चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास।। भाग 30।।

चँवर वंश के देवतुल्य सम्राट गुरु रविदास ।।भाग 30।। राजा नागरमल का चक्रवर्ति सम्राट गुरु रविदास के समक्ष आत्मसमर्पण:--- गुरु रविदास जी महाराज की अपरंपार दैवीय शाक्ति के समक्ष अहंकारग्रस्त पराजित अनेकों तिलकधारी पंडों, पुजारियों और ब्राह्मणों ने आत्मसमर्पण तो किया ही था मगर न्यायप्रिय शासक राजा नागरमल ने भी चक्रवर्ति सम्राट गुरु रविदास जी महाराज के सामने हत्थियार डाल कर आत्मसमर्पण कर के गुरु दीक्षा ले ली, जिस से गुरु जी की ख्याति सारे विश्व में फैल गई। देश विदेश के विद्वानों ने भी गुरु रविदास जी महाराज को अपना ईष्ट स्वीकार कर के दीक्षा लेना शुरू कर दी। भारतवर्ष के भी कई राजे-रानियों, महाराजाओं-महारानियों, बादशाहों और बेगमों ने गुरु रविदास महाराज के क्रांतिकारी सामाजिक परिवर्तन और दिव्य शक्तियों के बारे में सुन कर के उन के प्रति आकर्षित होना शुरू कर दिया, जिन में राजा कुंभसिंह, उन की पत्नी महारानी झालाबाई, मीराबाई के नाम इतिहास में सुनहरे अक्षरों में लिखे गए हैं। जब राजा नागरमल ने गुरु रविदास जी महाराज को अपना गुरु स्वीकार कर के नामदान की दीक्षा लेली तो उस का वर्णन करते हुए स्वामी ईश्वर दास जी महाराज पवित्र गुरु आदि प्रकाश ग्रंथ में फरमाते हैं कि---- पूंजी शब्द दी राजे नागर नूं मिल गई बजर कबाड़ खुल गए। होईआ गिआन राजेनूं गुरां पासों माया मोह अवगुण भुल गए। दीक्षा मिलते ही राजा के कबाड़ खुल गए:---- स्वामी ईश्वर दास जी महाराज फरमाते हैं कि ज्यों ही राजा नागरमल को ज्ञान ज्योति की पूंजी (संपत्ति) मिल गई, वैसे ही उस के बंद पड़े बज्र की तरह बने हुए अज्ञानता के दरवाजे खुल गए अर्थात उस की ज्ञान की ज्योति अंतर्मन में प्रकट हो गई। राजा को अध्यात्मिक ज्ञान हो गया और गुरु रविदास जी महाराज की तरफ से भी उन को आशीर्वाद मिल गया, जिस के कारण वह सांसारिक काम, क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार और विषय विकारों जैसे अवगुणों को भूल गया। अहं ब्रह्मअस्मि ब्रह्म नूं जानिआं जात पात फिरके कुल गए। लाया हुकम राजे सब कौमा नूं खुह बौड़ी मंदिर सब खुल गए। नागरमल को ब्रह्म अस्मि का ज्ञान:---- राजा नागरमल को आत्मा और परमात्मा के विषय में समझाते हुए, गुरु रविदास जी महाराज ने फरमाया कि हमारा शरीर ही परमपिता परमेश्वर का निवास स्थान है। प्राण इसी शरीर में निवास करता है और जो कर्म मन शरीर से करवाता है, आत्मा भी वही कार्य करती है, इसलिए अपने मन से हमेशा काम, क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार को सीमा में रख कर के ही मन से काम लो, इन पाँचों के बिना भी संसार नहीं चलता है मगर इन की अधिकता के कारण मनुष्य पथभ्रष्ट हो जाता है। परमपिता परमेश्वर की ज्योति शरीर के अंदर निवास करती है, इसीलिए मनुष्य के अंदर जो ज्योति है वह उसी आदि पुरुष की है। संसार में जितने भी धर्म और मत हैं, उन्होंने जाति-पाती और कई फिरके पैदा कर रखे है। गुरु जी के अमृत ज्ञान को सुन कर राजा आत्मविस्मृत