धन के लालची मूल निवासी लोग ही मूलनिवासी राज के दुश्मन।
85% मूलनिवासी साथियो,
सोहम, जय गुरुदेव!
बड़ी हैरानी की बात है, कि 85% मूलनिवासी समाज के नेताओं ने अपनी जान हथेली पर रख कर के हिंदू, मुस्लिम और अंग्रेजों के साथ खूनी संघर्ष कर के गुलामों के गुलाम मूल निवासियों को मौलिक अधिकार दिलाए थे, जब कि हम मूलनिवासियों को 1911 के एक्ट के अनुसार भूमि खरीदने का अधिकार तक नहीं था। भूमि के ऊपर हम मकान तक बना नहीं सकते थे, हम लाल कपड़े तक नहीं पहन सकते थे, हमारे पूर्वज मूलनिवासी धार्मिक प्रवचन ना तो कर सकते थे और ना ही सुन सकते थे, छुआछूत इतनी कड़ाई से लागू की गई थी, कि मूलनिवासी ब्राह्मणों, राजपूतों और वानियों की परछाईं भी ना तो ले सकते थे और ना ही अपनी उन पर डाल सकते थे, उन के मुहल्लों की गलियों से जूते हाथ में लेकर, नंगे पाँव गुजरना पड़ता था। भारत के असली मूलनिवासियों को अछूत घोषित किया गया था, हमारे पूर्वजों से गंदे से गंदा काम लिया जाता था, जिस के बदले में बासी साग और लस्सी के साथ बासी मक्की की रोटी ही खाने को दी जाती थी।
85% मूल निवासियों के पूर्वज ना तो धार्मिक प्रवचन सुन सकते थे और ना कर सकते थे, ना अच्छा खा सकते थे, ना ही पी सकते थे, हमारे पूर्वजों को सड़क पर चलते समय थूकने के लिए हाथ में मिट्टी का बर्तन लेकर चलना पड़ता था और सड़क के उपर पड़े अपने पांव के निशानों को मिटाने के लिए कमर के पीछे की तरफ झाड़ू बांधना पड़ता था। इन अमानुषिक, प्रतिबंधों को तोड़ने के लिए हमारे वीर सपूत चमारों ने अपना खून बहाया था, पूना स्थित कोरेगांव की घटना इस बात का पक्का सबूत है, कि चमार जाति के वीर बहादुर वीरों ने 28000 ब्राह्मण सैनिकों को इसलिए मार मुकाया था, क्योंकि पेशवा राजा झाड़ू और थूकने वाले बर्तन को हटाने के लिए नहीं माना था और इस अनाचार, अत्याचार को समाप्त करने के लिए चमारों को अपने खून की नदी बहानी पड़ी थी। बिरसा मुंडा ने असंख्या यूरेशियन को मौत के घाट उतार कर के मूल निवासियों को आजाद करवाने का प्रयास किया था, वीर उदैया ने ही सब से पहले सन् 1857 की खूनी क्रांति का बिगुल बजा कर के अंग्रेजों को भारत से निकालने के लिए महाक्रांति का शंखनाद किया था। कानपुर से स्वामी अछूतानंद जी महाराज ने आदि हिंदू लहर चला कर अंग्रेजों के गुलामों के गुलाम, मूलनिवासियों की दर्दनाक गाथा अंग्रेजों को सुनाई थी, इसी तरह साहिबे कलाम गद्दरी बाबा मंगू राम मुगोवालिया जी ने १९२६ मेंं आदि धर्म मंडल की स्थापना कर के लॉर्ड साइमन, लॉर्ड लोथियन के सामने प्रस्तुत हो कर के मूल निवासियों की दुर्दशा का वर्णन कर के ब्रिटिश सरकार को विवश कर दिया था, कि वे 85% मूलनिवासियों को भी आजाद करने के लिए पाकिस्तान की तर्ज पर आदिवासियों के लिए अलग आदिस्थान दे कर के मूल निवासियों को स्वतंत्र किया जाए।
