भारत के मूलनिवासी राजनेता कभी इकट्ठा नहीं होते

 

मेरे 85% मूलनिवासी साथियो,
सोहम, जय गुरुदेव!
आदि पुरुष से लेकर के सम्राट सिद्धचानो जी महाराज और उन की राजेश्वरी लोना जी उर्फ कामाख्या देवी ने मक्का मदीना से ले कर कन्याकुमारी तक सुशासन किया था, जिन के अंतिम सम्राट शिवशंकर भोले हुए हैं। यह अत्यंत भोला भाला और ईश्वर भगत शासक था, जिस में इंसानियत कूट-कूट कर भरी हुई थी, उन की महारानी गौरजां अत्यंत कुशल गृह मंत्री थी जिस की शासन और प्रशासन पर मजबूत पकड़ थी। वह भोले भाले शिवशंकर के शासन और प्रशासन को बड़ी कुशलता पूर्वक चलाया करती थी, जिस के भय से कोई भी विदेशी भारतवर्ष की सीमा में घुस तक नहीं सकता था, जो घुसने का प्रयास करता था, उस को तत्काल मौत के घाट उतार दिया जाता था, इसी कारण यूरेशियन आर्यों ने उस को छल बल से मौत के घाट उतार दिया और दक्ष की सुंदर कन्या पार्वती के साथ भोले भाले शिव शंकर को अपने जाल में फंसा लिया था। पार्वती से उस को धीमा जहर और भांग पिला पिला कर के मार दिया था, जिस के कारण यूरेशियन लोगों ने भारतवर्ष की सीमा में घुसपैठ की थी। सम्राट शिवशंकर के अधीनस्थ दानवीर महाराजा बलि, महाराजा महिषासुर भारतवर्ष के योग्य शासकों में से थे, उन को भी  इन्हीं यूरेशियन लोगों ने अपनी औरतों से मरवा कर के छल बल कर के उन की सत्ता को छीन लिया था, उस के बाद यूरेशियन लोगों ने बांटो और राज करो की नीति अपना कर के भारत के मूलनिवासियों को गुलाम बना कर के, उन के ऊपर अत्याचार ढा कर के, उन की शिक्षा खत्म कर के, पूर्ण रूप से अपने बंधुआ मजदूर बना लिया था।
शताब्दियों के बाद फिर भारत वर्ष में यूरेशियन मुहम्मद बिन कासिम आदि मुस्लिम आक्रांताओं ने आक्रमण कर के भारत के हिंदुओं को कत्ल कर के अपना निरंकुश शासन करना शुरू किया था, यही हिंदुओं के यूरेशियन भाई मुसलमान और अंग्रेज हिंदुओं को अपना गुलाम बना कर सताने लगे। इन लोगों ने भारतवर्ष में स्थाई रूप से बसने की अपेक्षा भारत के धन को अपने देश में ले जाने का काम किया। इन आक्रमणकारियों ने धर्म परिवर्तन के नाम पर भारत के हिंदुओं और मूलनिवासियों का कत्ल कर के उन के नाक में दम कर दिया था। जब से यूरेशियन भारत में आए थे, तब से ही भारत के मूलनिवासी अपनी खोई हुई आजादी को पाने के लिए जी जान से संघर्ष करते आ टीरहे थे मगर यूरेशियन लोगों की छद्म नीति के कारण सफल नहीं हो पा रहे थे और तत्कालीन शासक भी आपस में इकट्ठे मिल कर के विदेशी आर्यों का डट कर मुकाबला नहीं कर पा रहे थे, जिस का प्रमाण महात्मा लंकेश नरेश रावण और उस के गद्दार भाई बिभीषण है, कुछ शासक बिलासी होने के कारण हिंदुओं का मुकाबला नहीं कर सके और आर्यों के छल कपट से मारे गए।
स्वतंत्रता के बाद भी जो मूलनिवासी शासक हुए हैं, वे भी आपस में कभी इकट्ठा नहीं हो पाए हैं। आजादी की लड़ाई के समय पंजाब के गाँव मुगोवाल के गद्दरी बाबा मंगू राम मुगोवालिया जी जब तोप के मुंह से बच कर के भारत आए तब उन्होंने भारत के कोने कोने में भ्रमण कर के भारत के गुलामों के गुलाम मूल निवासियों की गुलामी के बारे में जानकारी इकट्ठी की और जगह जगह बैठकें कर के लोगों में जनचेतना जागृत की थी, जिस के फलस्वरूप उन्होंने 11/12 जून 1926 को अपने ही गांव मुगोवाल में एक सफल मूलनिवासी सम्मेलन आयोजित किया था। कई प्रदेशों के प्रबुद्ध लोगों ने इस ऐतिहासिक सम्मेलन में भाग लिया था। इस सम्मेलन में जो निर्णय लिए गए, उन के अनुसार पंजाब आधार मंडल का भी गठन उसी दिन ही किया गया था और उसको ये अधिकार दिए गए कि वे अंग्रेजों के साथ बातचीत कर के भारत के मूलनिवासी लोगों को मौलिक अधिकार दिलाने का कार्य करेंगे, जिस के फलस्वरूप मंगू राम मुगोवालिया जी और उन के साथियों ने लार्ड जोहन साइमन को अपना मेमोरेंडम दे कर के यह समझाने की कोशिश की थी, कि हम