चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास।। भाग 27।।
चँवरवंश के देवतुल्य सम्राट गुरु रविदास ।।भाग27।।
जब पंचायत में बैठे हुए कुछ बुद्धिजीवी ब्राह्मणों ने सुझाव दिया कि राजा के पास शिकायत पत्र लिख कर दो, जिस में बताया जाए कि बालक रविदास ब्राह्मणों के व्यवसाय को छीनने की अनाधिकार चेष्टा कर के धोती, तिलक लगा कर शंख, घण्टे और घड़ियाल बजाता है। राजा खुद ही उसे रोकने का फरमान जारी कर देगा। कुछ लोगों ने उन के सुझावों को स्वीकार कर के ऐसा करने के लिए गुरु रविदास जी के ऊपर कई इल्जाम लगा कर के पर्चा लिख कर राजा को देदिया। जिस के बारे में स्वामी ईशरदास जी महाराज ने, ब्राह्मणों के बारे में अपने शब्दों में फरमाया है, कि----
।।शलोक।।
दीर्घ आदमी भेज के रविदास लिआ मंगाई।
लखां सेवक घर बाहर दे सारे मगरों आई।
जब ब्राह्मणों ने राजा के दरबार में पर्चा दाखिल कर दिया, तब राजा ने भी डर कर तत्काल ही अपना बड़ा आदमी भेजा और बालक रविदास को अपने दरबार में बुला लिया। बालक रविदास तुरंत तैयार हो कर के राजा के दरबार की ओर चल पड़ा। राजा के वारंट का समाचार चारों तरफ फैल गया। बालक रविदास के प्रति सवर्ण लोगों में भी सम्मान बढ़ चुका था, इसलिए चारों ओर आग लग गई कि ऐसा क्यों किया गया? गुस्साए लोग स्वामी ईशर दास जी महाराज के शब्दों में कहने लगे-----
कहन लगे मराँगे रविदास नाल सभनी प्रण कराआ।
की कुझ बिगड़आ आसां कोलों झूठा दावा बनाआ।
जब बालक रविदास जी अकेले ही राज दरबार में चले गए, तब गाँववासियों ने भी यह प्रण कर लिया, कि यदि बालक रविदास के साथ कोई अनहोनी घटना घटी तो फिर हम भी प्राण त्याग देंगे मगर इन को कोई आंच आने नहीं देंगे। राजा को विवश कर देंगे कि वह बालक रविदास के साथ किसी प्रकार का कोई अन्याय, अनाचार और अत्याचार ना करे क्योंकि बालक रविदास ने किसी का कुछ भी नहीं बिगाड़ा है और जो कुछ तिलकधारियों ने पर्चे में लिखा है, वह सरासर झूठ है, और झूठा ही केस बनाया गया है। अभी लोग घर में तैयार ही हो रहे थे कि बालक रविदास राजा के दरबार में पहुंच गया। बालक रविदास के रंग, स्वरूप और तेज को देख कर के राजा हैरान हो गया, जिस दृष्य का वर्णन स्वामी ईशरदास जी महाराज ने अपने पवित्र *ग्रंथ गुरु आदि प्रगाश* में किया है-----
।। शब्द।।
जदों देखिआ राजे ने रूप गुरां दा, देख के तां दंग हो गिआ।
एह तां रब दा सरूप बाण आया दीवा देख पतंग हो गिआ। राजा नागर मल ऐंऊँ मस्ताना हो पी भंग मलंग हो गिआ। अज देखाँगे कौतुक अजब दा देखने दा ढंग हो गिआ। चेता आ गया राजे परताप दा प्रसंग हो गिया। वलोँ बाह्मना बड़ी दलगीरी होई सी, गुरां वालों खुशी जित जंग हो गिआ।
बालक रविदास का अद्वितीय स्वरूप:---राजा नागरमल, बालक रविदास के मुख मंडल की आभा को देख कर ऐसा मस्त हो गया मानो उस ने भांग पी ली हो और उस के नशे में मलंग बन गया हो। राजा सोच रहा था, कि आज हैरान कर देने वाला तमाशा देखेंगे। उन्हें राजा प्रताप की दुर्दशा की याद आ गई, जब उन्होंने उस को भी जीत लिया था, आज फिर ब्राह्मणों ने वही घटना दोहरा दी है, जिस में फिर बालक रविदास की फतेह ही होगी।