गद्दरी बाबा साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवालिया जी ने 1931 की जनगणना में मूल निवासियों को आद धर्म लिखने का अधिकार ले कर जनगणना में लिखने के लिए विवश कर दिया था, जिस के कारण मनुवादियों ने अछूतों के नाक में दम कर दिया था और कई अछूत लोग उस ऐतिहासिक महाक्रांति में शहीद भी कर दिए गए थे, तब जा कर अंग्रेजों के गुलामों के गुलाम मूलनिवासियों को आरक्षण की सुविधा मिली थी। नौकरी करने के अधिकार मिले थे। संपत्ति रखने के अधिकार मिले थे। अपनी जमीन में मकान बनाने के लिए जमीन के अधिकार मिले थे। चुनाबों में वोट डालने का अधिकार मिला था। विद्यालयों, महाविद्यालयों में स्कालरशिप और पढ़ने और बड़े-बड़े पदों पर नौकरी करने के अधिकार प्राप्त हुए थे मगर बड़े दुख की बात है इतने लंबे संघर्ष के बाद जो मूलनिवासी बड़े-बड़े पदों से सेवानिवृत्त होते हैं, उन को मनुवादी लोग अपने जाल में फंसाने के लिए उन्हें लोकसभा, राज्यसभा के सांसद, विधायक, बोर्डों, कमिश्नों के अध्यक्ष और सदस्य बनने का लालच देते हैं, जिस के लालच में फंसा कर, इन लालची, धन के भूखों को मनुवादी हाईजैक कर लेते हैं ताकि ये हाई रैंकड लोग कहीं स्वतन्त्र रूप से चुनाव ना लड़ लेलें और मूलनिवासी शासन स्थापित करने में मूलनिवासी क्रांतिकारी नेताओं के साथ मिल कर के मनुवादी शासन को समाप्त ना कर दें। बड़े-बड़े पदों से सेवा निवृत्त होने वाले पैसे के भूखे मूलनिवासी अधिकारी, कर्मचारी लालच में आ कर के अपने मूलनिवासी समाज को धोखा दे कर के कांग्रेस,भाजपा के जाल में फंस कर के, निर्लज हो कर उन के गुलाम बन कर के, उन लोगों को धोखा देते हैं, जिन गरीब लोगों की जनसंख्या के ऊपर मिले आरक्षण से 30-35 साल नौकरी करने के बाद भी ये बेसबरे लोग कांग्रेस, भाजपा के दलाल बनने के लिए तैयार हो जाते हैं और राज्यसभा, लोकसभा सांसद, विधायक, कमिश्नों, बोर्डों के अध्यक्ष बन कर अपना ही उल्लू सीधा करते हैं। जो मूलनिवासी कर्मचारी संगठनों के अध्यक्ष और महासचिव रह कर के नेता बनते हैं, उन को भी ये कांग्रेसी और भाजपाई पेट्रोल पंप, बोर्ड के चेयरमैन आदि तोहफे दे कर के अपने वश में कर लेते हैं और इस प्रकार मूलनिवासी लोगों का राज स्थापित नहीं होने देते हैं, जो मूलनिवासी राजनेता मूलनिवासी समाज के उत्थान के लिए अपने जीवन को समाज के लिए कुर्बान कर रहे हैं, उन की हुई मेहनत को भी यह लालची दलाल मिट्टी में मिला देते हैं, जिस का साक्षात उदाहरण साहब कांशी राम जी हैं, जिन्होंने 85% मूल निवासियों को इकट्ठा करने के लिए अपना सारा जीवन लगा दिया मगर मनुवादी लोगों ने हमारे ही मूलनिवासी लोगों के हाथों उन को अपना शिकार बना कर के मूलनिवासी शासन स्थापित होते होते रोक दिया।
भारत के मूलनिवासियों से मेरा आग्रह है, कि वे मनुवादी सरकारों के दल्ले और दलाल बनने की अपेक्षा स्वाभिमान से जीने के लिए, अपने 85% मूल निवासियों का ऋण चुकाने के लिए, कांग्रेस भाजपा और अन्य मनुवादी राजनीतिक दलों से चुनाव लड़ना तत्काल बंद कर दें और बहुजन मुक्ति पार्टी से चुनाव लड़ कर अपने पिछड़े और बेसहारा लोगों की सरकार बनाने के लिए अपनी योग्यता अपने हायर रैंक का लाभ अपने समाज के लिए प्रयोग करें। बड़े-बड़े पदों से सेवानिवृत्त होकर के बहुजन मुक्ति पार्टी के "चारपाई" चुनाव चिन्ह से चुनाव लड़ कर मूलनिवासी शासन स्थापित करने के लिए आगे आएं, तभी आप का भी सम्मान होगा और आप के पूर्वजों ने जो बलिदान किये हैं, उन का लाभ 85% मूल निवासियों को मिल सकेगा।
राम सिंह आदवंशी,
महासचिव,
बहुजन मुक्ति पार्टी हिमाचल प्रदेश
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