हो गया और ब्राह्मणों के समझाए विषैले ज्ञान से मुक्त हो गया। नागरमल के हुकम:---- राजा ने गुरु ज्ञान से प्रभावित हो कर जाति पाती, छुआछूत आदि को भुला दिया और सारे राज्य में घोषणा कर दी कि आज से सभी जातियों के लिए एक समान कानून लागू कर दिये गये हैं, सभी जातियां एक ही कुएं से पानी भरेंगे और पीयेंगी। सभी जातियों, धर्मों के लोग सभी मंदिरों में इकठ्ठे पूजा अर्चना कर सकेंगे। कोई किसी के साथ भेदभाव नहीं करेगा। इस प्रकार राजा ने मानवीय आधार पर कानून बना कर के सभी नागरिकों को एक साथ खाने-पीने और एक ही कुएं से पानी भर कर पीने का आदेश जारी कर के लोगों की सामाजिक बेड़ियों को खत्म कर के समाज में समरसता पैदा कर दी। कीति राजा दी मन लई सारेआंं इक गल उत्ते तुल गए। सारे हक हकूक दिते अछुतां नूं नौकरी जमीन मुल गए। नागरमल के एक हुकुम पर नाराज:---- राजा नागरमल ने गुरु रविदास जी की इच्छा और मार्गदर्शन के अनुसार अपने राज्य में सख्त आदेश जारी करके समाजवाद की स्थापना कर दी। प्रबुद्ध राजा ने सभी धर्मों, जातियों, फिरकों के गुलाम लोगों को जमीन, जायदाद, शिक्षा, नौकरी और समानता के मौलिक अधिकार दे दिए, जिस से मनुवादी राजा के साथ नाराज हो गए। नौकरी जमीन देने से मनुवादी भड़क गए:---- गुलाम शूद्रों को नौकरी और जमीन के अधिकार दिये जाने पर मनुवादी भड़क गए और नाराज हो गए, कि ये दोनों ही अधिकार क्यों दिये गए? मनुवादी इन्हीं दो अधिकारों को अपने पास रखते आए थे, जिन के कारण ये लोग निठल्ले बैठ कर मजदूरों की कमाई खाते थे। इन्हीं अधिकारों का दुरूपयोग कर के मनुवादी, अछूतों को पशुओं की तरह प्रयोग करते थे और दिन रात काम में जोते रखते थे, जिस के बदले में ये लोग शूद्रों को कोई मजदूरी, बेतन नहीं देते थे। जो मन में आता था, वही इन गुलामों को खाने और पीने को देते थे। वास्तव में, आज भी मनुवादी इसी प्रथा को जिंदा रखना चाहते हैं, इसीलिए ये लोग तत्कालीन मनुस्मृति के काले कानूनों को पुन:जिंदा कर के लागू करना चाहते हैं। यदि भारत में अंग्रेज नहीं आते, महामहिम लार्ड मैकाले सभी जातियों के लिए शिक्षा के दरबाजे ना खोलते, तो आज भी अछूतों की वही दुर्दशा होती जो गुरु रविदास की महाक्रांति से पूर्व शूद्रों की होती थी। आज भी ये मनुवादी लार्ड मैकाले को कोसते नहीं थकते, उसे गालियाँ देते फिरते हैं कि उस ने शूद्रों को शिक्षा का अधिकार क्यों दिया था। आज फिर मनुस्मृति को अपरोक्ष रूप से लागू कर के दोहरी शिक्षा व्यवस्था लागू कर दी गई है, ताकि मूलनिवासी जनता के वच्चों को अधूरा ज्ञान देकर केवल मजदूर बनाए रखा जा सके। मूलनिवासी राजनेताओं को इस छल कपट को समझ कर, गुरु रविदास जी की क्रांति को असफल होने से बचाने के लिए, अपने राजनीतिक दलों के अनुशासन को भुला कर अपना गुट बना कर अपने वहुजन समाज के हित के लिए स्वच्छ राजनीति करनी होगी अन्यथा दैवीय दण्ड अवश्य मिलेगा और गुरु रविदास जी महाराज भी माफ नहीं करेंगे। रामसिंह आदवंशी। अध्यक्ष, विश्व आदि धर्म मंडल, हिमाचल प्रदेश।

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