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Showing posts from December, 2022

43 भाग।। चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास।।

कामवासना के शिकार राजा ने मरने की तैयारी:--- राजा विजयपाल सिंह ने अपने मंत्रियों और फौज को भेज कर के अपनी मौत की तैयारी कर ली। मूर्ख राजा नहीं समझ रहा था कि कुटिया में मेरी मौत पहुंच चुकी है। वह काम वासना का शिकार हो कर के केवल सुंदरी को ही देख रहा था राजा की बुरी नीयत का गुरु जी को आभास:---- कुटिया में बैठे गुरु रविदास जी महाराज कामी, क्रोधी, विलासी राजा विजय पाल सिंह के इरादों को समझ गए थे, कि राजा कोई अनिष्ठ कार्य करने जा रहा है। सचमुच उसी समय मंत्री अपने सेनापति और सेना को लेकर चल पड़े। गुरु जी कुछ चिंतित इसीलिए हो गए कि कहीं कुंवारी कन्या गंगा के साथ कोई अभद्र व्यवहार ना कर दे, गुरु जी की इस दुविधा को गंगा पहले ही भांप गई क्योंकि वह भी दिव्य शक्ति संपन्न शक्ति थी। गंगा गुरु जी की दुविधा को खत्म करती हुई, उन्हें स्वामी ईशर दास जी महाराज के शब्दों में बयाँन करती हुई फरमाती है, जिस का वर्णन गुरु आदि प्रगास ग्रंथ में किया गया है ----- भनहे भागिरथी गुरु रविदास से फिकर करत ना तोहे। ऐसे जुलमि कामी पाप भूप जउ मुग्ध लीन जल करोहे। गंगा गुरु रविदास की मानसिक चिंता को समझ गई:--- गुरु रविदास ...

31 भाग।। चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास।।

भाग 31।।चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास।। तिलकधारी पंडे पुजारियों और ब्राह्मणों ने भारत के मूलनिवासी लोना उर्फ देवी कामाख्या, सम्राट सिद्धचानो के मंदिरों के ऊपर अपना आधिपत्य जमाया हुआ है, जिन में अपने झूठे, कल्पित भगवानों को बैठा रखा है। ऐसा ही ब्राह्मणों ने जगन्नाथपुरी मंदिर में भारत के असली मूलनिवासियों को उन के ही मंदिर से भगा कर अपना अधिपति जमा कर के लूट मचाई हुई थी, जिस के बारे में गुरु रविदास जी महाराज को ज्ञात हो गया था, कि वहां मूलनिवासी लोगों को मंदिर के नजदीक फटकने नहीं दिया जाता है और मनुवादियों के गुलाम भील लोग असहाय हो कर दूर से ही जगन्नाथ के दर्शन किया करते हैं, इसीलिए एक दिन वे इस राक्षसी अन्याय को खत्म करने के लिए जगन्नाथपुरी मंदिर के लिए रवाना हो गए, जिस दृष्य के बारे में स्वामी ईशर दास जी महाराज ने गुरु आदि प्रकाश ग्रंथ फरमाया है कि------ चौदह सौ अठहतरे श्री गुरु रविदास। मेले जगन्नाथ दे किआ नाम प्रकाश। जगन्नाथ पुरी मंदिर में गुरु रविदास:---- स्वामी ईशर दास जी महाराज फरमाते हैं कि गुरु रविदास जी महाराज विक्रमी संवत 1478 को अर्बाचीन ऐतिहासिक मंदिर जगन्नाथ पु...

29भाग।। चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास।।

चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास।। भाग 29 ।। गुरु रविदास की महाक्रांति की सफलता:---गुरु रविदास जी महाराज ने, जब सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक क्रांतियों को सारे देश में फैला कर के ब्राह्मणों, तिलकधारियों, पंडों, पुजारियों के ऊपर फतेह प्राप्त कर ली और राजाओं को भी तर्क के आधार पर समझा कर जो ब्राह्मणों को हरा कर ऐतिहासिक जीत हासिल की थी, उस के ही परिणाम स्वरूप राजा नागरमल ने गुरु रविदास जी महाराज की इच्छा और निर्देश के अनुसार मानवीय आधार पर अपने कानूनों में संशोधन कर के अछूतों, वंचितों, गरीबों, भूमिहीनों को न्याय देना शुरू कर दिया, जिस के बारे में स्वामी ईश्वर दास जी महाराज अपने पवित्र ग्रंथ गुरु आदि प्रकाश ग्रंथ में फरमाते हैं कि----- ।।शलोक।। राजा नागर ने एह कड़ा कानून बणाया। खुह बौली मंदर लंगर सभ दा हक रखाया। राजा नागर मल ने कानून बदल डाले:---चँवर वंश के अकेले वीर सपूत गुरु रविदास महाराज ने शूद्रों को सामाजिक न्याय दिलाने के लिए जो महाक्रांति का शुभारम्भ किया था, उस के अनुसार भारत के मूलनिवासियों के लिए राजा नागरमल ने ही कड़े और न्यायमूलक क...

