मूलनिवासी नारियों का स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान

 

मेरे 85% मूलनिवासी साथियो,
सोहम, जय गुरुदेव!
स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास पर नजर डालें तो कहीं भी आभास नहीं होता है, कि स्वतंत्रता आंदोलन में मूलनिवासी अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़ी जाति और अल्पसंख्यक नारियों ने भी कोई योगदान डाला था। जब भी हम स्वतंत्रता आंदोलन के बारे में पढ़ते हैं, तो उस में केवल मनुवादी नारियों का ही वर्णन मिलता है, क्योंकि ये लोग अपने नाम के साथ बर्मा, शर्मा, शुक्ला, तिवारी, दूबे, चौबे, मोदी, गांधी, नेहरू आदि शब्दों का प्रयोग करते हैं, जिस से स्पष्ट हो जाता है कि ये लोग केवल ब्राह्मण, राजपूत और वाणीया ही हैं, मगर 85% मूलनिवासियों को तनिक भी ज्ञान नहीं है कि हमें भी स्वाभिमान से अपनी पहचान के लिए ऐसे शब्दों का प्रयोग नि:संकोच करना चाहिए जिस प्रकार हमारे मूलनिवासी गुरु रविदास जी महाराज ने शब्द रचना करते समय अपने नाम के साथ "खलास चमारा" लिख कर अपनी जाति की पहचान लोगों बताई थी, यदि यह शब्द गुरु रविदास  जी महाराज नहीं लिखते तो उन की मूलनिवासी पहचान ही खत्म हो जाती है और ब्राह्मण लेखक गुरु रविदास जी महाराज को केवल तिलकधारी ब्राह्मण ही सिद्ध कर देते हैं, क्योंकि उन्होंने भी धोती, तिलक लगा कर शंख बजाया था और इस आडंबर का ब्राह्मण लोग खूब लाभ ले सकते थे, मगर गुरु रविदास जी महाराज ने लिखा है, कि कह रविदास "खलास चमारा" जिस से यह स्पष्ट हो जाता है, कि जो उन्होंने धोती, तिलक लगा कर शंख बजाया है, वह ब्राह्मणों के पाखंडों और आडंबरों का केवल मात्र उपहास उड़ाया है। इसलिए गुरु जी ने जो भी लिखा है, वह बड़ा सोच विचार कर के लिखा है। अब जब से सोशल मीडिया अस्तित्व में आया है, तब से मूलनिवासी अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़ी जाति और अल्पसंख्यकों को भी अपने विचार प्रकट कर के जनता तक पहुंचाने का शुभ अवसर मिला है, जिस के कारण अब आभास होने लगा है कि मूलनिवासी वीर और वीरांगना ने भी स्वतंत्रता आंदोलन में अपने प्राणों की आहुति दी है। जब साहिब काशीराम जी ने क्रांतिकारी बहुजन आंदोलन चलाया था, तो उस समय उन के ऐतिहासिक समाचार पत्र "बहुजन संगठक" में झलकारी बाई आदि के बारे में लिखा था, कि रानी लक्ष्मीबाई किले में गिर गई थी, उस को बचाने के लिए मूलनिवासी झलकारी बाई ने ही रानी लक्ष्मीबाई का भेष बना कर घोड़े पर सवार हो कर, अंग्रेजों का कत्लेआम करती हुई बाहर निकली थी, इस घटना से ज्ञात हुआ था कि मूलनिवासी नारियों ने भी स्वतंत्रता आंदोलन में बढ़ चढ़ कर अपना योगदान देकर खून बहाया था।
भारत के मूलनिवासी लेखकों को जब झलकारी बाई की वीरता का पता चला था तब उन्होंने  अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ी जाति की वीरांगनाओं का इतिहास ढूंढने का प्रयास किया है, जिस से पता चला है कि 1780 में ही भारत की स्वतंत्रता के लिए मूलनिवासी वीरांगनाओं ने भी, जांबाज मूलनिवासी वीरों के साथ ही स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए खून की होली खेलना शुरू कर दी थी।
