37भाग।।चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास।।
37 भाग।। चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास।।
।।शब्द विहाग।।
गुरु रविदास जी की दर्शनाभिलाषी पुजारी कन्या गंगा व्याकुल होकर के गुरु रविदास जी के दर्शन करने के लिए घर से चल पड़ी, जिस का वर्णन करते हुए स्वामी ईश्वर दास जी महाराज *गुरु आदि प्रकाश ग्रंथ* में लिखते हुए फरमाते हैं कि----
गुरु रविदास मंन में मिथ कर आदपुरुष दा दर्शन पाइऐ।
गंगा उर धारना ऐह करावे। माया शक्ति दा रथ बनवावे ।
कुमारी कन्या गंगा के मन में गुरु दर्शन की उमंग:---- गंगा ने गुरु रविदास जी के प्रति मन में यह सुनिश्चित कर लिया कि आज मैं विश्व की रचना करने वाले आदि पुरुष के पैगंबर गुरु रविदास जी महाराज के दर्शन करूंगी, इसलिए उस ने हिरदय में ये धारण कर लिया, कि मैं ऐसा श्रृंगार करूँगी जिसे देख कर मूर्ख, कामी, पाखण्डी, अज्ञानी तिलकधारी मोहित हो कर भटक जाएं। वह मायावी शक्ति के रथ के ऊपर सवार हो कर गुरु रविदास जी के दर्शन के लिए चल पड़ी।
हीरे पंनिया दी जड़त जड़ावे। अदभुत रथ अनत ना पावे।
तिस झलक सूरज जिऊँ आवे। दिव भुखण एंचल दिव लावे। हँबा परि तंऊँ रूप सुहाया।
अद्वितीय श्रृंगार:---- गंगा ने ढोंगी तिलकधारियों की परीक्षा लेने के लिए हीरे, मोतियों और पन्नों से जड़ा हुआ पहराबा पहन कर अत्यन्त अनूठे रथ पर सवार हो कर घर से चल पड़ी। उस के दिव्य वस्त्रों और आभूषणों की चमक धमक से सूर्य की करने भी लज्जित हो रहीं थी। जो भी उसे देखता वह उस के रूप सौंदर्य की एक झलक पाने के लिए तड़प उठता था क्योंकि वह हँबा नामक अप्सरा से भी अधिक सुंदर लग रही थी।
आई रथ नूं चलाया। चल गुरु रविदास धाम आई बतांदे ।
लोक देख विस्माद हो जाँदे। सभ गंगा जी नूं पुछ पूछान्दे।
गंगा गुरु रविदास जी के आश्रम में आ गई:---- सौंदर्य की देवी गंगा रथ पर सवार हो कर के गुरु रविदास जी के दिल्ली स्थित आश्रम में पहुंच गई, जिस के रूप सौंदर्य को देख कर के रास्ते में सभी कामी,क्रोधी, ढोंगी लोग घूर घूर कर देख रहे थे। गंगा सभी साधु, संतों, पंडों, पुजारियों और गंगा नदी के कपटी श्रधालुओं की परीक्षा लेती हुई आगे से आगे चलती ही जा रही थी मगर कुछ मनचले लोग उस के रूप सौंदर्य पर मोहित हो कर उस के ऊपर कई प्रकार की छींटाकसी कर रहे थे और उसे देख कर के कामातुर हो रहे थे। गंगा विषयी विकारी लोगों की परीक्षा लेती हुई आगे बढ़ती ही जा रही थी। धर्म के पुजारियों की दुर्दशा देखती देखती वह गुरु रविदास जी के पास पहुंचकर नमन करती हुई बैठ गई। उस ने आ कर गुरु जी को बताया, कि जो लोग गंगा नदी की पूजा करते हैं, उस के प्रति अथाह श्रद्धा रखते हैं, उन्हीं लोगों ने मेरी रास्ते में बड़ी बुरी दुर्दशा की है। वे मेरे ऊपर कई प्रकार के अंट संट कमेंट करते रहे। सभी पूछ रहे थे कि जो लोगों से गन्दे चमड़े का काम करवाते हैं, क्या तूं उस के पास जा रही है?
मलिन किरिआ ते जिस घर आंदे। वोह चमड़े दा करम करांदे।
गुरु रविदास तो मलिन कार्य करवाते:---- गंगा गुरु जी को बताती है कि भेड़ की खाल में छुपे भेड़िए मुझ से पूछ रहे थे कि जो लोग मलिन काम करते हैं, वे तो उन के घरों में भी जाते हैं। वे तो उन से चमड़े का काम भी करवाते हैं, फिर तूं उन के घर क्यों जा रही है?
अगे गंगा उतर सुनाए। मलिन किरिआ तिस को बातांदे।
जेहड़ा गुरु रविदास। आया है, ईश्वर ऐह खास बताई ऐ।
होईआ रवि प्रगास छुआछूत। आघ अंधेरे उड़ाई ऐ।
गंगा का पथ भ्रष्टों को उतर:----- मनुवादियों की बेहुदा बातों को सुन कर गंगा ने उन को उतर देते हुए कहा, " हे मूर्खों! जिन को आप मलिन क्रिया कराने वाले कहते हो, वे तो विशेष, खास महापुरुषों का भी बाप गुरु रविदास है। वे विशिष्ट अवतार बन कर धरती पर आए हुए हैं। वे तो आप जैसे मूर्खों को सन्मार्ग पर डालने के लिए ही धरती पर आए हुए हैं। वे तो धरती पर सूर्य की तरह प्रकाश कर के ब्राह्मणों की अज्ञानता का अंधेरा मिटाने के लिए आए हुए हैं। वे आप जैसे मनुवादी लोगों द्वारा फैलाई तुच्छ छुआछूत, ऊंच नीचता को खत्म करने के लिए ही भारत में आए हुए हैं। उन के केवल दर्शन मात्र से ही धरती पर रह रहे पापियों के पाप समाप्त हो रहे हैं"।
कुंवारी कन्या गंगा ने, तिलकधारी पुजारियों की काली करतूतों को गुरु रविदास जी महाराज को बताया कि हे महाराज! जो जो पाखण्डी ब्राह्मण पंडे, पुजारी बड़ी श्रधा से नदी में *गंगा स्नान* करने के लिए जाते हैं, उन की आज पोल खुल गई है, आप ने गंगा स्नान का ढोंग नहीं किया, पाखण्ड नहीं किया, कोई अडंबर नहीं किया, सो आप सचमुच ही अवतार हैं, मैं तो यों ही दुखी हो रही थी कि आप कुंभ मेले में स्नान करने नहीं आए।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष,
विश्व आदि धर्म मंडल, हिमाचल प्रदेश।
Comments
Post a Comment