42 भाग।।चंवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास।।

42 भाग।। चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास। लगभग सभी शक्तिशाली स्त्री, पुरुष अपनी शक्ति का दुरूपयोग करते आए हैं, कहा भी गया है कि *power makes man corrupt * जितने भी शासक हुए उन के किस्से विलासिता के कारनामों से भरे पड़े हैं जब कि इन लोगों में अध्यात्मिक गुण नहीं होते हैं, ये बल के सहारे अपनी तानाशाही के चलते जो चाहें करते आए हैं, जिन अबगुणों के कारण राजा विजय पाल सिंह भी शिकार हो गया और चुगलखोर की मुखबरी को अंधाधुंध सत्य मान लिया और गुरु रविदास जी महाराज के पवित्र आश्रम पर सैन्य चढ़ाई कर दी, जिस के बारे में स्वामी ईश्वर दास जी महाराज गुरु आदि प्रकाश ग्रंथ के पृष्ठ संख्या ४६०-४६१पर लिखते हुए फरमाते हैं कि---- ।। शब्द मलहार।। *दे के अनाम तां खरीद लई मौत राजा ने*। चुगलखोर की चुगली से राजा ने मृत्यु खरीद ली:---- स्वामी से दास जी महाराज फरमाते हैं, कि राजा विजय पाल सिंह ने चुगलखोर कबुद्धु को इनाम दे कर के अपनी मौत का सामान खरीद लिया। राजा यह नहीं जानता था कि गुरु रविदास जी महाराज के आश्रम में उस की मौत का सामान इकट्ठा हो गया है क्योंकि वह इतना बिलासी, कामी और क...

39 भाग।। चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास।।

39 भाग।। चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास।। कुंवारी कन्या गंगा कुटिया में विराजमान हो कर गुरु रविदास जी से कहने लगी, कि हे गुरु महाराज! इन ढोंगी, पाखण्डी ब्राह्मणों ने रास्ते में मुझे बड़ा सताया, मैं ने केवल आप के बारे में सुना था कि आप सारे विश्व में सर्वश्रेष्ठ गुरु ही नहीं अपितु सर्व शक्तिमान ईश्वरीय अवतार हैं, आप के अतिरिक्त धरती के ऊपर कोई भी ऐसी शक्ति नहीं है, जो दीन-दुखियों, दलितों, पीड़ितों को सहारा देकर उन की मुशीबतों का निराकरण कर सके। ये तिलकधारी तो अमीरों और गरीबों का खून चूसने वाले डाकू, ठग और लुटेरे ही हैं। अच्छे सभ्य विद्वान साधु संतों से सुना है, कि आप के अतिरिक्त सारे विश्व में कोई भी पीर, पैगम्बर और औलिया नहीं है इसीलिए मैं आप के दर्शन के लिए लालायित थी। स्वामी ईशर दास जी महाराज अपने गुरु आदि प्रकाश ग्रंथ के पृष्ठ संख्या ४५७-४५८ पर लिखते हुए फरमाते हैं कि--- ।। शब्द भैरबी।। मैं गंगा तां वेखण आई रविदास गुरु जी। तुम निकले अनामी निज खास गुरु जी। मैं गुरु जी आप के दर्शन करने आई:---- हे गुरु रविदास जी महाराज! मैं ने आप के यश और प्रसिद्धि के...

37भाग।।चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास।।

37 भाग।। चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास।। ।।शब्द विहाग।। गुरु रविदास जी की दर्शनाभिलाषी पुजारी कन्या गंगा व्याकुल होकर के गुरु रविदास जी के दर्शन करने के लिए घर से चल पड़ी, जिस का वर्णन करते हुए स्वामी ईश्वर दास जी महाराज *गुरु आदि प्रकाश ग्रंथ* में लिखते हुए फरमाते हैं कि---- गुरु रविदास मंन में मिथ कर आदपुरुष दा दर्शन पाइऐ। गंगा उर धारना ऐह करावे। माया शक्ति दा रथ बनवावे । कुमारी कन्या गंगा के मन में गुरु दर्शन की उमंग:---- गंगा ने गुरु रविदास जी के प्रति मन में यह सुनिश्चित कर लिया कि आज मैं विश्व की रचना करने वाले आदि पुरुष के पैगंबर गुरु रविदास जी महाराज के दर्शन करूंगी, इसलिए उस ने हिरदय में ये धारण कर लिया, कि मैं ऐसा श्रृंगार करूँगी जिसे देख कर मूर्ख, कामी, पाखण्डी, अज्ञानी तिलकधारी मोहित हो कर भटक जाएं। वह मायावी शक्ति के रथ के ऊपर सवार हो कर गुरु रविदास जी के दर्शन के लिए चल पड़ी। हीरे पंनिया दी जड़त जड़ावे। अदभुत रथ अनत ना पावे। तिस झलक सूरज जिऊँ आवे। दिव भुखण एंचल दिव लावे। हँबा परि तंऊँ रूप सुहाया। अद्वितीय श्रृंगार:---- गंगा ने...

