चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास।। भाग।।

चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास।। भाग 26।। बालक रविदास जी का चार्जशीट पत्र राजा नागर मल के हाथ में थमा कर, निर्दयी, क्रूर और अत्याचारी तिलकधारियों ने राजा नागर मल को मानसिक और अध्यात्मिक रूप से प्रताड़ित हुए स्वामी ईशर दास जी महाराज के शब्दों में गुरु आदि प्रगास ग्रंथ में फरमाया है, कि:---- ।।त्रिभंगी छंद।। करी अदालत समझ के राजिआ। सानूं रविदास ने बहुत सता लिया। लैंदा चढ़ावै पूजा करदा जग दा। साडी ऐ विरत उह की ऐ लगदा। अंनघढ़त पथर रख माथे टेकदा करदे नकल साडी वल देख के। बैंहदा रविदास ठाकर उते आंण के। चेले मथे टेकण मखौल करण जाण के। करदे नयाँ नहीं मर जांवांगे। तेरे दरबाजे अगे सड़ जामागे। खामागे जहर गुड़ च लपेट के। सिर मुँह काला नीले पैर कर के। मराँगे साहमणे तेरे चिखा ते चढ़ के। बण के प्रेत चिमड़ागे आंण के। साक सम्बधि तैंनूं जी पछाण के। कनां पिछे सिटी जे तूं गल देख के। सानूं ऐवैं राजा ना तूं लमी भालीऐ। असिं उन्हां दी औलाद जिनां कुलां गालियां। नहीं अन पानी लवाँगे मराँगे जी छड के। देवांगे सराफ कालजे नूं कड के। कंब गिआ राजा बाहमना पेख के। हे राजा! अदालत समझ कर करना:---- गुस्साए तिलकधारी पण्डित राजा नागरमल के पास जा कर उसे डराते हुए कहने लगे कि, "हे राजा! हमारे दावे की सुनवाई सोच समझ कर ही करना क्योंकि हमें रविदास ने वहुत सता रखा है" अर्थात वहुत ही दुखी और परेशान कर रखा है। पूजा करनी हमारी विरत:---- रविदास सारे संसार के लोगों से पूजा पाठ करवा कर उन से सारे चढ़ावे भी खुद ही ले रहा है। पूजा करना और कराना हमारी विरत है, वह पूजा करने, कराने वाला कौन होता है? अनघढ़त पत्थरों पर बैठ कर हमारा जलूस निकालता:--- पीड़ित ब्राह्मण अपना दुख दर्द बताते हुए राजा से कहते हैं, कि वह हमारे सामने आ कर हमारा मजाक उड़ाने के लिए अनघड़े पत्थरों को देवता बताता है और उन को धूप दीप, तिलक लगा कर उन के उपर बैठ जाता है। रविदास के चेले भी उस की ही नकल कर के हम सब को चिड़ाते रहते है। ब्राह्मणों का मखौल उड़ाता:-----तिलकधारी ब्राह्मण राजा नागरमल के पास फरियाद करते हुए कहते हैं, कि स्वयं बालक रविदास तो देवताओं के सिर के ऊपर बैठता हैं ही परंतु उस के शिष्य भी ऐसा ही कर के हमारा मजाक उड़ाते हैं और हमारी नकल करके पत्थरों के पास माथे टेकते हैं, जो हम से बर्दाश्त नहीं हो पा रहा है। हम मुँह काला कर के मर जाएंगे:---- हे राजा, नागरमल! उचित फैसला कर दे, यदि आप ने हमारी समस्याओं पर ध्यान नहीं दिया और हमारा अपमान कराना बंद नहीं करवाया तो हम नीले पैर और अपना मुंह काला कर कर के, गुड में जहर मिला कर आत्महत्या कर लेंगे और फिर हम आप को अभिशाप भी दे देंगे। भूत प्रेत बन कर तुझे चिमड़ जाएंगे:----ब्राह्मण राजा को डरा धमका कर कहते हैं, कि हम आप के सामने चिता के ऊपर बैठ कर जल जाएंगे और हम सभी तेरे रिश्तेदार, संबधी के रूप में नजर आ कर, भूत, प्रेत बन कर के आप के साथ चिपक कर आप को परेशान करेंगे। हमारे पूर्वजों ने अपने वंश तवाह किये हैं:-----हे राजा! तूं हमारी समस्याओं को नजर अंदाज कर के हलके में मत लेना! हमारी समस्याओं को दूर कर अन्यथा हम उन परिवारों से संबंध रखते हैं, जिन्होंने अपने ही वंशों को बर्बाद कर लिया है। हम ने अपने मान सम्मान के खिलाफ कभी किसी से समझौता नहीं किया है और ना ही किसी की कोई अपमान जनक बात सहन की है। अगर कभी किसी ने हमारे ऊपर किसी भी प्रकार की छींटाकशी करने की कोशिश भी की है, तो हम ने अपने परिवारों तक को खत्म कर के अभिशाप देख कर दूसरों को भी बर्बाद कर दिया है। राजा को सराफ की धमकी:----- राजा से अपनी मांगों को बल पूर्वक मनमाने के लिए ब्राह्मणों ने धमकी तक दे डाली और कहा, "हम अपना रोटी पानी त्याग कर, मर जाएंगे और विराट रूप दिखा कर के अर्थात भयंकर रूप धारण कर के आप को अभिशाप दे देंगे, जिस से आप के कुल का सर्वनाश हो जाएगा"। नागर मल का काँपना:----- ब्राह्मणों की आतंकित करने वाली बातों को सुन कर बेचारा राजा नागरमल भी भयभीत हो कर डरने लगा। उन की बातों को सुन कर के घबरा गया और थर थर कांपने लगा। ब्राह्मण अभिशाप का बेतुका आतंक:----तिलकधारी ब्राह्मण, साधु, संत लोग अभिशाप का बेतुका हत्थियार प्रयोग कर के निरीह लोगों को भयभीत कर के अपनी इच्छाओं को पूर्ण करते आए हैं। इन लोगों ने जनता को मानसिक रूप से अपंग बना कर के रखा हुआ है। ये काल्पनिक मानसिक कुंठा बनाई हुई है, कि यदि सफेद और गेरूए वस्त्रधारी गुस्से में आ कर बुरा कह दें, तो बुरा हो जाता है। अभिज्ञान शाकुंतलं (शकुंतला और दुष्यन्त) नामक नाटक में ब्राह्मण नाटककार ने लिखा हुआ है, कि शकुंतला अपने प्रेमी दुष्यन्त के प्रेम में खोई हुई थी , जिस के कारण वह दुर्भाषा ऋषि की आवाजों को नहीं सुन सकी और ऋषि दुर्भाषा ने गुस्से में आ कर उस मासूम कन्या शकुंतला को अभिशाप देते हुए कह दिया कि "जिस के प्यार में तूं खोई हुई हो, वह तुझे भूल जाएगा"। वास्तव में ऐसे काल्पनिक पात्रों को जन्म देना ब्राह्मण लेखकों का धन्धा रहा है, इस प्रकार के आतंकबाद को फैला कर ब्राह्मणबाद को जिंदा रखा गया, इन्हीं काल्पनिक कथाओं के आतंक से राजाओं, महाराजाओं को भी भयभीत करके ये लोग निठ्ठले रह कर घर पर ही जनता को ठग कर खाते पीते आए हैं। गरीबों को ऐसे अभिशापों की कोई भी परवाह नहीं करनी चाहिए और ना ही ऐसे संदेश मन को देने चाहिए। कोई किसी का कुछ नहीं बिगाड़ सकता, यदि हमारा कर्म ठीक हो। रामसिंह आदिवासी। अध्यक्ष, विश्वधर्म मंडल हिमाचल प्रदेश

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