चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास।। भाग।।

चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास ।।24।।बालक रविदास जी महाराज को जब डराने धमकाने और मारने के सारे प्रयास असफल हो गए तब हार मान कर के सभी तीनों वर्णों के लोग उनके चरण कमलों के ऊपर गिर गए और माफी मांग कर अपने प्राण बचाए। गुरु आदि प्रगास ग्रंथ के रचयिता स्वामी ईशर दास जी महाराज फरमाते हैं कि----- ।। शब्द।। माफी लै लई बाहमना सेवक गुर के होई। गुर दिखिया लैबन गुरां ते अमृत कुंन पलोई। मंदिर बनिया गंगा किनारे। नाम तेरो आरती करावण। गुर सिंघासन सैंझी दा सेवक सीस नवामण। सतगुर गए सेवकां आरती कराई। सीस नवाया सिंघासन गुर का पंडिआं ईरखा खाई। पराजित ब्राह्मणों द्वारा आत्म समर्पण :---बालक रविदास जी महाराज की अपरंपार शक्ति को देख कर के सभी पगलाए कातिलों ने उन के चरणों के ऊपर नारियल और रुपए चढ़ाए। सभी तिलकधारियों, मनुवादियों ने माफी मांग कर गुरु दीक्षा की फरियाद की। बालक रविदास ने सभी को अपने शिष्य बना कर सुधरने का मौका देते हुए माफ कर दिया। सभी को कुंड में अमृत जल तैयार कर के अमृत पिला कर पवित्र कर के गुरु दीक्षा देकर उपकृत किया। गंगा तट पर गुरु का मंदिर बनवाया गया:--- सैंझीं नामक गाँव के सेवक ने बालक रविदास के सामने शीश झुका कर अपने साथियों सहित *नाम तेरो आरती मजन मुरारे हर के नामु बिना झूठे सगल पसारे* आरती गाई। इसी स्थान पर उन के शिष्यों ने गुरु जी का भव्य मंदिर बनवाया जो आज भी उन के इतिहास का द्योतक है। गढ़ा घाट की घटना पहली सफलता:---- आठ वर्ष की आयु में बालक रविदास जी को कड़ी परीक्षा में झोंक कर ढोंगी ब्राह्मणों ने अपने आप को अपमानित करवा लिया। भले ही मनुवादी ब्राह्मणों ने बालक के लिए मुशीबतें खड़ी की मगर उन्होंने चँवर वंश की अध्यात्मिक, अलौकिक शक्तियों का आभास अवश्य ही कर लिया है। बालक रविदास की प्रथम सफलता:--- गढ़ाघाट की घटना ने सारे मनुवाद की चूलें हिला कर रख दी थी, गुरु रविदास जी की अपरम्पार शक्ति से मनुवाद थर थर कांपने लग पड़ा था मगर कुछ शरारती तत्व अपनी फितरत छोड़ नहीं पा रहे थे, जिस के कारण बालक रविदास जी को बड़े हो कर तो असंख्य परीक्षाओं से गुजरना पड़ा मगर गुरु रविदास जी ने एक निडर, निर्भीक क्रांतिकारी योद्धा की तरह सभी चुनौतियों को सहर्ष स्वीकार कर के ढोंगियों, पाखण्डियों के ज्ञान की पोल खोल कर रख दी थी। अजेय, चक्रवर्ती सम्राट गुरु रविदास:--- गुरु रविदास महाराज के समक्ष असंख्य कायर, धर्म भीरु जातिवादी ब्राह्मणों, राजाओं, महाराजाओं, बादशाहों को पराजित कर के उन के राजनीतिक सामाजिक, धार्मिक अडंबरों का पर्दाफ़ास कर के, उन के थोथे ज्ञान का उपहास उड़ा कर भारतीयों को उन की लूट से मुक्त कर दिया था। गुरु जी के चरण कमलों पर गिरने वाले बाबन शासकों ने गुरु रविदास जी महाराज जी को अपना गुरु स्वीकार किया था जिस के कारण ही उन को चक्रवर्ति सम्राट की उपाधि प्राप्त हुई है। जातिवादी ब्राह्मणों ने ईर्षा नहीं त्यागी:---- गुरु रविदास जी महाराज के चरणों कमलों पर गिर कर गुरू दीक्षा लेने के बाद भी तिलकधारी ब्राह्मणों ने अपनी जलन, ईर्षा और द्वैष् को नहीं छोड़ा और गुरु जी का अपमान करते ही रहे और अब भी बाज नहीं आ रहे। रामसिंह आदवंशी। अध्यक्ष, विश्व आदधर्म मण्डल, हिमाचल प्रदेश।

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