33भाग।।चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास।।

भाग 33।। चँवरवंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास।। गुरु रविदास महाराज ने जगन्नाथ की मूर्ति को मंदिर से बाहर बुला कर के जो धार्मिक क्रांति की थी, उस की सफलता के बाद ब्राह्मणों को सबक सिखाने के लिए जगन्नाथपुरी में नया मंदिर बनवा दिया। गुरु जी ने मंदिर के पुजारी भी भीलों को बना कर उस की देखभाल और पूजा पाठ का कार्य उन को ही सौंप दिया था, जिस का वर्णन करते हुए स्वामी ईश्वर दास महाराज, गुरु आदि प्रकाश ग्रंथ में करते हुए फरमाते हैं, कि--- ।। शलोक।। श्री गुरु रविदास जी कुझकु दिन उथे रहाइ के। माँण बाह्मना दा तोड़ के पुजारी भील बनाई। भीलों को पुजारी बनाना:---कहीं ब्राह्मण धार्मिक क्रांति को विराम ना लगा दें, इसलिए गुरु रविदास जी महाराज ने कुछ दिन जगन्नाथपुरी में ही व्यतीत किए और इन दिनों में वे स्वयं भी मंदिर में पूजा अर्चना का कार्य देखते रहे ताकि कोई भी ब्राह्मण, राजपूत, वैश्य और तिलकधारी भीलों के साथ छेड़छाड़ ना कर सकें। उन के सामने किसी की भी हिम्मत नहीं पड़ी कि भीलों के साथ उपद्रव कर सकें। गुरु रविदास जी महाराज ने ब्राह्मणों के थोथे अहंकार को तोड़ कर के उन के अधूरे ज्ञान की धज्जियां उड़ा कर के लोगों के सामने नंगा कर दिया था और उसे बढ़ कर तो ये अजीबो गरीब घटना घटी, जिस के अनुसार उन्होंने जगन्नाथपुरी में जगन्नाथ की सेवा करने के लिए भीलों को ही पुजारी बना लिया था। बरतिआ भंडारा इक थां बामन भील चमार। अदभुत कौतुक कर के तुर पाए गुर अवतार। सभी जातियों को एक ही भंडारा:--- गुरु रविदास जी महाराज भारत के कोने कोने में जो धार्मिक क्रांति करते जा रहे थे, उस के फलस्वरूप देश विदेश के लोगों ने गुरु जी को अपना गुरु बनाने की होड़ लगा दी। गुरु जी की भीलों पर इतनी कृपा हुई थी कि जगन्नाथपुरी में करोड़ों रुपए का चढ़ावा आना शुरू हो गया। इसी चढ़ावे से जो धन दौलत इकठ्ठी होने लगी उसी से ही वहाँ 24 घंटे भंडारा शुरू हो गया, जिस में ब्राह्मण, भील और चमार सभी मिल बैठ कर के खाना बनाने लगे और सामूहिक रूप से एक ही पंगत में बैठ कर भोजन खाने लगे। जब यह अद्भुत, निराला परिवर्तन शुरू हुआ, तब आदि पुरुष के अवतार गुरु रविदास जी महाराज जगन्नाथ पुरी को छोड़ कर वहाँ से चल पड़े। शब्द गौऊँदिआं संगतां ऐसी लाल कौन करै। बाह्मन पुजारी हटाई के भील गए सन तरै। गुरु जी की विदाई के समय संगत ने शब्द गाया:--- जब गुरु रविदास जी महाराज जगन्नाथ पुरी से चलने लगे तब उपस्थित संगत ने भरी आँखों से गुरु जी के विदा होने पर उन का लिखा हुआ शब्द शब्द गाना शुरू कर दिया, कि हे गुरु महाराज! ऐसी लाल तुझ बिन कउन करै।। गरीब निवाजु गुसइंआ मेरा! माथै छत्र धरै। ऐसी लाल आप के बिना हमारी कौन कर सकता है? अर्थात आप के बिना कोई भी हम मूलनिवासियों को मान-सम्मान और आदर, सत्कार नहीं दे सकता है। हे गरीबों को सम्मानित करने वाले छत्र पति सम्राट, हे गरीबों के स्वामी! ये सब कुछ आप ही कर सकते हैं! आप ने हीं अमानवीय