29भाग।। चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास।।

चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास।। भाग 29 ।। गुरु रविदास की महाक्रांति की सफलता:---गुरु रविदास जी महाराज ने, जब सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक क्रांतियों को सारे देश में फैला कर के ब्राह्मणों, तिलकधारियों, पंडों, पुजारियों के ऊपर फतेह प्राप्त कर ली और राजाओं को भी तर्क के आधार पर समझा कर जो ब्राह्मणों को हरा कर ऐतिहासिक जीत हासिल की थी, उस के ही परिणाम स्वरूप राजा नागरमल ने गुरु रविदास जी महाराज की इच्छा और निर्देश के अनुसार मानवीय आधार पर अपने कानूनों में संशोधन कर के अछूतों, वंचितों, गरीबों, भूमिहीनों को न्याय देना शुरू कर दिया, जिस के बारे में स्वामी ईश्वर दास जी महाराज अपने पवित्र ग्रंथ गुरु आदि प्रकाश ग्रंथ में फरमाते हैं कि----- ।।शलोक।। राजा नागर ने एह कड़ा कानून बणाया। खुह बौली मंदर लंगर सभ दा हक रखाया। राजा नागर मल ने कानून बदल डाले:---चँवर वंश के अकेले वीर सपूत गुरु रविदास महाराज ने शूद्रों को सामाजिक न्याय दिलाने के लिए जो महाक्रांति का शुभारम्भ किया था, उस के अनुसार भारत के मूलनिवासियों के लिए राजा नागरमल ने ही कड़े और न्यायमूलक कानून बना दिए थे, जिन के अनुसार उन्होंने ही शोषित मूलनिवासियों के लिए मौलिक अधिकारों की व्यवस्था कर के हर क्षेत्र में आरक्षण लागू करवा दिया था। उन्होंने सभी जातियों के लिए एक ही कुएँ से पानी भरने का आदेश कर दिया था, मंदिरों में लगने वाले लंगरों में भी सभी को एक साथ बैठ कर खाना खिलाने का फरमान जारी कर के छुआछूत को मिटा दिया था मगर वर्तमान सरकारों ने उन के कानूनों को शूद्रों से वोट लेने के लिए नाम मात्र का ही लागू किया हुआ है। संविधान में भले ही समानता का अधिकार दिया गया है, छुआछूत का अंत कर दिया गया है, सभी को नौकरियों में आरक्षण दिया गया है मगर यह केवल कागजों तक ही सीमित रखा गया है, धरातल के ऊपर मनुवादी सरकारों ने यह बंद कर रखा है और वर्तमान नरेंद्र मोदी और उस की सरकार ने तो सारे कानून खत्म कर के, रोज रोटी से वंचित करने के लिए निजीकरण कर के केवल मनुवादियों के लिए और दस प्रतिशत आरक्षण लागू कर दिया है ताकि अपने सारे सवर्ण बोटों को इकठ्ठे कर के मनुवादी राज कायम रख सके। सुनो क्षत्रिउ खतरिउ बाहमनो कर लवो हुणे पुकार। पानी लंगर इक सम होसी खुआ बाहमन चमियार। नागरमल का फरमान:---जातीय भेदभाव खत्म करने के लिए राजा नागरमल ने सभी मनुवादी ब्राह्मणों, राजपूतों और वैश्यों को आदेश दिया, कि आप सभी कान खोल कर सुन लो! सभी जातियों के लिए एक ही लंगर लगेगा, चाहे ब्राह्मण हो या चमार सभी एक ही पंक्ति में बैठ कर के खाएंगे और पीएंगे। गुरु रविदास नूं मंनन वाला चाहे होवे कोई। घिरना करू जो तउ जुर्माना कैद दोउ होई। घृणा करने वालों को जुर्माना और जेल:---- महाराजा नागर मल ने अपने फरमान जारी कर के जनता को बता दिया कि गुरु रविदास जी को मानने वाले चाहे कोई भी हो किसी भी जाति के हो, किसी भी धर्म के हो, यदि कोई उन से घृणा