35भाग।।चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास।।

35 भाग।। चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास जी। गंगा कन्या का नाम था:---- गंगा किसी नदी का नाम नहीं था अपितु गंगा और गोदावरी दो सगी बहने थी, जो अत्यंत सुंदर और मासूम लड़कियां थी, जिन्होंने बिलासी राजा की इच्छा अनुसार आत्मसमर्पण नहीं किया था और शहीद हो गई थी, उन्हीं दोनों लड़कियों के नाम से एक नदी का नाम गंगा रखा गया था और दूसरी का गोदावरी नदी। दोनों ही लड़कियों की पवित्र आत्माएं गंगा और गोदावरी नदियों के आसपास घूमती फिरती हैं इसीलिए उन की आत्मा की शांति के लिए ही उन के मंदिर बनाए गए हैं, जिस सत्य को दफन कर दिया गया है। पांच हजार साल पूर्व सम्राट शिव ने भी इसी नदी के पानी को अपने राज्य के सभी खेतों में पहुंचाया था, मगर ब्राह्मणों ने एक और सत्य को छुपाने के लिए बेतुकी कथा घड़ी हुई है, कि शिव की जटाओं से गंगा निकली हुई है, जो तर्क संगत नहीं लगती। गंगा, गोदाबरी गुरु रविदास जी की अध्यात्मिक शक्तियों को जानती थी:----गुरु रविदास जी महाराज की दिव्य, अध्यात्मिक शक्तियों को गंगा और गोदाबरी दोनों कन्याएं जानती थी और गुरु जी के सानिध्य में बैठ कर के वे सत्संग सुना करती थी, इसीलिए एक बार कुंभ मेले में जा कर जब गुरु रविदास जी महाराज ने ब्राह्मणों के थोथे ज्ञान की परीक्षा लेने के लिए गंगा नदी में स्नान करने का निर्णय नहीं लिया और वे गंगा नदी के किनारे होने वाले कुंभ मेले में शामिल नहीं हुए तो इस घटना का वर्णन करते हुए, स्वामी ईश्वर दास जी महाराज पवित्र *गुरु आदि प्रकाश ग्रंथ* में लिखते हुए फरमाते हैं, कि दुवै दस बरस बाद है, गंगा कुंभ जो आई। संत भगत ऋषि लोक जन संग्रहि हो जाई। बारह वर्ष बाद कुंभ मेला:--- कहा जाता है कि, हर बारह वर्ष के बाद गंगा नदी का पानी बहना बंद हो जाता है, जिसे कुंभ का नाम दिया गया है, एक बार जब बारह वर्ष के बाद कुंभ का मेला आया तो उस में असंख्य मैले मन और आत्मा वाले लोग, साधु, संत, भगत, ऋषि गंगा स्नान के लिए इकट्ठे हुए। सभी ने गंगा नदी के पानी से स्नान कर के अपने अपने शरीरों को धोया और मन में अनुभव किया कि हमारे पाप कर्म खत्म हो गए। परंतु मानसिक और आत्मिक रूप से मैले, कुचैले लोगों के गंगा स्नान के पाखंड को नंगा करने के लिए गुरु रविदास जी महाराज कुंभ के मेले में नहीं गए, जिस का वर्णन करते हुए स्वामी ईशर दास जी महाराज *गुरु आदि प्रगास ग्रंथ* में लिखते हुए फरमाते हैं, कि----- मंजन करे कोई दान करें, भूप रंक अपार। कोई बैठा लाई समाधि बिन मुख सोहं सार। संपन्न और अंध विश्वासी लोगों के आडंबर:----हराम की कमाई इकठ्ठी करने वाले असंख्य संपन्न, ढोंगी, आडंबरबाज, अंधविश्वासी राजे, महाराजे, अमीर, गरीब अपने पाप कर्मों की सफाई करने के लिए गंगा स्नान करने के लिए, कुंभ मेले में आए और साधु-संतों, पंडों, पुजारियों और तिलकधारियों को दान कर रहे थे, जिन में से कईयों ने नदी किनारे पर हरि दर्शन के लिए गहरी समाधि लगाई हुई थी और कोई होंठ, जीभा, मुँह हिलाए बिना ही *सोहम सोहम* जाप कर रहे थे और सोहम के गूढ़ अर्थ और रहस्य को समझने का प्रयास कर रहे थे। कुंभ भिओ जगत गिऊ गुरु रविदास ना आई। गुरु रविदास जी का कुंभ मेले में ना आना:---कुंभ मेले में लाखों अंध विश्वासी लोगों ने स्नान किया, मेले का भरपूर आनंद लिया और मन की इच्छाओं को पूरी कर के वापस चले गए मगर दिव्य शक्ति संपन्न गुरु रविदास जी महाराज कुंभ मेले में जानबूझ कर ही नहीं आए ताकि ब्राह्मणबाद को नग्न किया जा सके। गंगा भनै हँऊँ पवित्र ना होई संत चरण बिन नाई। साध्वी गंगा का चिंतन:--- नदी के तट पर बैठी गंगा कई दिनों तक सोचती रही कि इस बार गुरु रविदास जी महाराज कुम्भ मेले में नहीं आए। अपने चिंतन में साध्वी कन्या विचार कर रही थी, कि गुरु जी ने अपने चरण कमलों के स्पर्श से नदी को पवित्र क्यों नहीं किया? जब गुरु जी इस ऐतिहासिक मेले में शामिल नहीं हुए तो गंगा कहने लगी, कि इस बार मेरा जीवन भी सफल नहीं हुआ है और संतों में शिरोमणि संत गुरु रविदास महाराज के चरण गंगा में नहीं पड़े हैं, जिस के कारण में परेशान हूं। गुरु रविदास जी कुम्भ मेले में क्यों नहीं गए:--- गुरु रविदास जी जानते थे कि, जो लोग गरीबों की हक हलाल की कमाई खा कर धोती, तिलक लगा कर शंख बजाते हैं और फिर गंगा स्नान कर के पवित्र होते हैं, अमीरों की हराम की कमाई से गुल छर्रे उड़ाते हैं, फिर उन की दान दक्षिणा से पेट भरने वाले साधु, संतों के ज्ञान की परीक्षा क्यों ना ली जाए? इसी कारण गुरु रविदास जी महाराज कुम्भ मेले में नहीं गए। रामसिंह आदवंशी। अध्यक्ष, विश्व आदि धर्म मंडल, हिमाचल प्रदेश।

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