व्यवहार करने वाले लुटेरे ब्राह्मणों और ब्राह्मण पुजारियों को हटा कर के भीलों को पुजारी बनाया है, जिस के कारण यहां के भील तर गए हैं अर्थात भीलों का कल्याण हो गया है। भील पुजारी जगन्नाथ दे, पंड़ितां दा रूप बणाईआं। अनेक पीढियां अज तक होईआं छ:सौ वर्ष कहाईआं। भीलों को पंडितों का रूप:---- आश्चर्यजनक परिवर्तन कर के गुरु रविदास जी महाराज ने जगन्नाथपुरी के भीलों को जगन्नाथ की मूर्ति के पुजारी घोषित कर दिया और उन्होंने पुजारियों का काम शुरू कर दिया, उन को भी पंडितों का पहरावा पहना कर के, ब्राह्मण भेष बना कर के पुजारियों के काम करवाने लगे। स्वामी ईशर दास जी महाराज फरमाते हैं, कि जगन्नाथपुरी में आज तक भीलों की अनेकों पीढ़ियां हो चुकी है और छ:सौ से भी अधिक सालों से जगन्नाथपुरी में भील ही पूजा अर्चना करते और करवाते आ रहे हैं। आज तक गुरु रविदास जी महाराज की इतनी बड़ी धार्मिक क्रांति छुपाए रखी गई, जिस को गुरु आदि प्रकाश ग्रंथ के रचयिता स्वामी ईश्वर दास जी महाराज ने, सन 1950 में उजागर किया है, उन्होंने ही इस सत्य को जनता के सामने प्रस्तुत कर के गुरु रविदास महाराज की अजेय शक्ति का प्रचार प्रसार किया है। ब्राह्मणों ने गुरु जी की क्रांति को रोके रखा:----किसी भी मनुवादी ब्राह्मण ने गुरु रविदास जी महाराज की इतनी बड़ी धार्मिक क्रांति को संगत के सामने कभी भी अपने प्रवचन से अवगत नहीं कराया मगर ठीक इस के विपरीत इन अधूरे ज्ञानियों ने गुरु रविदास जी महाराज को केवल चर्मकर्म करते हुए दिखा कर के उन का मान-सम्मान कम करने का ही प्रयास किया है, ये इसलिए किया गया है क्योंकि पाखण्डी, ढोंगी, अडंबरी अज्ञानी पंडों, पुजारियों और तिलकधारियों का गुरु रविदास जी महाराज ने उन के अल्पज्ञान का पोस्टमार्टम बुरी तरह से किया था, जिस को ये लोग बर्दाश्त नहीं कर पा रहे थे और भावी पीढ़ियों को भी अपनी घटिया मानसिकता का संदेश दे कर के गुरु रविदास महाराज को नीच और निम्न जाति का सिद्ध कर के चर्मकर्म करने वाले भगत के रूप में प्रचारित किया है। जाट सिखों ने भी गुरु रविदास जी महाराज को भगत भगत कह कर, लिख कर, गा गा कर भगत भगत पुकारते आ रहे हैं,जब कि सिक्खों के गुरु प्रथम गुरु, गुरु नानक देव जी, गुरु रविदास जी महाराज के शिष्य थे, जिस से प्रमाणित होता है, कि गुरु रविदास जी महाराज गुरुओं के गुरु हुए हैं और संतों में शिरोमणि संत हुए हैं, जिन का आज तक कोई मनुवादी, जाट सानी नहीं हो सका है। गुरु रविदास जी महाराज के जब बाबन राजे-रानियां, महाराजे-महारानियाँ, बादशाह और बेगमें शिष्य हुए हैं, तो फिर कौन ऐसा मूर्ख शिष्य होगा, जो अपने गुरु को चमड़े का कार्य करने देते। गुरु जी को चर्म-कर्म करते दिखाना ब्राह्मणों की फितरत:-- गुरु रविदास जी महाराज ने कभी भी चर्मकर्म नहीं किया है, ये केवल ईर्षालु मनुवादी ब्राह्मणों व जाट सिखों का सोचा समझा षड्यंत्र मात्र है, जिस के बारे में मूलवासी स्कॉलरों को चिंतन करने और सत्य को ढूँढने की जरूरत है।

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