36 भाग।। चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास।।

36 भाग।। चँवर वंश के देवतुल्य सम्राट गुरु रविदास। लाखों साधु, संत, ब्राह्मण, पंडे, पुजारी और तिलकधारी, कुंभ स्नान करने के लिए जाते हैं मगर कुछ अत्यन्त प्रकांड पंडितों का स्नान तो शाही स्नान होता हैं। ये शाही स्नान करने वाले सभी सवर्ण महात्मा लोग कुंभ स्नान से इतने पावन, पवित्र हो जाते हैं कि इन को छुआछूत की बिमारी इतनी बढ़ जाती है कि, ये लोग मानव को मानव ना समझ कर अछूतों को दर्यौगल (कौंच) समझते हैं, जिन के छूने मात्र से सारे शरीर मे खारिश शुरू हो जाती है। ये पाखण्डी लोग कुंभ में नहाने को शाही स्नान बताते हैं, ताकि आम साधारण जनता से हट कर अपने आप को श्रेष्ठ और उच्च स्तर के महात्मा सिद्ध कर सकें। गुरु रविदास जी महाराज ने, इन्हीं ढोंगियों, पाखण्डियों, अडंबरियों के ज्ञान का जनाजा निकालने के लिए खुद ही कुंभ स्नान ना करने का निर्णय ले लिया और वे महाकुंभ मेले में नहीं गए, जिस के बारे में स्वामी ईशर दास जी महाराज गुरु आदि प्रगास ग्रंथ में फरमाते हैं कि--- गुरुआं दे चरण बिना गंगा पवित्र ना होई। ज्यों कंचन जंगाल लग जावे जी। सुहागा तिस को पवित्र करावे जी। तन पट भावें एंचल लग जावे जी। गंगा ...

35भाग।।चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास।।

35 भाग।। चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास जी। गंगा कन्या का नाम था:---- गंगा किसी नदी का नाम नहीं था अपितु गंगा और गोदावरी दो सगी बहने थी, जो अत्यंत सुंदर और मासूम लड़कियां थी, जिन्होंने बिलासी राजा की इच्छा अनुसार आत्मसमर्पण नहीं किया था और शहीद हो गई थी, उन्हीं दोनों लड़कियों के नाम से एक नदी का नाम गंगा रखा गया था और दूसरी का गोदावरी नदी। दोनों ही लड़कियों की पवित्र आत्माएं गंगा और गोदावरी नदियों के आसपास घूमती फिरती हैं इसीलिए उन की आत्मा की शांति के लिए ही उन के मंदिर बनाए गए हैं, जिस सत्य को दफन कर दिया गया है। पांच हजार साल पूर्व सम्राट शिव ने भी इसी नदी के पानी को अपने राज्य के सभी खेतों में पहुंचाया था, मगर ब्राह्मणों ने एक और सत्य को छुपाने के लिए बेतुकी कथा घड़ी हुई है, कि शिव की जटाओं से गंगा निकली हुई है, जो तर्क संगत नहीं लगती। गंगा, गोदाबरी गुरु रविदास जी की अध्यात्मिक शक्तियों को जानती थी:----गुरु रविदास जी महाराज की दिव्य, अध्यात्मिक शक्तियों को गंगा और गोदाबरी दोनों कन्याएं जानती थी और गुरु जी के सानिध्य में बैठ कर के वे सत्संग सुना करती थी, इसीलिए एक बार कुं...

33भाग।।चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास।।

भाग 33।। चँवरवंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास।। गुरु रविदास महाराज ने जगन्नाथ की मूर्ति को मंदिर से बाहर बुला कर के जो धार्मिक क्रांति की थी, उस की सफलता के बाद ब्राह्मणों को सबक सिखाने के लिए जगन्नाथपुरी में नया मंदिर बनवा दिया। गुरु जी ने मंदिर के पुजारी भी भीलों को बना कर उस की देखभाल और पूजा पाठ का कार्य उन को ही सौंप दिया था, जिस का वर्णन करते हुए स्वामी ईश्वर दास महाराज, गुरु आदि प्रकाश ग्रंथ में करते हुए फरमाते हैं, कि--- ।। शलोक।। श्री गुरु रविदास जी कुझकु दिन उथे रहाइ के। माँण बाह्मना दा तोड़ के पुजारी भील बनाई। भीलों को पुजारी बनाना:---कहीं ब्राह्मण धार्मिक क्रांति को विराम ना लगा दें, इसलिए गुरु रविदास जी महाराज ने कुछ दिन जगन्नाथपुरी में ही व्यतीत किए और इन दिनों में वे स्वयं भी मंदिर में पूजा अर्चना का कार्य देखते रहे ताकि कोई भी ब्राह्मण, राजपूत, वैश्य और तिलकधारी भीलों के साथ छेड़छाड़ ना कर सकें। उन के सामने किसी की भी हिम्मत नहीं पड़ी कि भीलों के साथ उपद्रव कर सकें। गुरु रविदास जी महाराज ने ब्राह्मणों के थोथे अहंकार को तोड़ कर के उन के अधूरे ज्ञान की धज्...

