मूल निवासी है प्रारंभिक क्रांति के मूलनायक थे

 मेरे 85% मूलनिवासी साथियो,

सोहम, जय गुरुदेव!

बड़ी दूर तक नजर दौड़ाने के बाद कभी-कभी यह महसूस होता है कि क्या आजादी की लड़ाई में हमारे मूल निवासियों का कोई योगदान था या नहीं, क्योंकि भारत के मनुवादी साहित्यकार मूलनिवासियों के इतिहास को तोड़ मरोड़ कर लिखते आए हैं, जिस के कारण मूलनिवासी समाज के रणबांकुरों की तस्वीर साफ नजर नहीं आती है। भारतवर्ष मुसलमानों और अंग्रेजों का लगभग पंद्रह सौ साल तक गुलाम रहा, इतने लंबे समय तक भारत के मूलनिवासी हिंदुओं, मुसलमानों और अंग्रेजों के अत्याचारों को सहन करते रहे परंतु सहन करने की एक सीमा होती है। जब उस की सीमा का अतिक्रमण हो जाता है, तो जनता विद्रोह कर देती है, जिस से लगता है कि भारत के मूलनिवासियों ने हिंदुओं, सिखों, मुसलमानों और अंग्रेजों के अत्याचारों से लोहा लिया होगा, जिस में वे भी शहीद भी हुए होंगे, मगर मनुवादी लेखकों और साहित्यकारों ने मूल निवासियों के बलिदानों को नजरअंदाज कर के केवल हिंदू और मुसलमान शहीदों के इतिहास को ही सुनहरी अक्षरों में लिखा है, जब कि इन की जनसंख्या नाम मात्र ही है, परंतु जिन कुछ मनुवादी लोगों ने शहादत दी है, उन के नाम तो इतिहास के पन्नों में गोल्डन अक्षरों में लिखे गए हैं मगर भारत के 85% मूलनिवासियों के नाम गोल्डन अक्षरों में तो क्या लिखने हैं, उन का नाम काले अक्षरों में भी कहीं नहीं लिखा गया है, हाँ अगर लिखे गए हैं, तो इस ढंग से लिखे हैं, कि वे भी मनुवादी हिंदू ही ज्ञात होते हैं।

अंग्रेजों ने 1600 ईसवी में भारत के ऊपर कब्जा करना शुरू कर दिया था और भारतीयों के ऊपर अत्याचार, अनाचार और व्याभिचार भी उस समय ही शुरू हो गए थे, जिन के खिलाफ विद्रोह तो अवश्य होते रहे होंगे। सन 1780 ईस्वी में भारत के मूल निवासियों ने खुल कर जंगे मैदान में आ कर के अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध का बिगुल बजा दिया था, जिस का नेतृत्व बिहार के संथाल परगना से परम वीर तिलका मांझी ने किया था। तिलका मांझी ने ताड़ के पेड़ के ऊपर चढ़ कर के अनगिनत अंग्रेजों को मौत के घाट उतार दिया था। उस के बाद यह खूनी क्रांति महाराष्ट्र, बंगाल और उड़ीसा के आदिवासियों में जंगल की आग की तरह फैलती ही गई। ये क्रांति अंग्रेजों के लिए नाक में दम बन गई। इस विद्रोह में सिद्धू संथाल और गोची मांझी ने जो धूम मचाई थी, उस की वीरता और साहस से अंग्रेज थरथर कांपते थे। 

1804 में मातादीन बाल्मीकि को फांसी दी गई, उस के बाद छतरी के नवाब की ओर से परमवीर उदैया चमार अंग्रेजों के खिलाफ लड़े और वे भी अंग्रेजों के द्वारा पकड़े गए, इन को 1807 को फांसी पर लटका दिया गया, उस के बाद चमार जाति के जांबाज़ युद्ध वीरों ने अपने वीर बहादुर मातादीन और परमवीर उदैया के कारवां को आगे बढ़ाने के लिए अपने आप को पूरी शक्ति से संगठित करके, अपने शहीदों के अधूरे कारवां को पूरा करने के लिए अपना विराट रूप धारण कर के, स्वतन्त्रता संग्राम को तीव्र गति दे दी।

बांके बिहारी चमार गाँव "कुँवर पुर", तहसील मछली, जिला जौनपुर के निवासी थे, जिन के नेतृत्व में स्वतंत्रता संग्राम को विकराल रूप दे दिया गया और उनके सैकड़ों साथियों ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ाना शुरू कर दिए, उन्होंने अंग्रेजों का जीना मुहाल कर दिया था, मौत का ऐसा तांडव नृत्य किया गया कि अंग्रेज "बांके बिहारी" के नाम से ही खौफ खाने लगे। जब बांके बिहारी चमार अंग्रेजों का कत्लेआम करते थे, तो अंग्रेज उन को ढूंढते थक जाते थे मगर वे उन के हाथ नहीं आते थे। अंग्रेज पुलिस ने उन को पकड़ने के लिए पचास हजार की विशाल धनराशि इनाम देने के लिए रखी थी। उस समय पचास हजार रुपए का इनाम वर्तमान करंसी के हिसाब से 50 करोड़ हो सकता है। इस राशि से ही अनुमान लगाया जा सकता है, कि बांके बिहारी कितने बड़े खूंखार क्रांतिकारी थे, जिन को पकड़ने के लिए इतना बड़ा धन खर्च किया जा रहा था, जब कि उस समय दो पैसे से हाथी, घोड़े खरीदे जा सकते थे। 

रामसिंह आदवंशी।

महासचिव,

बहुजन मुक्ति पार्टी हिमाचल प्रदेश। 


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