भारत में गिरते हुए शिक्षा विस्तार के लिए कौन जिम्मेदार

 

मेरे 85% मूल निवासियो,
सोहम, जय गुरुदेव!
आप भली-भांति समझ चुके हैं, कि भारत की शिक्षा व्यवस्था की क्या दुर्दशा होती जा रही है। पहले बच्चों के एडमिशन पर कोई खर्चा नहीं होता था, ना ही किसी को कोई भारी भरकम राशि चुकानी पड़ती थी। बच्चों की किताबें भी छोटी-छोटी ही हुआ करती थी। पहली कक्षा में हमें केवल जोड़, घटाना, भाग, गुना ही सिखाया जाता था, जिस के लिए केवल एक छोटी सी स्लेट-स्लेटी, कलम, दवात और छोटी सी ही पुस्तक हुआ करती थी, उस के साथ भाषा सिखाने के लिए भी एक छोटी सी पुस्तक हुआ करती थी, इन दोनों पुस्तकों के पढ़ाने से ही गणित और भाषा का गूढ़ ज्ञान हो जाता था। इसी तरह अगली कक्षाओं में भी सामाजिक विज्ञान आदि विषय ही पांचवी तक पढ़ाए जाते थे। बच्चों के थैलों का वजन केवल एक या दो किलो हुआ करता था मगर इतनी कम किताबें होने के बाबजूद भी बच्चों का सामान्य ज्ञान वर्तमान बच्चों से अधिक ही होता था। बच्चों को पहाड़े मौखिक रूप से याद करवाए जाते थे और बच्चे भी उन पहाड़ों को तत्काल कंठस्थ कर के अपने गणित विषय के सवालों को तत्काल हल कर लेते थे मगर वर्तमान में केल्कुलेशन के लिए केलकुलेटर का ही प्रयोग करते हैं।
महंगी शिक्षा:----- पहले एनसीईआरटी के कार्यालय नहीं थे, इसलिए शिक्षा शास्त्री छात्रों के लिए पाठ्यक्रम घरों में ही तैयार करते थे, वे बच्चों के फंडामेंटल गणित, भाषा और विज्ञान को महत्व दे कर के उन के ऊपर ही बच्चों का ध्यान फोकस करते थे, उन को बेठने के लिए ना तो शीशे के महल होते थे, ना ही उन के पास लग्जरी गाड़ी होती थी और ना ही उनको विशेष सरकारी वेतन व भत्ते मिलते थे, मगर इस के बावजूद भी वे छात्रों का पाठ्यक्रम उन की आयु के अनुसार बड़े मनोवैज्ञानिक ढंग से तैयार करते थे। बच्चों की आयु और उन की बौद्धिक क्षमता के अनुसार, माता-पिता की आर्थिक स्थिति के अनुसार किताबों का चयन और निर्धारण करते थे, मगर आज सरकारी वेतन पर पलने वाले शिक्षा शास्त्री ऊंचे ऊंचे शीशे के भवनों में बैठ कर छात्रों के लिए पाठ्यक्रम तैयार करते हैं। वे यह नहीं सोचते हैं कि जिन पाठयक्रमों, किताबों को हम छात्रों के लिए प्रस्तावित कर रहे हैं, क्या वे उन की बौद्धिक क्षमता के अनुकूल हैं? क्या यह भारी भरकम किताबों का भार बच्चे उठा भी सकते हैं या नहीं? क्या अध्यापक भी इन कठिन पाठ्यक्रमों को एक साल में बच्चों को समझा कर के पूर्ण कर भी सकता है या नहीं? आज बच्चों के थैले इतने भारी भरकम हैं कि उन को वच्चे भी उठा नहीं सकते हैं। शुक्र तो यह है कि अब बच्चों के लिए सभी प्राइवेट स्कूलों ने, बस की सुविधाएं उपलब्ध करवा दी हैं, इसलिए अमीर अभिभावक बच्चों के थैले बस में छोड़ कर आते हैं, मगर फिर भी इतने भारी भरकम  बोझ उठाते उठाते बच्चे थक जाते हैं ! बच्चे भी इन किताबों में इतने उलझे रहते हैं कि वे आधा काम तो घर पर अपने माता-पिता से करवाते हैं, जिस से बच्चों को कोई लाभ नहीं होता है।
