सरकारी शिक्षा संस्थान केवल गरीबों के लिए

 

मेरे 85% मूलनिवासी साथियो,
सोहम, जय गुरुदेव!
बड़ी हैरानी की बात है, कि जिन सरकारी स्कूलों में अत्यंत जीनियस प्रोफेसर, वैज्ञानिक, डॉक्टर, इंजीनियर, बनते थे, जिन स्कूलों से आईएएस, आई एफ एस, आईपीएस, आदि अनेकों योग्य प्रशासनिक अधिकारी शिक्षा ग्रहण कर के बनते थे, शिक्षा संस्थानों से शिक्षा ग्रहण करने के उपरांत उच्च पदों पर जाते थे, जिन का ज्ञान का स्तर ऊँचा हुआ करता था, वैज्ञानिक, डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर आईएएस, आईएफएस, और आईपीएस लोग बिना कोचिंग सेंटरों के ही इन परीक्षाओं को पास कर के इन बड़े बड़े पदों पर जाते थे, उस समय लोगों के पास इतना पैसा भी नहीं होता था, कि वे भारी भरकम फीस दे कर प्री मेडिकल, प्री इंजीनियरिंग, आईएएस, आईपीएस, आई एफ एस आदि की कोचिंग, कोचिंग सेंटरों में जा कर ले सकें, परंतु उस के बावजूद भी जो विद्यार्थी इन सेवाओं में जाते थे, वे सभी अत्यंत कुशलतापूर्वक अपनी सेवाएं दिया करते थे मगर आज धन्ना सेठों के बच्चे कोचिंग सेंटरों में तोतों की तरह रटाए जा रहे हैं| छ्दमी ज्ञान को हजम कर के परीक्षाएं दे रहे हैं और केवल रटे-रटाए ज्ञान के कारण प्री मेडिकल, प्री इंजीनियरिंग, आईएएस, आईएफएस, आईपीएस परीक्षा पास करके देश का बेड़ा गर्क कर रहे हैं। इस बर्बादी के कारण यह स्पष्ट हैं, कि जिन विद्यालयों में अध्यापक, प्राध्यापक लोक सेवा आयोग; की परीक्षाओं को पास कर के फिर साक्षात्कार में साक्षात्कार बोर्डों को फेस कर के इन पदों पर जाते थे, वे जनता के लिए अच्छी सेवाएं देते थे। ये सरकारी शिक्षा संस्थान सर्वश्रेष्ठ वरिष्ठ शिक्षा शास्त्रियों के श्रेष्ठ ज्ञान को देख कर के उच्च पदों पर आसीन किए जाते थे। वे अपने 25-30 वर्षों के अनुभवों के आधार पर अपने अधीनस्थ शिक्षाविदों का मार्गदर्शन करते थे और उन को पढ़ाने का मार्ग प्रशस्त करते थे, इन शिक्षाविदों का विशेष स्तर होता था। परीक्षाओं का भी विशेष मापदंड हुआ करता था। परीक्षा लेने वाले अधीक्षकों और सुपरवाइजरों का भी उच्च स्तर हुआ करता था। सभी परीक्षा केंद्रों की प्रतिदिन चेकिंग हुआ करती थी, यहां तक कि चेकर के ऊपर भी चेकर हुआ करते थे, फ्लाइंग स्क्वाड हुआ करते थे और जो बच्चे नकल करते हुए पकड़े जाते थे, उन को दो-तीन साल के लिए दंडित किया जाता था मगर वर्तमान दौर में यह सब कुछ खत्म होता जा रहा है। कांग्रेस, भाजपा ने इन पुराने नियमों मापदंडों को धत्ता दिखा कर के गरीबों को आधी अधूरी शिक्षा देने का षड्यंत्र रचा हुआ है। सरकारी स्कूलों में बिना परीक्षा के ही बच्चे पास किए जा रहे हैं, ताकि गरीब बच्चों का शैक्षिक स्तर इतना गिर जाए, कि वे अमीर बच्चों के साथ कंपटीशन ही ना कर सके। आज सब कुछ प्राइवेट सेक्टर में सौंप कर के केवल डिग्रियां ही बांटी जा रही हैं, जिन से अमीरों के नालायकों को उच्च पदों पर बिठाया जा रहा है, क्योंकि ये लोग लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं में मूलनिवासी वच्चों के साथ कंपीट नहीं कर पाते थे।
