36 भाग।। चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास।।
36 भाग।। चँवर वंश के देवतुल्य सम्राट गुरु रविदास।
लाखों साधु, संत, ब्राह्मण, पंडे, पुजारी और तिलकधारी, कुंभ स्नान करने के लिए जाते हैं मगर कुछ अत्यन्त प्रकांड पंडितों का स्नान तो शाही स्नान होता हैं। ये शाही स्नान करने वाले सभी सवर्ण महात्मा लोग कुंभ स्नान से इतने पावन, पवित्र हो जाते हैं कि इन को छुआछूत की बिमारी इतनी बढ़ जाती है कि, ये लोग मानव को मानव ना समझ कर अछूतों को दर्यौगल (कौंच) समझते हैं, जिन के छूने मात्र से सारे शरीर मे खारिश शुरू हो जाती है। ये पाखण्डी लोग कुंभ में नहाने को शाही स्नान बताते हैं, ताकि आम साधारण जनता से हट कर अपने आप को श्रेष्ठ और उच्च स्तर के महात्मा सिद्ध कर सकें। गुरु रविदास जी महाराज ने, इन्हीं ढोंगियों, पाखण्डियों, अडंबरियों के ज्ञान का जनाजा निकालने के लिए खुद ही कुंभ स्नान ना करने का निर्णय ले लिया और वे महाकुंभ मेले में नहीं गए, जिस के बारे में स्वामी ईशर दास जी महाराज गुरु आदि प्रगास ग्रंथ में फरमाते हैं कि---
गुरुआं दे चरण बिना गंगा पवित्र ना होई।
ज्यों कंचन जंगाल लग जावे जी।
सुहागा तिस को पवित्र करावे जी।
तन पट भावें एंचल लग जावे जी।
गंगा गुरु रविदास जी के स्नान के बिना पवित्र नहीं हुई:---- जब गुरु रविदास जी महाराज गंगा नदी पर कुंभ का स्नान करने नहीं गए तो वहाँ उपस्थित पुजारिन गंगा नामक कन्या परेशांन हो गई, कि वे कुंभ मेले में स्नान करने नहीं आए। वह समझ गई कि इस बार गुरु रविदास जी महाराज के चरण कमलों ने दूषित नदी को स्पर्श नहीं किया, जिस के कारण गंगा नदी का पानी पवित्र नहीं हुआ। जिस प्रकार सोने को भी जंग लग जाता है, तो सोने को चमकीला, भड़कीला बनाने के लिए, सुनार सोने को सुहागे से साफ करते हैं। इसी प्रकार यदि सतगुरुओं के चरण स्पर्श ना हों तो नदियों का पानी भी सोने की तरह ही अपवित्र रहता है। कलुषित और मैले कुचैले चोले को स्वच्छ बनाने के ढंग के बारे में स्वामी ईशर दास जी महाराज बताते हैं कि----
कुत्सित एंचल नूं लग जावे।
मैला चोला धोबिआं दे हर आवे जी।
उस सावन पुनीत बनावे जी।
कलुषित चोला धोबी साफ करते:---- ये शाश्वत सत्य है, कि जब कपड़ों को कीचड़ के छींटे लग जाते हैं, गन्दगी लगने से दुर्गन्ध लग आती है अर्थात कपड़े मैले कुचैले और गन्दे हो जाते हैं तो लोग अपने कपड़ों को किसी अति जानकार, कारीगर धोबी के पास साफ करने के लिए देते हैं, ताकि वह गन्दे मंदे कपड़ों में लगे दागों को मिटा कर, गन्दगी को धो कर साफ सुथरे बना कर मालिक को देदे। इसी तरह सतपुरुष धोबी भी कलुषित मनुष्यों के शरीरों को साफ करने के लिए, अपने ज्ञान रूपी साबुन से अज्ञानियों की मूर्खता को हर कर एक अच्छा मानव बना देते हैं। सतपुरुष ने ही वाल्मीकि को भी सन्मार्ग बता कर, बुरे कर्मों को छोड़ने का मार्ग बता कर एक आदर्श मानव बना दिया गया था।
पवित्र चरना से जल। ऐ प्रसिद्ध गल जगत कहोई।
गंगा चली मिलन गुरु रविदास। पूरी गंगा दी ना आस।
पवित्र चरणों के बारे में कहावत:----- स्वामी ईशर दास जी महाराज फरमाते हैं कि पवित्र चरणों से जो जल स्पर्श कर जाता है, वह पानी भी पवित्र हो जाता है। पुजारी कन्या गंगा ने अनुभव किया कि, पवित्र चरण तो केवल गुरु रविदास जी महाराज के ही थे, जिन के चरण तो नदी में पड़े ही नहीं, इसीलिए नदी का जल ना तो स्वच्छ ही हुआ और ना ही पवित्र हुआ।
इस कथन से सपष्ट होता है कि, उस समय गुरु रविदास महाराज से बढ़ कर कोई भी पंडा, पुजारी और तिलकधारी ना तो परिपूर्ण गुरु ही था और ना किसी की अंतरात्मा पावन और पवित्र थी। सारे तिलकधारी ढोंगी थे और अडंबरों को ही रचने वाले थे। जब गुरु रविदास जी महाराज नदी स्नान करने नहीं आए तो व्यथित गंगा खुद ही गुरु जी को मिलने चल पड़ी ताकि उस की दर्शन करने की अधूरी इच्छा पूरी हो सके।
जामा गुरां दे मैं पास। कुंभ पख पंद्रह दा नांगोई।।
पुजारी कन्या की गुरु के पास जाने की तैयारी:---- जब कुंभ मेले को हुए पंद्रह दिन हो गए अर्थात एक पूरा पखबाड़ा ही बीत गया, तब गुरु दर्शन और नदी के अपवित्र पानी को गुरु जी के चरणों से छू कर पवित्र गंगा जल बनाने के लिए पुजारिन "गंगा" गुरु रविदास जी महाराज के साथ मिलने के लिए खुद ही चल पड़ी।
ब्राह्मणों ने अमनोवैज्ञानिक, कुतर्क पूर्ण कथा लिख कर अपने स्वार्थ को सिद्ध करने के लिए लिखा हुआ है, "कि गंगा नामक देवी नदी के बीच रहती थी और उस ने गुरु रविदास जी महाराज की दो मन पक्के की पाषाण सिला तैराई थी"। भला कौन ऐसी स्त्री ही सकती है, जो पानी में रह सकती है? अगर उस समय ऐसी देवी होती तो आज भी होती मगर आज केवल छ: सौ सालों में ही वह लुप्त लगती है। कोई पुजारी या पुजारिन नदी के किनारे कुटिया बना कर तो रह सकता है या रह सकती है, मगर नदी के पानी में कोई नहीं रह सकता, इसीलिए भारत के शूद्रों और मूलनिवासी सेवकों को ब्राह्मणों की कल्पित कथाओं पर विश्वास नहीं करना चाहिए और अपने तर्क और दिमाग से काम लेना चाहिए।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष,
विश्व आदि धर्म मंडल, हिमाचल प्रदेश।
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