देश के गद्दारों को गोली मारो सालों को
मेरे 85% मूलनिवासी साथियो,
सोहम, जय गुरुदेव!
यूरेशिया से आए विदेशी, भारत की जनता को, आपस में लड़ाने, भड़काने और मूर्ख बनाने के लिए तो कई प्रकार के नारे, सलोगन लगाते रहते हैं, और लगा भी रहे हैं मगर जनता को आपस में समरसता सिखाने के लिए, इन के पास कोई सद्बुद्धि और दिमाग नहीं है, इसीलिए तो कुछ महामूर्ख कई प्रकार के घटिया सलोगन तैयार कर के बोट लेते आए हैं, "गरीबी हटाओ देश बचाओ", कांग्रेस के इस नारे ने सारे भारत के समस्त गरीब मूलनिवासी लोगों का मन मोह लिया था, सभी इस लुभावने नारे के आकर्षण से आकर्षित हो कर कांग्रेस के दिवाने हो गए थे और मूलनिवासियों ने इंदिरा गांधी की सरकार बना डाली मगर केवल नारे की चकाचोंध से ही मूलनिवासी लोगोँ का पेट भरा गया, गरीबी ना तो हटाई गई, ना हटाने के लिए ही प्रयास किया गया बल्कि गरीबों को ही हटाने के लिए कांग्रेस ने सब कुछ निजी क्षेत्र में दान देना शुरू कर दिया, जिस से गरीबों को सरकारी सेक्टर में जो कुछ मिलता था, वह भी छीन लिया जाने लगा। कांग्रेस की धोखेबाजी से छ्ले गए मूलनिवासी फिर भाजपा के लोलुप "सब का साथ, सब का विकास" नारे को सुन कर भाजपा की ओर चुंबक की तरह आकर्षित हो गए मगर मिला क्या, केवल शत प्रतिशत निजीकरण, जिस से आरक्षण खत्म कर दिया गया। देश के गरीबों का बेकारी से ध्यान हटाने के लिए एक और गुंडों ने नारा दे दिया, *देश के गद्दारों को गोली मारो सालों को* ताकि लोग हिंदू-मुस्लिम बन कर आपस में खून खराबा करते हुए, आपस में मरते कटते रहें। मूर्ख लोग भोली-भाली जनता को गद्दार घोषित कर सकते हैं, गोली मारने के लिए लोगों को उकसा सकते हैं, खून की नदियां बहाने के लिए उकसा सकते हैं मगर इन मूर्खों के पास समाज को सुधारने के लिए, आपस में समरसता पैदा करने के लिए अच्छे नारे बनाने के लिए कोई अकल नहीं है, जब कि इंसान को इंसान के साथ इंसानियत का प्रयोग कर के महा मूर्ख इंसानों को भी अच्छे इंसान बनाने के लिए का काम करना चाहिए, मगर लड़ाने, भड़काने और उकसाने वाले ये महामूर्ख, गँवार नेता लोगों को सुधारने और समझाने के लिए ना तो बुद्धि रखते हैं और ना ही इन सांप्रदायिक लोगों के पास दिमाग होता है। मूर्खों की टोलियों के साथ चल कर मूर्खता ही करते जाते हैं, जिस के लिए खुद तो भयंकर परिणाम भुगतते ही हैं परंतु दूसरों को भी कानून हाथ में ले कर खून खराबा करवा कर भयंकर परिणाम भुगतने के लिए विवश कर देते हैं, जिस से सारे समाज में तनाव फैलता है, दंगे-फसाद होते हैं, शहर जलते हैं, धरती के ऊपर खून की नदियां बहती हैं।
आजादी के बाद ना जाने कितने दंगे फसाद हो चुके हैं ,उन में ना जाने कितने लोग मारे जा चुके हैं, कितने बच्चे यतीम हो चुके हैं, कितनी औरतें विधवा हो चुकी हैं, मगर ये दंगेवाज कभी नहीं सोचते हैं, कि जो हम कुकृत्य करने जा रहे हैं उस से कितने लोगों को दुख सहन करने पड़ेंगे? हिंदू-मुस्लिम, सिख-ईसाई के नाम पर आए दिन ये लोग दंगे करते और करवाते रहते हैं, जिन में कई निर्दोष मारे जाते हैं, मगर सरकार भी इस विषय पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं करती है, कार्रवाई इसलिए नहीं करती है, क्योंकि ये दंगेबाज ही सरकार की सहमति से दंगे- फसाद करते हैं, राजनेता ही गुंडे समर्थकों के सहयोग से सरकारों को बनाते हैं, जिस कारण उन समर्थकों की बात सरकार को माननी ही पड़ती है मगर जनता को चाहिए कि वह ऐसे गुंडा तत्वों के आह्वान पर किसी के साथ लड़ाई झगड़ा, दंगे फसाद ना करें। आपस में मिलजुल कर रहे और ऐसे गुंडे नेताओं को गांव में घुसने तक ना दें, उन की ऐसी सेवा करें कि उन को नानी याद आ जाए, ताकि भविष्य में कोई भी दंगा फसाद ना करवा सके और ना ही मासूम लोगों को मरवा सके।
रामसिंह आदवंशी।
महासचिव,
वहुजन मुक्ति पार्टी हिमाचल प्रदेश।
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