शिक्षा का स्तर क्यों गिरा:--- शिक्षा का स्तर कांग्रेस सरकार ने स्वत: गिराने का प्रयास किया है। इस कार्य की शुरुआत, 80 के दशक के बाद हुई थी। पांचवी कक्षा तक पांच टीचर ना देकर केवल दो तीन चार टीचरों से ही काम चला कर,  सरकार अपना बजट बचाने लगी, जिस के कारण अध्यापक सभी बच्चों के ऊपर ध्यान नहीं दे सके और शिक्षा का स्तर गिरता ही गया। इस से पहले समय-समय पर इंनिरंतर स्पेक्शन हुआ करती थी, वह भी बंद कर दी गई, जिस के कारण किसी को शिक्षा के गिरते स्तर की चिंता नहीं रही। कांग्रेसी सरकारों ने पहली तीन मुख्य कक्षाओं तक परीक्षाएं लेना ही बंद कर दीं, सजा देना बन्द करवा दी। बच्चों को केवल प्रमोट ही किया जाने लगा, जिस से अध्यापकों ने भी पढ़ाना छोड़ दिया और बच्चों ने भी पढ़ना छोड़ दिया, वच्चों को कार्य ना करने के लिए सजा का भय ना होने के कारण वच्चे उच्छृंखल होते गए, बच्चों को फेल होने का डर नहीं रहा, इस प्रकार प्राथमिक स्तर से ही शिक्षा का पतन होने लगा। उस के  बाद गरीब, अछूत और आरक्षण विरोधी सरकारों ने निजीकरण करना शुरू कर दिया, जिस से चुनाव लड़ने के लिए इन को सीधा पैसा मिलना शुरू हो गया और इन विद्यालयों के मालिकों के लिए शिक्षा स्तर का भी कोई उचित मापदंड निश्चित किया गया था। अनपढ़, गवार, अमीर लोग शिक्षा संस्थानों के मालिक तो बन गए मगर उन को शिक्षा की परिभाषा तक नहीं आती है, ये लोग आधे अधूरे ज्ञानियों के सहारे विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों को चलाने लगे, यही नहीं अनुशासन भी गड़बड़ा गया। शिक्षा संस्थानों के मालिकों को बच्चों की संख्या देखनी पड़ती है, भले ही विद्यार्थो कितने भी उद्दण्ड, अपराधी हों, उन को सजा देने से कतराते हैं ताकि उनका शिक्षण संस्थान खाली ना हो जाए।
मनुवादी सरकारों ने अपने बच्चों के लिए प्राइवेट स्कूलों को खोलना शुरू कर दिया और सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर गिराने के लिए, पूरे शिक्षक देना ही बंद कर दिए। इंस्पेक्शन समाप्त कर दी गई। सिलेबस इतने कठोर कर दिए गए कि जिस को पढ़ाने के लिए योग्य टीचर नहीं दिए गए, पी टी ए आदि टीचर भर्ती किये गए। टीचरों को बाबूओं की तरह लिखने-पढ़ने का ही काम अधिक दिया गया और जो बच्चों की पढ़ाई की ओर ध्यान नहीं दे पाए। यह एक मनुवादी सरकारों का सोचा समझा गरीबों के प्रति षड्यंत्र है, जिस को समाप्त करने के लिए गरीबों की सरकार होना अति आवश्यक है और यह काम केवल मूलनिवासी जनता की बहुजन मुक्ति पार्टी की सरकार ही कर सकती है। यही सरकार बच्चों को बहुमुखी शिक्षा देने के लिए प्रयास करेगी, जो दोहरी शिक्षा समाप्त कर के सभी बच्चों को एक समान सिलेबस बना कर शिक्षा देने का काम करेगी।
राम सिंह आदवंशी।
महासचिव।
बहुजन मुक्ति पार्टी हिमाचल प्रदेश।

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