इधर मूलनिवासी आजादी की लड़ाई लड़ रहे थे उधर मनुवादी घात लगा रहे थे

 मेरे 85% मूलनिवासी साथियो,

सोहम, जय गुरुदेव! 

प्रथम विश्वयुद्ध की आग अभी धधक ही रही थी मगर दूसरे विश्व युद्ध की आहट दरवाजे के ऊपर सुनाई देने लग पड़ी थी।1931की जन गणना के समय भारत की आबादी 35.28 करोड़ थी, जिस में 3% ब्राह्मण थे, जिन की उस समय केवल एक करोड़ आठ लाख, 5% राजपूत एक करोड़ अस्सी लाख, 6% वानियों की दो करोड़ पन्द्रह लाख के करीब जनसंख्या थी, जिस का मतलब लगभग पांच करोड़ मनुवादी लोग भारत में रह रहे थे, बाकी तीस करोड़ लोग मूलनिवासी थे। दूसरे विश्वयुद्ध में अंग्रेजों ने भारत के लगभग पच्चीस लाख सैनिक विश्व युद्ध में झोंक दिए गए थे। 

मेरी माता जी के मामा स्वतंत्रता सेनानी एक्स मिलिट्री सर्विस मैंन बलंदा राम, बसंता राम, प्रजा राम और लौंगू राम बताते थे, कि दूसरे विश्व युद्ध की आहट के कारण गांव-गांव में जा कर के सैनिक एजेंट युवाओं को ढूंढ ढूंढ कर के सेना में भर्ती करवाने के लिए भर्ती कार्यालयों में ले जा रहे थे, जिन में हम पांच भाइयों में से 3 को सेना में भर्ती कर लिया गया था, इसी तरह मेरी माताश्री के पिता जी और  दो चाचा जी, एक ताया जी को एजेंटों ने भर्ती करवाया था, यही नहीं इसी तरह भारत के कई शहरों, गांवों से मूलनिवासी युवाओं को सेना में भर्ती किया गया था। ये युवा सैनिक सरकारी आंकड़ों के अनुसार 25 लाख के करीब थे, जिन्होंने दूसरे विश्व युद्ध में अपने जौहर दिखाए थे, जिन्होंने विश्व युद्ध में अपने प्राणों की परवाह न करते हुए बड़ी वीरता के साथ युद्ध लड़ा था, इन में से 87 हजार वीर सपूत विश्व युद्ध में शहीद हो गए थे। यदि 87 हजार भारतीय शहीदों की उन की सवर्ण और अवर्ण जातियों के अनुपात में शहीदी का आंकड़ा निकाला जाए तो लगभग 75 हजार के करीब अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़ी जाति और अल्पसंख्यक वीर शहीद हुए हैं और बाकी 12000 के करीब सवर्ण शहीद हुए हैं मगर 75000 मूलनिवासी शहीदों का विवरण कहीं नहीं मिल पाता है। इन में से मूलनिवासी वीर सपूत भारत के सुप्रसिद्ध कमांडर सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद सेना में भी शामिल हो गए थे, जिन्होंने भारत को आजाद करवाने के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा कर के भारत के सभी जातियों के लोगों को अंग्रेजों की गुलामी से आजाद करवाने का प्रयास किया था मगर इन वीर, शहीदों का ब्राह्मण लेखकों ने कहीं कोई जिक्र तक नहीं किया और ना ही कहीं कोई इतिहास लिखा। आज जिन लोगों ने केवल मात्र उंगली काट कर के खून निकाला था, जिस के बल पर शहीदी बताई जा रही है, उन्हीं को ही हाईलाइट किया जाता रहा है और जिन्होंने खून की होली खेली थी, उन्हीं का ही अपमान करने के लिए, उन्हीं को पुन: गुलाम बनाने के लिए हिंदू राज घोषित करने की कोशिश की जा रही है, जब कि इन लोगों ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में उतना योगदान नहीं किया था, जितना 85% भारत के मूल निवासियों ने दिया था। जिन मनुवादियों ने आजादी की लड़ाई में भाग लिया भी था, वे अंग्रेजों की यातनाओं को सहन नहीं कर सके थे, और माफीनामे लिख कर अपने प्राणों की भीख मांग कर अंग्रेजों से अपनी जान बचाई थी। आज माफी मांगने वाले कायर लोगों के वंशज भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने क लिए उछल कूद कर रहे हैं और जिन वीर सपूत मूलनिवासी लोगों ने लाखों की संख्या में भारत को स्वतंत्र कराने के लिए अपने प्राणों की आहुति दी थी, उन के साथ प्रतिदिन अत्याचार, अनाचार, व्यभिचार, बलात्कार, मॉबलिंचिंग, हत्या और कत्लेआम किया जा रहा है। 85% लोगों को आजादी के बाद भूमिहीन रख कर, गुलाम बना कर के केवल मात्र मजदूरी करने के लिए विवश किया हुआ है, जिन लोगों ने भारत को आजाद करवाने के लिए अपने प्राणों को न्यौछावर किया था, उन की संतानों के साथ ऐसा अमानवीय व्यवहार किया जा रहा है, जिन लोगों ने नाममात्र ही स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया है, छल कपट से आजादी उन्हीं लोगों ने छीन ली थी। उधर भारत के 75000 वहादुर वीर मूलनिवासी सैनिकों के साथ साथ लाखों मूलनिवासी नागरिकों को अंग्रेजों ने शहीद किया था, जिस का प्रमाण जलियांवाला कांड है, जिस में केवल पंजाब के सभी चमार ही जनरल डायर ने अपनी गोलियों से शहीद किये थे। इधर वीर, वहादुर् मूलनिवासी आजादी की लड़ाई के लिए शहीद हो रहे थे, ठीक उधर इस के विपरीत ब्राह्मण, राजपूत और वाणीया अपने बानिया नेता मोहनदास करमचंद गांधी के नेतृत्व में छल कपट प्रपंच रच रहे थे, कि किस प्रकार हम ने भारत के मूल निवासियों को आजादी मिलते ही दुबारा अपना गुलाम बना कर के रखना है। गांधी नेहरू एंड कंपनी अपने इस लक्ष्य में सफल भी हो गई और पटेल को धोखा देकर के जवाहर लाल नेहरू को प्रधानमंत्री भी बना लिया था।नेहरू ने जिन नीतियों को लागू किया था उन के द्वारा अपरोक्ष रूप से 85% मूलवासियों के ऊपर गुलामी ठोक दी थी, जिस के कारण आज भी मूलनिवासियों का कत्लेआम किया जा रहा है मगर ये हिंदू यह नहीं समझ पा रहे हैं कि जिन लोगों को अपनी शहीदी देने का चस्का है अगर कहीं वे भड़क उठे तो कपटी, प्रपंची लोगों की क्या हालत होगी? जिस का अनुमान बड़ी आसानी से लगाया जा सकता है। मनुवादियों के लिए अच्छा होगा कि वे जाति- पाती, धर्म और संप्रदायों को भूल कर समरसता के साथ आपस में मिल जुल कर के रहें अन्यथा बर्बादी का मंजर क्या होगा, इस का सभी को आभास कर लेना चाहिए, इसलिए जरूरत है खुद भी जिओ और औरों को भी स्वतंत्रता पूर्वक जीने दो। 

राम सिंह आदवंशी।

महासचिव,

बहुजन मुक्ति पार्टी हिमाचल प्रदेश। 


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