भारत छोड़ो आंदोलन में मूल निवासियों की भूमिका

 मेरे 85% मूलनिवासी साथियो,

सोहम, जय गुरुदेव!

8 अगस्त 1942 को अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस मुंबई अधिवेशन के अनुसार मोहनदास करमचंद गांधी ने भारत छोड़ो आंदोलन शुरू किया था, जिस में ब्रिटिश सरकार से मांग की गई थी, कि ब्रिटिश सरकार के राजनेता तत्काल भारतीयों को आजाद कर के अपने देश इंग्लैंड चले जाएँ, जिस के कारण ब्रिटिश सरकार ने मोहनदास करमचंद गांधी को अरेस्ट कर के जेल में डाल दिया था, परंतु भारत के युवाओं ने गांधी के जेल में डाले जाने की कोई परवाह नहीं की थी और भारत छोड़ो आंदोलन में कूद पड़े थे। 

सुभाष चंद्र बोस, लाल बहादुर शास्त्री, डॉ राजेंद्र प्रसाद, बाबू जगजीवन राम, साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवालिया, स्वामी अछूताननंद महाराज, राम मनोहर लोहिया, ललई राम, आदि अनेकों मूलनिवासी राजनेताओं ने भारत को स्वतंत्र करवाने के लिए अपना एड़ी चोटी का जोर लगाया था, जिस के फलस्वरूप ही भारतवर्ष को आजादी मिली थी, मगर जिन जिन अज्ञात मूल निवासियों ने स्वतंत्रता आंदोलन के महायज्ञ में अपने खून की आहुति दी है, उन को इतिहास के पन्नों में दर्ज नहीं किया गया है, जिस के कारण भारत के मूल निवासियों को अपने स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में पूरी ज्ञान नहीं है मगर जिन जिन आजादी के परवानों ने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में मूल निवासियों का मान सम्मान बढ़ाया है, उन में बाबू गंगा राम धानक का नाम सर्वोच्च स्थान पर है, इन्होंने हरिजन उत्थान आंदोलन से अलग हो कर के दलित उत्थान जागृति का संकल्प लिया था। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के वे नायक बन गए थे। बाबू गंगाराम धानक, भोला राम पासवान, जगलाल चौधरी, उत्तर प्रदेश के धर्म प्रकाश, रामजी लाल सहायक, जौनपुर के माता प्रसाद, खुद गंज के प्रेमचंद आर्य, राजस्थान के गोविंद गुरु, एमआर कृष्णा और नागप्पा, मध्य प्रदेश के भगवती चंद्राकर, दलित समूह के ये क्रांतिकारी परवाने अंग्रेजों से भिड़ गए थे और जम कर युद्ध लड़ा था, दलित मुक्ति की लड़ाई भी लड़ी गई थी। 1942 के बाद भारत छोड़ो आंदोलन के नायक भोला पासवान ने आजादी के बाद अछूतों में जागरूकता पैदा करने के लिए अनेक कार्य किए थे। उत्तर प्रदेश के धर्म प्रकाश ने छल कपट की प्रतीक आर्य समाज के झंडे के नीचे दलित आत्मसम्मान जागृत करने के लिए अभियान चलाया था और भारत छोड़ो आंदोलन के महानायक बन गए थे। मेरठ के रामजी लाल सहायक ने 1942 में दलित युवकों को बड़ी संख्या में तैयार किया था और आंदोलन के साथ जोड़ा था, इन का कोई इतिहास उपलब्ध नहीं है। 1960 में वे उत्तर प्रदेश के शिक्षा मंत्री भी रहे, तब उत्तर प्रदेश में आर एस एस नाम की कोई संस्था नहीं थी। 4 अप्रैल 1922 को उस समय दंगे भड़क उठे थे, जब सरकार ने भोजन के बढ़ते हुए दामों को चैलेंज करने पर छात्रों ने असहयोग आंदोलन चलाया था, तब उन का साथ मूल निवासी भगवान अहीर ने दिया था, जिस के कारण चौरा-चोरी में आंदोलनकारियों को अरेस्ट कर के बड़ी बेरहमी से पीटा गया था। जब चार अप्रैल 1922 को मार्केट लेन चौरा की तरफ से आंदोलनकारियों की ओर जाने लगे तब पुलिस ने आंदोलनकारियों पर गोली चला दी थी जिस के कारण आंदोलनकारियों ने कई पुलिस स्टेशनों को आग लगा दी थी, जिस में 19 लोगों की मौत हो गई थी और 14 लोगों को उम्रकैद दी गई थी, इस काल-कराल आंदोलन में 23 अंग्रेज सिपाही जल कर राख हो गए थे, जिस के लिए सैकड़ों अनुसूचित जाति, जनजाति के लोगों को फांसी पर लटकाया गया था, जिस का नायक रमापति चमार था, जिस कांड मे 288 लोगों के ऊपर अपराधिक मामले चले थे, इन में से 172 स्वतंत्रता सेनानियों को फांसी की सजा सुनाई गई थी। 2 जुलाई 1923 को रमापति को फांसी दी गई थी। 

ये कुछ एक अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ी जाति के जाबांज रणबांकुरों की अधूरी जानकारी मिली है, मगर ये केवल अकेले ही स्वतंत्रता संग्राम में काम नहीं करते थे, इन के साथ इन के और भी साथी स्वतन्त्रता आंदोलन में शामिल थे, मगर उन के नाम नहीं मिलते हैं, पंजाब के जलियांवाला कांड में सारे के सारे शहीद मूलनिवासी ही हैं मगर जातीय भेदभाव के कारण किसी भी रिकॉर्ड में उन की जाति शामिल नहीं की गई है। भारत के मूलनिवासी साहित्यकारों और इतिहासकारों को चाहिए कि वे इस पर रिसर्च कर के मूलनिवासी वीर, बहादुर स्वतंत्रता सेनानियों को इतिहास के पन्नों में अंकित करें अन्यथा उंगली में कट मार कर खून निकालने वाले ही अमर शहीद कहलाए जाते रहेंगे।

राम सिंह आदवंशी।

महासचिव,

बहुजन मुक्ति पार्टी हिमाचल प्रदेश


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