अध्यापकों के लिए भी एनसीईआरटी ने इतना काम दे दिया है कि वे उसी को पूरा करने में उलझ कर रह जाते हैं। अब तो हर महीने बच्चों के टेस्ट रखे गए हैं, अध्यापक उन्हीं के टेबुलेशन में उलझा रहता है, उन्हीं के परिणाम बनाने में व्यस्त रहते हैं, फिर छात्रों को वे पढ़ाने के लिए पूरा समय नहीं दे पा रहे हैं और अध्यापकों को मजबूरन छात्राओं को प्रमोट करना पड़ रहा है, जिस से शिक्षा का स्तर दिन प्रतिदिन गिरता जा रहा है, उधर ऐसे शिक्षा मंत्री बनाए जा रहे हैं जो नाच गाने गा कर के जिंदगी बसर करते रहे हैं, जो कई कई वर्षों तक प्रधान बन कर गांव के लोगों के लड़ाई झगड़ों को सुलझाते रहे, जिन्होंने कभी शिक्षा देने का काम नहीं किया है, उन्हीं लोगों को शिक्षा मंत्री बनाया जा रहा है। ऐसे ही लोगों को शिक्षा सचिव बनाया जा रहा है, जो खुद ही शिक्षा की परिभाषा नहीं जानते हैं, जब कि शिक्षा सचिव केवल शिक्षा निदेशकों को ही बनाया जाना चाहिए, जिन को लंबे समय तक पढ़ाने का अनुभव होता है। वर्तमान शिक्षा व्यवस्था तो गरीबों की तवाही करने के लिए बनाई जा रही है ताकि गरीब उच्च शिक्षा ग्रहण ही ना कर सके और अमीरों की ही चाकरी करते रहें।
अक्षम शिक्षक:----- 1980 से लेकर आज तक नालायक मुख्यमंत्रियों ने अपना बजट बचाने के लिए, शिक्षा का निजीकरण कर के, मूर्ख, गँवार धन्ना सेठ अमीरों को विद्यालयों, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों का ठेकेदार बना दिया है, अप्रशिक्षित लोगों को अध्यापक नियुक्त कर के शिक्षा का बेड़ा गर्क कर दिया है। सरकार अपने बेरोजगार चहेतों को चोर दरवाजे से भर्ती करने के लिए अप्रशिक्षित वालंटियर अध्यापक, पीटीए अध्यापक, पैट अध्यापक, सीएमसी अध्यापक, पैरा अध्यापक आदि ना जाने कितने प्रकार के चोर दरवाजे तैयार कर के नालायक लोगों को पढ़ाने के लिए स्कूलों में तैनात कर दिया है, जिन को बाद में दो, तीन महीने की ट्रेनिंग दे कर के रेगुलर कर दिया गया है, जिन्हों ने बच्चों की शिक्षा की बर्बादी कर के उन के साथ खिलवाड़ किया गया है, मगर शिक्षा मंत्री और मुख्यमंत्री यह नहीं समझते हैं कि यदि शिक्षा अच्छी नहीं दी गई, तो देश में राक्षस ही पैदा होंगे और वे सड़कों पर उतर कर के सभी को खा जाएंगे। आज युवा लड़के, लड़कियां अपने माता पिता को ही मानसिक, शारीरिक रूप से प्रताड़ित करते जा रहे हैं, जिस का मुख्य कारण ही वर्तमान शिक्षा व्यवस्था है, जिस में ना तो अच्छी धार्मिक और ना ही सामाजिक, ना ही पारिवारिक शिक्षा दी जा रही है, केवल बच्चों को साक्षर कर के विश्व को यही दिखाया जा रहा है, कि भारत की जनता शत प्रतिशत साक्षर हो चुकी है।
राम सिंह आदवंशी।
महासचिव,
बहुजन मुक्ति पार्टी हिमाचल प्रदेश। ।

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