कुयिलि नामक मूलनिवासी स्त्री शिवगंगा की रानी वेलू नचियार की सेनाध्यक्ष थी। उस ने 1780 में अंग्रेजों के साथ युद्ध करते समय अंग्रेजों को छठी का दूध पिलाया था। गरीब आदिवासी परिवार में जन्मी इस सेनाध्यक्ष ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए थे। इस सेनापति ने अपनी रानी वेलु नचियार के प्राणों की कई बार रक्षा की थी। जब शिवगंगा के महल पर अंग्रेजों ने आक्रमण किया था, तब उस ने बड़ी वीरता के साथ उसका सामना किया था। अंग्रेजों के हथियार छुपा कर उन को बर्बाद भी कर दिया था, जिस वीरता और बहादुरी के साथ उस ने अंग्रेजों का सामना किया था, इतिहास उन को स्वर्ण अक्षरों में लिखकर याद करता आ रहा है।
वीरांगना उदादेवी पासी ने 1857 की लड़ाई में ब्रिटिश साम्राज्य की सेना का सामना किया था उस ने एक महिला सेना तैयार की थी, जिस के योगदान से उस ने स्वतंत्रता संग्राम में अपनी वीरता का जौहर दिखाया था। उस ने अंग्रेजों के साथ साथ ब्राह्मणबाद का भी मुकाबला किया था और बुरी तरह दोनों को पराजित किया था। वीरांगना उदादेवी को पासी समाज हर वर्ष विशेष कार्यक्रम करके याद करता है।
वीरांगना हेलेन लेपचा ने भी स्वतंत्रता आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लिया था और कई बार जेल में गई थी। हेलेन लेपचा का जन्म सन 1902 में सिक्किम के नामची स्थित छोटे से गांव सांगम्मू मैं हुआ था। महात्मा गांधी ने अपनी मनुवादी छल कपट नीति के कारण हेलेन लेपचा का नाम बदल कर के सावित्री देवी रख दिया था, ताकि उस के नाम के साथ विरोधाभास पैदा हो सके और उस  की मूलनिवासी पहचान खत्म हो सके।
नागा रानी गाइदिनल्यु ने 16 वर्ष की आयु में ही ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ खूनी आंदोलन शुरू किया था, जिस को ब्रिटिश सरकार ने कैद कर के कोहिमा में ले जा कर के कारावास में डाल दिया था, उस की वीरता को देख कर के उसे मौत की सजा ना दे कर के जेल में ही रखा गया था मगर उसकी खूंखार सहेलियों को मौत की सजा दे दी थी। सन 1947 में स्वतंत्रता के बाद आजाद रिहा कर दिया गया था, जिस के बाद इस मूलनिवासी वीरांगना ने अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़े वर्ग के उत्थान के लिए क्रांतिकारी आंदोलन शुरू किया था।
पुतलीमाय पोद्दार एक आदिवासी मूल निवासी गोरखा महिला थी, जिस ने अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष किया था, इस वीरांगना ने कुर्सीयांग में अनुजाति उत्थान के लिए "हरिजन समाज" की स्थापना की थी, जो दलित और शूद्रों को शिक्षा दिलाने में एक अहम भूमिका निभा रहा है। उन्होंने एक महिला संस्थान की भी स्थापना की थी, जो लड़कियों को स्वतंत्रता सेनानी बनाने के लिए प्रेरित करती है। 8 अगस्त 1942 को उन को भी गिरफ्तार कर लिया गया था।
रानो और झानो ने ईकीस अंग्रेजों को इसलिए कत्ल कर दिया था, कि अंग्रेजों ने उन से जल जंगल और जमींन छीनने का सामंती प्रयास किया था।
इस तरह इन मूलनिवासी महिलाओं ने उन लोगों के लिए अपना जीवन अर्पित किया है, जिन्होंने भारतवर्ष में ब्राह्मणवाद और अंग्रेजों की गुलामी सहन की थी। इन सभी वीरांगनाओं का नाम इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में हमेशा ही अंकित रहेगा और आशा है कि भारत की मूल निवासी नारी भी इन वीरांगनाओं से कुछ सीख कर के अपने समाज के लिए अपना जीवन अर्पित करने के लिए प्रयास करेंगी।
राम सिंह आदवंशी।
महासचिव,
बहुजन मुक्ति पार्टी हिमाचल प्रदेश।

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