32 भाग।।चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास जी।।

भाग।। चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास।।

भाग 31।।चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास।। तिलकधारी पंडे पुजारियों और ब्राह्मणों ने भारत के मूलनिवासी लोना उर्फ देवी कामाख्या, सम्राट सिद्धचानो के मंदिरों के ऊपर अपना आधिपत्य जमाया हुआ है, जिन में अपने झूठे, कल्पित भगवानों को बैठा रखा है। ऐसा ही ब्राह्मणों ने जगन्नाथपुरी मंदिर में भारत के असली मूलनिवासियों को उन के ही मंदिर से भगा कर अपना अधिपति जमा कर के लूट मचाई हुई थी, जिस के बारे में गुरु रविदास जी महाराज को ज्ञात हो गया था, कि वहां मूलनिवासी लोगों को मंदिर के नजदीक फटकने नहीं दिया जाता है और मनुवादियों के गुलाम भील लोग असहाय हो कर दूर से ही जगन्नाथ के दर्शन किया करते हैं, इसीलिए एक दिन वे इस राक्षसी अन्याय को खत्म करने के लिए जगन्नाथपुरी मंदिर के लिए रवाना हो गए, जिस दृष्य के बारे में स्वामी ईशर दास जी महाराज ने गुरु आदि प्रकाश ग्रंथ फरमाया है कि------ चौदह सौ अठहतरे श्री गुरु रविदास। मेले जगन्नाथ दे किआ नाम प्रकाश। जगन्नाथ पुरी मंदिर में गुरु रविदास:---- स्वामी ईशर दास जी महाराज फरमाते हैं कि गुरु रविदास जी महाराज विक्रमी संवत 1478 को अर्बाचीन ऐतिहासिक मंदिर जगन्नाथ पु...

चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास।। भाग 30।।

चँवर वंश के देवतुल्य सम्राट गुरु रविदास ।।भाग 30।। राजा नागरमल का चक्रवर्ति सम्राट गुरु रविदास के समक्ष आत्मसमर्पण:--- गुरु रविदास जी महाराज की अपरंपार दैवीय शाक्ति के समक्ष अहंकारग्रस्त पराजित अनेकों तिलकधारी पंडों, पुजारियों और ब्राह्मणों ने आत्मसमर्पण तो किया ही था मगर न्यायप्रिय शासक राजा नागरमल ने भी चक्रवर्ति सम्राट गुरु रविदास जी महाराज के सामने हत्थियार डाल कर आत्मसमर्पण कर के गुरु दीक्षा ले ली, जिस से गुरु जी की ख्याति सारे विश्व में फैल गई। देश विदेश के विद्वानों ने भी गुरु रविदास जी महाराज को अपना ईष्ट स्वीकार कर के दीक्षा लेना शुरू कर दी। भारतवर्ष के भी कई राजे-रानियों, महाराजाओं-महारानियों, बादशाहों और बेगमों ने गुरु रविदास महाराज के क्रांतिकारी सामाजिक परिवर्तन और दिव्य शक्तियों के बारे में सुन कर के उन के प्रति आकर्षित होना शुरू कर दिया, जिन में राजा कुंभसिंह, उन की पत्नी महारानी झालाबाई, मीराबाई के नाम इतिहास में सुनहरे अक्षरों में लिखे गए हैं। जब राजा नागरमल ने गुरु रविदास जी महाराज को अपना गुरु स्वीकार कर के नामदान की दीक्षा लेली तो उस का वर्णन करते हुए स्वामी ईश्वर द...

चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास।। भाग 29।।

चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास।। भाग 29 ।। गुरु रविदास की महाक्रांति की सफलता:---गुरु रविदास जी महाराज ने, जब सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक क्रांतियों को सारे देश में फैला कर के ब्राह्मणों, तिलकधारियों, पंडों, पुजारियों के ऊपर फतेह प्राप्त कर ली और राजाओं को भी तर्क के आधार पर समझा कर जो ब्राह्मणों को हरा कर ऐतिहासिक जीत हासिल की थी, उस के ही परिणाम स्वरूप राजा नागरमल ने गुरु रविदास जी महाराज की इच्छा और निर्देश के अनुसार मानवीय आधार पर अपने कानूनों में संशोधन कर के अछूतों, वंचितों, गरीबों, भूमिहीनों को न्याय देना शुरू कर दिया, जिस के बारे में स्वामी ईश्वर दास जी महाराज अपने पवित्र ग्रंथ गुरु आदि प्रकाश ग्रंथ में फरमाते हैं कि----- ।।शलोक।। राजा नागर ने एह कड़ा कानून बणाया। खुह बौली मंदर लंगर सभ दा हक रखाया। राजा नागर मल ने कानून बदल डाले:---चँवर वंश के अकेले वीर सपूत गुरु रविदास महाराज ने शूद्रों को सामाजिक न्याय दिलाने के लिए जो महाक्रांति का शुभारम्भ किया था, उस के अनुसार भारत के मूलनिवासियों के लिए राजा नागरमल ने ही कड़े और न्यायमूलक क...

चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास।। भाग 27।।

चँवरवंश के देवतुल्य सम्राट गुरु रविदास ।।भाग27।। जब पंचायत में बैठे हुए कुछ बुद्धिजीवी ब्राह्मणों ने सुझाव दिया कि राजा के पास शिकायत पत्र लिख कर दो, जिस में बताया जाए कि बालक रविदास ब्राह्मणों के व्यवसाय को छीनने की अनाधिकार चेष्टा कर के धोती, तिलक लगा कर शंख, घण्टे और घड़ियाल बजाता है। राजा खुद ही उसे रोकने का फरमान जारी कर देगा। कुछ लोगों ने उन के सुझावों को स्वीकार कर के ऐसा करने के लिए गुरु रविदास जी के ऊपर कई इल्जाम लगा कर के पर्चा लिख कर राजा को देदिया। जिस के बारे में स्वामी ईशरदास जी महाराज ने, ब्राह्मणों के बारे में अपने शब्दों में फरमाया है, कि---- ।।शलोक।। दीर्घ आदमी भेज के रविदास लिआ मंगाई। लखां सेवक घर बाहर दे सारे मगरों आई। जब ब्राह्मणों ने राजा के दरबार में पर्चा दाखिल कर दिया, तब राजा ने भी डर कर तत्काल ही अपना बड़ा आदमी भेजा और बालक रविदास को अपने दरबार में बुला लिया। बालक रविदास तुरंत तैयार हो कर के राजा के दरबार की ओर चल पड़ा। राजा के वारंट का समाचार चारों तरफ फैल गया। बालक रविदास के प्रति सवर्ण लोगों में भी सम्मान बढ़ चुका था, इसलिए ...

लेखक प्रेम दास जस्सल की पत्नी आशा राणी को श्रद्धा सुमन।।

लेखक, संत प्रेम दास जस्सल की पत्नी आशा राणी को श्रद्धाञ्जलि।। 15 दिसंबर 2022 को गुरु रविदास महाराज जी के अनन्य सेवक संत, मनीषी, लेखक श्री प्रेम दास जस्सल जनक पुरी दिल्ली की अर्धांगिनी के मोक्ष प्राप्त करने पर शक्तिनगर, मोहन गार्डन जनकपुरी में श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिस में गुरु रविदास जी महाराज की वाणी का सस्वर वाचन कर के पाठियों ने अपने शब्द कीर्तन के द्वारा आत्मा और परमात्मा के विषय में गुरु जी रविदास जी महाराज के बताए हुए सत्य के ऊपर प्रकाश डाला। उस के उपरांत स्वर्गीय आशा रानी जी को श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए राम सिंह आदवंशी, अध्यक्ष विश्व आदधर्म मंडल ने स्वर्गीय आशा रानी जी के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा, कि आशा रानी जी अत्यंत सुशीला और आदर्श महिला हुई है, जिन के मणिकांचन योग, सहयोग के कारण ही संत, लेखक प्रेमदास जस्सल जी ने गुरु रविदास जी महाराज के जीवन चरित्र और उन के कार्यों और क्रांतिकारी आंदोलन को लेखनी बद्ध कर के जन जन तक पहुंचाने का प्रयास किया है। यह काम तभी संभव हो सकता है, जब लेखक का परिवार उस को पूर्ण सहयोग और वातावरण उपलब्ध करवाएं, इसलिए स्वर्गीय...

चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास।। भाग।।

चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास।। भाग 26।। बालक रविदास जी का चार्जशीट पत्र राजा नागर मल के हाथ में थमा कर, निर्दयी, क्रूर और अत्याचारी तिलकधारियों ने राजा नागर मल को मानसिक और अध्यात्मिक रूप से प्रताड़ित हुए स्वामी ईशर दास जी महाराज के शब्दों में गुरु आदि प्रगास ग्रंथ में फरमाया है, कि:---- ।।त्रिभंगी छंद।। करी अदालत समझ के राजिआ। सानूं रविदास ने बहुत सता लिया। लैंदा चढ़ावै पूजा करदा जग दा। साडी ऐ विरत उह की ऐ लगदा। अंनघढ़त पथर रख माथे टेकदा करदे नकल साडी वल देख के। बैंहदा रविदास ठाकर उते आंण के। चेले मथे टेकण मखौल करण जाण के। करदे नयाँ नहीं मर जांवांगे। तेरे दरबाजे अगे सड़ जामागे। खामागे जहर गुड़ च लपेट के। सिर मुँह काला नीले पैर कर के। मराँगे साहमणे तेरे चिखा ते चढ़ के। बण के प्रेत चिमड़ागे आंण के। साक सम्बधि तैंनूं जी पछाण के। कनां पिछे सिटी जे तूं गल देख के। सानूं ऐवैं राजा ना तूं लमी भालीऐ। असिं उन्हां दी औलाद जिनां कुलां गालियां। नहीं अन पानी लवाँगे मराँगे जी छड के। देवांगे सराफ कालजे नूं कड के। कंब गिआ राजा बाहमना पेख के। हे राजा! अदालत स...

चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास।। भाग।।

चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास ।।24।।बालक रविदास जी महाराज को जब डराने धमकाने और मारने के सारे प्रयास असफल हो गए तब हार मान कर के सभी तीनों वर्णों के लोग उनके चरण कमलों के ऊपर गिर गए और माफी मांग कर अपने प्राण बचाए। गुरु आदि प्रगास ग्रंथ के रचयिता स्वामी ईशर दास जी महाराज फरमाते हैं कि----- ।। शब्द।। माफी लै लई बाहमना सेवक गुर के होई। गुर दिखिया लैबन गुरां ते अमृत कुंन पलोई। मंदिर बनिया गंगा किनारे। नाम तेरो आरती करावण। गुर सिंघासन सैंझी दा सेवक सीस नवामण। सतगुर गए सेवकां आरती कराई। सीस नवाया सिंघासन गुर का पंडिआं ईरखा खाई। पराजित ब्राह्मणों द्वारा आत्म समर्पण :---बालक रविदास जी महाराज की अपरंपार शक्ति को देख कर के सभी पगलाए कातिलों ने उन के चरणों के ऊपर नारियल और रुपए चढ़ाए। सभी तिलकधारियों, मनुवादियों ने माफी मांग कर गुरु दीक्षा की फरियाद की। बालक रविदास ने सभी को अपने शिष्य बना कर सुधरने का मौका देते हुए माफ कर दिया। सभी को कुंड में अमृत जल तैयार कर के अमृत पिला कर पवित्र कर के गुरु दीक्षा देकर उपकृत किया। गंगा तट पर गुरु का मंदिर बनवाया गया:---...

चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास।। भाग्ग 22।।

चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास जी।। भाग 22।। कांशी के समीप गड़ा घाट के ऊपर ब्राह्मणों, राजपूतों और वैश्यों की गरमा गरम बहस के बाद निर्णय लिया गया, कि बालक रविदास को भक्ति मार्ग से हटाने के लिए तत्काल कोई कार्रवाई की जाए। सभी उग्र स्वभाव वाले लोगों ने मानवता को त्याग कर हैवानियत का रास्ता तैयार कर के बालक रविदास को पूजा पाठ से हटाने के लिए, मारने का भी सुझाव दे दिया, जिस को सभी ने स्वीकार कर लिया और जिस के लिए नृशंस कातिलाना योजना भी बनाई जाने लगी, जिस के बारे में गुरु आदि प्रगास ग्रंथ के रचयिता स्वामी ईशर दास जी महाराज ने फरमाया है कि:--- ।।त्रिभंगी छंद।। कर दे बामण मशवरा आई के बैठ गए। घाट पर सभी जाई के। भेजो कोई आदमी उन्हां समझाऊँण नूं। शंख ते घड़िआल पूजा जी हटाऊँण नूं। जा छड के चमार साडे विच आ लऐ। वेद ते पुराण शास्त्र पढ़ाआ लऐ। मन्ने जे ना कैहणा जानों दईऐ मार। जेहड़ा होवे साथी छडौ ना चमार जी। नहीं ता अगे वांगू अग लावो चल के। बैठ गए चमार साडी पूजा मल के। समझाबो कोई जा के जान नूं बचा लऐ। मंगू दा भतीजा अलिया मरासी ऐ। ऐस नूं तां भेजो गल जा के दसी ऐ।...

चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास।। भाग 21।।

चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास जी ।।भाग 21।। बालक रविदास जी की शादी हुए कुछ ही दिन हुए थे कि आग बबूले तिलकधारी फिर पागल हो उठे और फिर पंचायत करने की तैयारी करने लग पड़े। मरासी अलिया को बुला कर सभी पण्डे, पुजारियों तिलकधारियों और मनुवादियों को गढ़ा घाट पर इकठ्ठे करने के लिए कहा गया। अलिया भी तुरन्त गाँव में चला गया और डांऊडी पीट कर लोगों को मीटिंग की सूचना देदी, जिस के अनुसार सभी गुंडे वहाँ इकत्रित हो गए। गढ़ा घाट पर ब्राह्मणों की पंचायत के बारे में स्वामी ईशर दास जी महाराज, गुरु आदि प्रगास ग्रंथ में फरमाते हैं कि------ ।।शलोक।। चारे वरन आ सेमदे बामण ते भूपाल। सुन सुन के हो गए अग तोऊँ लाल। पूजा साड़ी ले गिआ जाति दा चमिआर। शंख घड़िआल बजामदा वर्ण बामन लिआ धार। सारे इकट्ठे होई के मसबरा ऐह करवाया। जिस समय नूं सी उड़ीकदे बकत हुंण आया। ब्राह्मण करदे गलां ऐह किथे डूब मरिए जाई। सुण सुण गलां रविदास दिआं शर्म बड़ी है आई। परमानंद रविदास दा सेवक इक कैंहदा सुनिआ यार। मर जाऊ निघर जाऊ बामण सिर साडे धिरगार। इक कहे वेद बनाया नईया नवीना नाम उस का गामण। ब्रह्मा ते ...

चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास जी।। भाग20।।

चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास जी।।भाग 20।। ब्राह्मणों की पंचायत इस लिए स्थगित हो गई थी कि जल्दी ही बालक रविदास जी की शादी हो रही थी, जिस से इन काफर लोगों ने अनुमान लगा लिया कि शायद विवाह के बाद बालक रविदास ब्राह्मणों के खिलाफ पाखण्ड मिटाओ आंदोलन समाप्त कर देगा और हमारा लूटपाट का अंधा धन्धा चलता रहेगा। विवाह का वर्णन:---- गुरु आदि प्रगास ग्रंथ के रचयिता स्वामी ईशर दास जी महाराज ने, गुरु रविदास जी महाराज के विवाह का इतिहास और विवरण लिखते हुए फरमाया है कि------ ।।शलोक।। चौदह सौ पचिहतर विक्रमी संगरांद जेठ की आई। श्री गुरु रविदास की इस दिन होई सगाई। मिर्जापुर सुजाने की सुता सुभागण तिस का नाम। तिस संग शादीसुधा गुरु जी मह साठ शब्द पढ़ें आम। शब्द वाणी करदिया वेदाँ लईआं कराई। मुड़ कर मिर्जापुर ते कालू माजरे धाऐ। दइयारी संतोषी भानी वी घुरविनी मेलणा नाल। सुभागण खड़ी टोलिऊँ पढ़न शब्द ना कंडण गाल। कर अरदासा बंड मठिआई मेल गेल सब गिआ। लगी सलामी सतगुरु नूं ऊपर सखां रखियां। शुभागण गुर की आगिआ विच रैंहदी सी दिन-रात। पतिव्रत धर्म बिच पके मन बोले ना कड़वी बात। ...

चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास।। भाग।।

चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास जी।। भाग 18।।

चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास जी।।भाग 18।। गुरु रविदास जी महाराज ने जिन शूद्रों के लिए दिन रात अपने प्राणों की बाजी लगा कर क्रांतिकारी आंदोलन शुरू किया था उन शूद्रों ने गुरु रविदास जी महाराज को नहीं पहचाना और उन को एक साधारण व्यक्ति समझ कर के उन का सहयोग तक नहीं किया था। मगर गुरु जी अपनी धुन के पक्के थे। अपने लक्ष्य को सामने रख कर के अग्निपथ के ऊपर आगे से आगे बढ़ते ही जा जाते थे। उन की अलौकिक शक्तियों को देख कर के मनुवाद की चूलें हिल गई थी और मनुवादी ये भी समझ रहे थे, कि बालक रविदास कोई आम साधारण बालक नहीं है, इसलिए तत्कालीन बड़े-बड़े प्रसिद्ध प्रकांड पंडित उन के दर्शन करने के लिए बाबा कालू दास के निवास पर आते थे। ये लोग बालक रविदास जी के बारे में अनुमान लगाते रहे, कि वास्तव में ही बालक रविदास आध्यात्मिक शक्ति के पुंज है! जिन के बारे में तत्कालीन प्रकांड पंडित परमानंद स्वामी ईश्वर दास जी महाराज के शब्दों में बालक रविदास के बारे में विचार व्यक्त करते हुए कहते हैं, कि-- ।।शलोक।। मछ कच्छ वराह हयग्रीव ते नरसिंह कृष्ण राम। सब अवितारों से गुर द...

चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास।। भाग 17।।

चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास जी।। भाग 17।। गुरु रविदास जी को मूर्ख मनुवादी कंगाल लिखते:---बालक रविदास जी का जन्म अमीर घराने और उद्योगपति परिवार में हुआ था मगर ईर्षालु मनुवादी लेखक गुरु रविदास जी को कंगाल परिवार में जन्मे हुए लिखते आए हैं, जिस के आधार पर कई ऐसी काल्पनिक कथाएँ, लघु कथाएँ, छोटी बड़ी फिल्में और ना जाने कितने अपमान जनक किस्से घड़े गए हैं, जो ब्राह्मणबाद की मानसिक जलन और ईर्षा को दर्शाते है। गुरु आदि प्रगास ग्रंथ के रचयिता स्वामी ईशर दास जी इस पवित्र ग्रंथ में लिखते हैं कि जब बालक रविदास जी का प्रकाश हुआ था तब उन के बाबा कालू दास ने अपने कर्मचारियों को ही नहीं आम जनता का कर्ज तक माफ कर दिया था, वे फरमाते हैं कि-- ।।शब्द बिहाग।। बधाईयां देण तां सामीयां आईयां है। बाबे कालू ने बहियाँ कढवाईयां है। व्याज मूल ते माफ करवाईयां है। धन धन कैहंदे जन्मिया येह साईयां है। जन्म दे सार तां बंधन तुड़वाईयां है । लखां दान कीते मझां ते गाइयां है। धन धन कैंहदे है जांदे । लखां शीशां है दुआंदे। रविदास गुण हैं गांदे। बालक रविदास के प्रकाश पर वधाइयाँ:-- जब बा...

चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास जी।। भाग 14।।

चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास जी।। 14।। बालक रविदास जी की दैवी शक्ति:---- बालक रविदास जी जन्म से ही अपनी दैवी शक्तियों का प्रदर्शन कर रहे थे, जिस से प्रभावित हो कर के चारों वर्णों के लोग उन के दर्शनों के लिए उमड़ पड़े थे। जब उन्होंने चमड़े के खिलौने को हाथ से छुआ था तब वह रेलगाड़ी की तरह दौड़ने लग पड़ा था, जिस दृश्य को देख कर के उपस्थित सभी लोग हैरान हो गए थे और बालक के प्रति आध्यात्मिक आस्था बढ़ती गई। परिवार के सभी सदस्य प्रतिदिन बालक रविदास के अनूठे कामों को देख कर के बहुत प्रभावित होते जा रहे थे, जिस के कारण उन के मामा के लड़के जीवनदास और उसकी पत्नी भानी ने बालक रविदास को अपना ईष्ट स्वीकार कर लिया था और उनके प्रति अथाह श्रद्धा उत्पन्न हो गई थी। बालक रविदास की रचनात्मक शक्ति:----- बालक रविदास जी अभी पांच वर्ष के भी नहीं हुए थे, कि उन के मुख से निकले हुए प्रत्येक वाक्य काव्य रचना से कम नहीं होते थे। ऐसा लगता था कि बालक रविदास जन्मजात ही कवि और लेखक हैं। स्वामी ईश्वर दास जी महाराज ने उन के कृतित्व और काव्य रचना के बारे में फरमाया है, कि जब वे पांच वर्ष के हो गए तब बालक रविद...

चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास जी।। भाग13।।

चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास जी।। भाग 13।। बालक रविदास का जन्म सम्पन्न परिवार में:---गुरु रविदास जी महाराज का जन्म चँवरवंश के अमीर उद्योगपति परिवार में हुआ था। उन के बाबा कालू दास जी और पिता संतोष दास जी चमड़ा, कपड़ा और खिलौना उद्योग के सुप्रसिद्ध उद्योगपति थे। जिन उद्योगों में सैकड़ों लोग कार्य करते थे। चमड़े से बने वच्चों के खिलौने खरगोश, शेर, गेंद, और कोट जैक्ट,बैलट, मस्क आदि उच्च कोटी का सामान विदेशों में निर्यात किये जाते थे। उच्च स्तर का रंग बिरंगा कपड़ा कारखानों में बनता था, जिस का व्यापार अखंड भारत में होता था। ऐसे संपन्न परिवार में गुरु रविदास जी महाराज का जन्म हुआ था। जब बालक रविदास जी का जन्म हुआ था, तब बाबा कालूदास जी अपनी बेटी के घर भागलपुर गांव में गए हुए थे। बालक रविदास जी का जन्म उत्सव ग्याहरवें दिन उन के निवास स्थान पर मनाया गया। बालक रविदास का पंजाप:--- गाँव कालू माजरे में बालक रविदास का जन्मदिन उत्सव बड़े ही शाही ढंग से बड़ी धूमधाम से मनाया जा रहा था। जिस में सभी रिश्तेदारों और कारखानों के कर्मचारियों और अधिकारियों को आमंत्रित किया गया था, जिस के बारे म...