85% मूलनिवासी जनता का 1857 की क्रांति में योगदान
मेरे 85% मूलनिवासी साथियो,
सोहम, जय गुरुदेव!
1947 से ही बच्चों को भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास पढ़ाया जाता रहा है मगर मुझे याद है, कि हमें कहीं भी भारत के मूलनिवासी अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़ी जाति के शहीदों के बारे में कहीं कोई जिक्र नहीं मिला है। इन जातियों के वीर, बहादुर, जांवाज रणबांकुरे को इतिहास के पन्नों में कोई जगह नहीं दी गई और ना ही स्कूलों में बच्चों को इन के बारे में पढ़ाया गया। महारानी लक्ष्मी बाई की कविता जरूर पढ़ी थी कि वह "खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी" मगर जब वे किले में घिर गई थी और बाहर निकलने के लिए उस की हिम्मत नहीं पड़ रही थी, तब केवल मूलनिवासी वीरांगना झलकारी बाई जी ने लक्ष्मीबाई का पहरावा पहन कर के, हाथ में दमकती हुई तलवार लेकर के, घोड़े पर सवार हो कर के, कत्लेआम का खूनी खेल खेलती हुई, किले से बाहर निकली थी, जिससे अंग्रेजी सेना ने समझा कि यही झांसी की महारानी है और इस प्रकार झलकारी बाई ने अंग्रेजों को चकमा दे कर के महारानी झांसी के प्राणों को बचाने का प्रयास किया था और अंग्रेजों को किले से बाहर भागने के लिए विवश कर दिया था मगर जब लक्ष्मी बाई के बारे में पढ़ाया गया, तो उस में कहीं भी उस की प्राण रक्षिका झलकारी बाई का कोई जिक्र तक नहीं किया गया था, कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान की मनुवादी लेखनी ने झलकारी बाई के लिए, उसी कविता में दो पंक्तियाँ ना लिख कर अपना जातिवादी चेहरा ही प्रकट किया है, मगर जब साहिब कांशी राम जी ने बहुजन आंदोलन शुरू किया और सारे देश का भ्रमण किया था, तब उन को झलकारी बाई की वीरता और साहस का पता चला और उन्होंने अपने ऐतिहासिक सप्ताहिक समाचार पत्र "बहुजन संगठक"में झलकारी बाई के बारे में विस्तार से लिखा, जिस को पढ़ कर के हमें यह पता चला कि भारत के मूल निवासियों ने सन 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के महायज्ञ में अपने खूनी की आहुति दी थी। वीरांगना झलकारी बाई 1857 में भारत की दूसरी खूनी महाक्रांति में अपनी शहादत दे कर के 85% मूलनिवासी नारियों के मान और सम्मान का प्रतीक बन गई थी, उन के साथ ही झलकारी बाई की जाति की असंख्य सहेलियों ने भी संग्राम के महायज्ञ में अपने प्राणों की आहुति दी थी मगर उस समय कोई भी मूलनिवासी लेखक और साहित्यकार नहीं था जो उन की वीर गाथाओं को लेखनी बंद कर के हमारे लिए सुरक्षित रख देता, इसी प्रकार सन 18 57 में ही राजा बेनी माधव को भी अंग्रेजों ने कैद में डाल दिया था, जिस को बचाने के लिए कोई भी मनुवादी आगे नहीं आया था और उस समय अंग्रेजों के छक्के छुड़ाने वाला "बीरा पासी" ही ऐसा मूलनिवासी वीर योद्धा था जिस ने राजा बेनी माधव को मुक्त करवा कर के अपनी वीरता और बहादुरी का परिचय दिया था, उन के साथ मूलनिवासी योद्धा "नोहर दास, गरीबदास, बिरजा राम, फलई राम, संपत्ति चमार, अयोध्या प्रसाद, कल्लू चमार, शिवदान, बिरसा मुंडा, मेढई राम, मैकूलाल, सिंह राम, सुखराम, सबराउ, मालदेव, रामधन, कल्लू चमार, उदा देवी पासी, महावीरी देवी बाल्मीकि और वीर शहीद उधम सिंह "के नाम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के जांवाज रणबांकरों को ढूँढ कर हमारे वर्तमान मूलनिवासी साहित्यकारों ने स्वर्ण अक्षरों में दर्ज किये हैं।
राम सिंह आदवंशी,
महासचिव,
बहुजन मुक्ति पार्टी हिमाचल प्रदेश
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