ना आए उस से पहले ही मनुवादी प्रधान मंत्रियों को होश आ जानी चाहिए अन्यथा पछताने के सिवाए कुछ भी हाथ नहीं आएगा।
राम सिंह आदवंशी,
महासचिव।
बहुजन मुक्ति पार्टी हिमाचल प्रदेश।
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