85% मूलनिवासी 15% मनुवादियों के गुलाम हैं
मेरे 85% मूल निवासियो,
सोहम, जय गुरुदेव!
बड़ी हैरानी की बात है कि भारत के मूलनिवासी 85% हैं और 85% लोगों का शोषण करने वाले केवल 15% लोग ही हैं। कहां 85% और कहां 15% लोग। 15% लोग अल्पसंख्यक हो कर के भारतवर्ष में पूरी एकता के साथ मिलकर रहते हैं इन लोगों ने आंतरिक रुप से एक समझौता कर रखा है, कि भारतवर्ष के मूलनिवासी, आदवंशी, आदिवासी लोगों को आपस में फूट डाल कर, लड़ा-झगड़ा झगड़ा कर के रखेंगे, ताकि ये लोग आपस में कभी इकट्ठे ही ना हो सकें, यदि एक गांव में सभी मूलनिवासी रहते हों तो वहां एक ब्राह्मण बसा दिया जाता है और वह ब्राह्मण सारे गांव को नारद मुनि की तरह सच झूठ कह कर के आपस में लड़ाता रहता है। कई बार तो इन मूर्ख आदिवासियों, मूलनिवासियों को, मनुवादी नारद मुनि एक दूसरे के खिलाफ चुगली लगा कर, षड्यंत्र रच कर इतना लड़ाते हैं, कि वे एक दूसरे के खून के प्यासे भी हो जाते हैं मगर ये मनुवादी लोग खुद धार्मिक और राजनीतिक रूप से एकता बना कर के जीवन यापन करते हैं। ब्राह्मणों ने तो ऐसा संकल्प लिया हुआ है कि वह किसी भी संगठन के चुनाव हों, उस में प्रधान पद तो हमेशा छल बल से ब्राह्मणों के लिए ही लेते हैं, चाहे वह चुनाव झाड़ू लगाने वाले सफाई कर्मचारियों का ही क्यों ना हो? उस चुनाव में भी ब्राह्मण ही प्रधान चुना जाएगा, बाकी राजपूत, खत्री, शूद्र चाहे कितने भी इंटेलिजेंट, योग्य और बुद्धिमान क्यों ना हो? कोई प्रधान नहीं बन सकता है, इसी तरह क्लास वन, टू, थ्री, फोर के कर्मचारी और अधिकारी संगठनों के चुनावों में भी इसी विचारधारा को ध्यान में रख कर ब्राह्मण "प्रधान पद" को छीन लेता है। मनुवादी अच्छी तरह जानते हैं, कि मनुस्मृति में सब से अधिक गंदगी भरी पड़ी है, मगर ये सभी लोग मनुस्मृति को अपना धार्मिक ग्रंथ मानते हैं और उस के अनुसार ही जीवन यापन करते हैं। मनुस्मृति के अनुसार ही विशाल भारतवर्ष के 85% प्रबुद्ध मूलनिवासी लोगों को डिवाइड एंड रूल के द्वारा गुलाम बनाए रखने के लिए 6743 जातियों में बाँटा हुआ है और इन को इस ढंग से बांटा गया है कि केवल चमड़े का काम करने वाले लोगों के 1100 नाम रख कर खंड खंड कर के उन को बुरी तरह से तोड़ फोड़ कर विभाजित किया गया है, जिस से वे आपस में कभी इकठ्ठे बैठ कर के खा पी नहीं सकते हैं।
मनुवादियों ने मूलनिवासियों को डराने धमकाने और दबाने के लिए, हिंदू वाहिनी, शिवसेना, श्री राम सेना, गायत्री परिवार सेना, आर्य परिवार सेना, करणी सेना, दुर्गा वाहिनी, बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद, गौ रक्षा दल, स्वाध्याय दल, और इन का सब से बड़ा आतताई, अत्याचारी, क्रूर और देश की अर्थव्यवस्था को ध्वस्त कर के भारत के मूलनिवासियों की शिक्षा को खत्म कराने वाला आर एस एस दल है। आर एस एस ने कांग्रेस, बीजेपी, कम्युनिस्ट पार्टी और अन्य क्षेत्रीय दलों की राजनीतिक पार्टियों के ऊपर आपाना पूर्ण अधिपत्य किया हुआ है, जिस ने मूल निवासियों को गुलाम बनाने के लिए इन दलों को अपनी इच्छा अनुसार काम करने के लिए विवश किया हुआ है। मूलनिवासियों के साथ बलात्कार, अत्याचार, गुंडागर्दी हर रोज होते रहते हैं, ये सभी संगठन इन लोगों का साथ देते आ रहे हैं मगर ठीक इस के विपरीत मूलनिवासियों के नेता काम कर रहे हैं। महाराष्ट्र के ही रामदास अठावले, उदित राज, राज रतन, बीड़ी बोरकर, प्रकाश आंबेडकर, वामन मेश्राम, एडवोकेट भानु प्रताप सिंह, विजय मानकर, चंद्रशेखर, मीरा कुमार, मायावती आदि अपनी डफली