हिंदुओं के गुलाम हैं, ये लोग हमें गुलामो की तरह रखे हुए हैं। हमें कोई भी मौलिक अधिकार नहीं है, इसलिए हमें जमीन, जायदाद, धन दौलत, नौकरी और नोकरियों में आरक्षण, शिक्षा के अधिकार देकर हमारी गुलामी खत्म की जाए। अंग्रेज सरकार ने आदि धर्म मंडल की सारी मांगों को मान लिया और 1936 तक पूर्ण रूप से लागू करवा दिया। सन 1936 के प्रथम असेंबली चुनाव में आरक्षण भी लागू करवा दिया था। उन के साथ कानपुर के स्वामी अछूतानंद जी महाराज ने भी कंधे से कंधा मिला कर के काम किया था और उन्होंने भी अपने मेमोरेंडम दे कर के अंग्रेज सरकार को अछूतों को मौलिक अधिकार दिलाने में कड़ा संघर्ष किया था। इन के साथ दक्षिण के पेरियार और मध्य भारत के भारत रत्न डॉक्टर भीमराव अंबेडकर भी अपने अपने क्षेत्रों में अछूतों की आजादी के लिए जन जागृति कर रहे थे मगर इन सभी राजनेताओं ने कभी भी साहिबे कलाम गद्दरी बाबा मंगू राम मुगोवालिया जी के साथ हाथ मिला कर के, आपस में कभी एकता के सूत्र में बंध कर के, हिंदुओं का मुकाबला नहीं किया और इन की एकता ना होने के कारण मूलनिवासी आंदोलन असफल होते गए, उन के बाद पंजाब के वीर सपूत साहब कांशीराम जी हुए, जिन्होंने सारे देश के मूल निवासियों को एक मंच पर इकट्ठा कर के उत्तर प्रदेश में मूलनिवासी राज की स्थापना कर डाली मगर उन के समकालीन शासक बाबू जगजीवन राम, रामदास अठावले, ज्ञानी जैल सिंह, मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, नितीश कुमार आदि ने भी उन का साथ नहीं दिया और अंतत: साहब कांशीराम जी हिंदुओं के षड्यंत्र का शिकार हो गए और वे भी महात्मा लंकेश रावण जी महाराज, मूलनिवासी राजराजेश्वर महाराजा शिव शंकर जी, महाराजा महिषासुर (महिषी अर्थात महि अर्थात धरती के देवता) जी, महाराजा दानवीर बलि की तरह मार दिए गए।
वर्तमान दौर में, आज हिंदुओं के षड्यंत्र के तहत लालू प्रसाद यादव जेल की सीखों में अंतिम सांस गिन रहे हैं। मुलायम सिंह यादव जी भी अपने ही घर में नजरबंद है। अगर ये लोग युग पुरुष साहिब कांशीराम जी के साथ कंधे से कंधा मिला कर के हिंदुओं से दिल्ली का केंद्रीय शासन छीनने का प्रयास करते, तो आज ये लोग हिंदुओं के शिकार ना होते और ना ही महात्मा लंकेश रावण, धरती के सम्राट महिषासुर दानियों में सर्वश्रेष्ठ दानी महाराजा बली जी, विद्वानों में सर्वश्रेष्ठ विद्वान भारत रत्न डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की तरह बुढ़ापे में बुरे दिन काटते हुए काल के ग्रास ना बनते।
भारत के मूलनिवासियों का दुर्भाग्य है, कि इन के राजनेता अभिमानी, स्वार्थी, घमंडी और अहंकारी ही हुए हैं, ये अपनी मौज मस्ती के लिए मनुवादी औरतों के शिकार होते रहे हैं और आज भी होते जा ही रहे हैं, जो इन को मौत के घाट उतार कर के हिंदू राज को स्थिर बना कर रखे हुए हैं।
वर्तमान दौर में भी वामन मेश्राम जी ने भोलेनाथ शिव शंकर, दानवीर महाराजा बलि, प्रतापी महाराजा महिषासुर की जगह लेकर के भारत के शासकों को उत्तर प्रदेश के 2022 के चुनावों में इकट्ठा करने का प्रयास किया मगर सफल नहीं हुए और इन मूढ़  यादवों की मूर्खता के कारण आज फिर उत्तर प्रदेश में बुलडोजर की सरकार काम कर रही है मगर ब्राह्मणवादी नीति के शिकार अखिलेश, नितीश, लालू प्रसाद के सपूत, मुस्लिम नेता असदुद्दीन ओवेशी ने उनका साथ ना दे कर के अपने अहंकार में डूब कर के 85% मूल निवासियों को हिंदुओं का शिकार बनने में सहयोग किया हैं, इन की एकता ना होने के कारण मनुवादी ही मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री बनते जा रहे हैं, जिन्होंने मूल निवासियों को गुलाम बनाने के लिए दोबारा से शिक्षा को अपनी कैद में कैदी बना लिया है।
राम सिंह आदवंशी।
महासचिव,
बहुजन मुक्ति पार्टी हिमाचल प्रदेश

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