।।शब्द।।
बुधे राजा ने नेत्र कर के लाल। सताया किऊँ तूं बाहमना करे रविदास वल कर खिआल। कहे रविदास सुनो भूप जी असिं ना कोई सताया। दुख देवन दा असूल ना साडा कोई ना जुलम कराया।जा कहे रविदास जो तुम दुख ना दिया। मत मारी गई ब्राह्मण दावा क्यों कराया। क्यों दरखास्त बीच लिखदे उतले पासियों गंगा नहाउँदा जाई। पानी छोहदियां लग लग के सानू भृष्ट कराए। राजे कहे उपदेश पूजा एह ना तुझे अधिकार। करम बाह्मन दे क्यों करें जाति होई चमियार। सतगुरु अखन राजा नूं सुन साची बात। सत्पुरुष के जीव सभी नूं पूजा वन आत। मंत्री कहे सुनो भूप जी! दौउ परीक्षा हो जाऊ। जो हारे नयाँ आप ही हो जाऊ।
राजा नागरमल द्वारा फरमान:---- राजा नागरमल ने बालक रविदास को प्रश्न करते हुए कहा, आप ने ब्राह्मणों को क्यों सता रखा है? बालक रविदास ने राजा को उतर देते हुए कहा महाराज हमारा किसी को दुख देने का कोई उसूल नहीं है। हम ने किसी को तनिक भी नहीं सताया है। यह तो झूठा आरोप लगाया गया है।
राजा नागरमल द्वारा जिरहा:---जब बालक रविदास ने, राजा को जवाब दिया, तब राजा कहता है, तो फिर क्या ब्राह्मणों की मत मारी गई है अर्थात बुद्धि भ्रष्ट हो गई है? कि वे झूठे आरोप लगा कर के आप के ऊपर दावा कर दें। वे आरोप पत्र में लिखते हैं, कि आप उन से ऊपर जा कर के गंगा स्नान करते हैं और वह पानी ब्राह्मणों की तरफ आता है। ब्राह्मणों ने लिखा है, कि जो पानी ऊपर से आता है, वह स्पर्श कर के ब्राह्मणों को अपवित्र कर देता है, फिर पूजा पाठ करना और उपदेश करना भी आप का अधिकार नहीं है। कोई चमार हो कर ब्राह्मणों का काम क्यों करें?
बालक रविदास का राजा को जवाब:----- बालक रविदास ने राजा नागरमल को तर्कसंगत जवाब देते हुए फरमाया, कि हे राजा! सच्ची बात सुन, सभी जीव आद पुरुष के जीव हैं, यह भी शाश्वत सत्य है, कि सभी जीवों को जीने का अधिकार है और सभी को ही पूजा पाठ करने का भी अधिकार है। कोई किसी का गुलाम नहीं है। कोई किसी के अधीन नहीं है। कोई किसी को पूजा पाठ करने से नहीं रोक सकता है, इसलिए ये निराधार और झूठ की दहलीज के ऊपर बैठ कर लिखे गए झूठे आरोप हैं।
मंत्री का सुझाव:----- राजा नागर मल के एक मंत्री ने सुझाव दिया, महाराज! दोनो ही पक्षों के ज्ञान की परीक्षा करवाई जाए जिस में जो हार जायेगा, उस से इंसाफ हो जायेगा, जिस के लिए दोनो पक्ष अपने अपने देवताओं को ला कर गंगा नदी में तैराएं। सभी ने मंत्री की बात मान ली। ब्राह्मणों की कथानुसार बालक रविदास जी की पत्थर की अपवित्र शिला तैर गई और ब्राह्मणों के पत्थरू डूब गए। इस प्रकार बालक रविदास जी की जीत बताई गई है, जो तर्क संगत नहीं है जब कि वे ज्ञान चर्चा में हारे थे।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष,
विश्व आदि धर्म मंडल।
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