अलग-अलग बजा रहे हैं। ये सभी लोग कभी भी एक मंच पर इकट्ठा नहीं होते हैं, जब कि 15% मनुवादी सभी सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक संगठनों में अलग-अलग रह कर भी आंतरिक रुप से इकट्ठे मिल कर के भारतवर्ष के 85% मूलनिवासियों को गुलाम बना कर रखते आ रहे हैं, जिन से मूलनिवासी नेता और नेत्रियाँ रंच मात्र भी एकता का पाठ नहीं सीखते हैं और ना ही आपस में मिल कर के उन का मुकाबला करते हैं, जब कि 85% मूलनिवासियों के पास बाहुबल के सिवाय मनुवाद का मुकाबला करने के लिए, ना तो कोई हथियार हैं, ना धन बल है, जिस के बल पर ये लोग मनुवाद का मुकाबला कर सकें।
आजादी के बाद कांग्रेस पार्टी ने अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़ी जाति के वोट ठगने के लिए सरदार वल्लभ भाई पटेल को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया था मगर बाद में छ्ली, धोखेबाज गांधी ने उन को प्रधानमंत्री ना बना कर जवाहरलाल नेहरू को प्रधानमंत्री बना दिया था, उस के बाद कांग्रेस पार्टी ने बाबू जगजीवन राम जी को आगे रख कर के 50 सालों तक मूलनिवासियों के वोट ठगे और अंत में उन को भी प्रधानमंत्री बनने नहीं दिया। बाबू जगजीवन राम ने दुखी हो कर कांग्रेस का सर्वनाश करने के लिए कांग्रेस से त्याग पत्र दे कर जनता दल की अर्थी को कन्धा दिया, जिन के सहयोग से जनता दल वहुमत से सत्ता में आ गया मगर फिर सभी मनुवादी एक मंच पर इकट्ठा हो गए और जिस बाबू जगजीवन राम के नाम पर जनता दल सत्ता में आया, उस को फिर प्रधान मंत्री नहीं बनाया गया। इन दोनों ही नेताओं की दुर्दशा को मूलनिवासी नेताओं ने कभी नहीं समझा और ना ही उन से शिक्षा ली और ना ही कभी एक मंच पर इकट्ठा होने का प्रयास किया, क्रांतिकारी बहुजन आंदोलन के अवतार साहब कांशीराम जी ने ओबीसी नेता मुलायम सिंह यादव जी को केवल एक ही बार अपने साथ मिलाया था और अनुसूचित जाति, जन जाति और ओबीसी समाज की एकता स्थापित कर के उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी की सरकार बना ली थी मगर उस के बाद उन की कल्पित आयरन लेडी ने मनुवाद के साथ मिल कर के बहुजन समाज को मनुवाद के पास गिरवी रख कर, साहिब कांशी राम जी के वहुजन आंदोलन का सर्वनाश कर दिया। अब महामानव वामन मेश्राम जी, कमलकांत काले, वीएल मातंग ही इन सभी लोगों को एक मंच पर इकट्ठा करने का प्रयास करते आ रहे हैं, मगर बाकी सभी मूलनिवासी राजनेता मनुवादी एनडीए और यूपीए में शामिल हो कर के अपने परिवारों का पालन पोषण और अपना कल्याण करने में लगे हुए हैं, ये सभी स्वार्थी नेता आरक्षण से जीत कर के विधायक, सांसद और मंत्री बन कर उन लोगों को धोखा देते आ रहे हैं, जिन के अधिकारों की रक्षा के लिए, इन को विधान सभाओं और संसद में भेजा जाता है।
इसलिए साथियो आप से विनम्र निवेदन है, कि आप सभी वामन मेश्राम जी, वीएल मातंग और कमलकांत काले के हाथ मजबूत करने के लिए, बहुजन मुक्ति पार्टी के संयुक्त गठबंधन को सत्ता में लाने के लिए एक मंच पर इकट्ठे हो जाओ, यदि आप 85% मूलनिवासी इकठ्ठे हो जाते हैं, तो आप की बर्बादी करने वाले सभी स्वार्थी और कपटी मूलनिवासी नेता भी मिट्टी में मिल जाएंगे, जिस से आप सभी आजादी से जीवन जी सकेंगे अन्यथा मनुवाद के ही गुलाम रहोगे। मुझे आशा है, आप सभी केवल बहुजन मुक्ति पार्टी के ही संयुक्त गठबन्धन को सत्ता में लाने के लिए एक जुट हो जाएंगे।
राम सिंह आदवंशी।
महासचिव,
बहुजन मुक्ति पार्टी हिमाचल प्रदेश।
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