करेगा, उन का अपमान करेगा तो उसको जुर्माना भी होगा और जेल भी होगी। सबना ने मंजूर किआ जो कुझ भूप ने अलाया। चौदह सौ पचहतर बिकरमी ऐह कानून बनाया। राजा का फारमान मंजूर हुआ:---- जब राजा नागरमल ने अपने राज्य में आदेश जारी कर दिया, कि छुआछूत, ऊंच नीच आदि भेदभाव करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करते हुए जेल में डाल दिया जाएगा और जेल की सजा के साथ जुर्माना भी देना पड़ेगा, तब लोगों ने राजा के कानून को स्वीकार कर लिया। यह कानून विक्रमी संवत 1475 ईस्वी में लागू किया गया था, जो आज तक चलता आ रहा है मगर कुछ गुरु रविदास जी महाराज के विरोधी और गद्दार इस सच्चाई को अनदेखा कर के यह प्रचार करते रहे आ रहे हैं कि आरक्षण 1947 के बाद जब संविधान लिखा गया था, तब लागू किया गया है मगर यह प्रचार बिल्कुल निराधार और झूठ का पुलिन्दा है, आरक्षण गुरु रविदास जी महाराज के समय से चला था और साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवालिया ने अंग्रेजों से अधूरे आरक्षण को पूरा करने के लिए 1936 के असेंबली चुनाव में राजनीति में भी लागू करवा दिया था, जिस के कारण ही गुलामी के समय सभी राज्यों में अनेकों विधायक जीते थे। दो हजार चौदह बिकर्मी अब तक चालू होईआ। ईशरदास उस अला किऊँ ना कानून बरतोईआ। वर्तमान में पूर्णतय: कानून लागू क्यों नहीं:---- स्वामी ईशर दास जी महाराज गुरु आदि प्रकाश ग्रंथ में फरमाते हैं, कि आज विक्रमी संवत 2014 शुरू हो गया है मगर बड़े अफसोस की बात है कि वर्तमान मनुवादी सरकारों ने संविधान में वर्णित आरक्षण के कानून को पूर्णतय: लागू नहीं किया है! केवल मात्र आरक्षण संविधान में लिखा ही गया है मगर भारत के पचासी प्रतिशत मूलनिवासी शूद्रों, अछूतों, गिरीजनों, निर्धनों के साथ अन्याय करते हुए, इस कानून को लागू क्यों नहीं किया है? गुरु रविदास जी महाराज ने कोई संगठन बना कर, कोई पूजा पाठ, भक्ति कर के अधिकार नहीं लिए थे अपितु जान हथेली पर ले कर, क्रांतिकारी आंदोलन कर के जो सफलता प्राप्त कर के उस समय पचासी प्रतिशत मूलनिवासी जनता को समानता का अधिकार लिया था, जब शूद्र गुलामों के गुलाम मनुवादी शासकों की दोहरी गुलामी का शिकार थे मगर आज आरक्षण से जीत कर बनने वाले विधायकों, सांसदों और मंत्रियों ने ही मनुवादियों के दल्ले और दलाल बन कर आरक्षण तो खत्म करवा ही दिया, अपना भी मान सम्मान खो दिया। अभी अभी आठ दिसम्बर बीस सौ बाईस को संपन्न हुए हिमाचल प्रदेश के विधान सभा चुनाव में जीतने के बाद बने मुख्यमन्त्री सुखविंदर ठाकुर ने अपनी ही कांग्रेस पार्टी के विधायक सुरेश के हाथ से लड्डू ना खा कर, विधायक का तो सरेआम अपमान किया है ही मगर उस समाज का भी अपमान किया गया, जिस का वह प्रतिनिधित्व करता है। ये भारत के संविधान की काली करतूत है, यदि गुरु रविदास जी महाराज के समय ऐसा होता तो राजा नागरमल ऐसा करने वाले मंत्री को भी अपने कड़े कानून के अनुसार दोहरा दण्ड देता। रामसिंह आदवंशी। अध्यक्ष, विश्व आदि धर्म मंडल, हिमाचल प्रदेश।

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