42 भाग।।चंवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास।।
42 भाग।। चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास।
लगभग सभी शक्तिशाली स्त्री, पुरुष अपनी शक्ति का दुरूपयोग करते आए हैं, कहा भी गया है कि *power makes man corrupt * जितने भी शासक हुए उन के किस्से विलासिता के कारनामों से भरे पड़े हैं जब कि इन लोगों में अध्यात्मिक गुण नहीं होते हैं, ये बल के सहारे अपनी तानाशाही के चलते जो चाहें करते आए हैं, जिन अबगुणों के कारण राजा विजय पाल सिंह भी शिकार हो गया और चुगलखोर की मुखबरी को अंधाधुंध सत्य मान लिया और गुरु रविदास जी महाराज के पवित्र आश्रम पर सैन्य चढ़ाई कर दी, जिस के बारे में स्वामी ईश्वर दास जी महाराज गुरु आदि प्रकाश ग्रंथ के पृष्ठ संख्या ४६०-४६१पर लिखते हुए फरमाते हैं कि----
।। शब्द मलहार।।
*दे के अनाम तां खरीद लई मौत राजा ने*।
चुगलखोर की चुगली से राजा ने मृत्यु खरीद ली:---- स्वामी से दास जी महाराज फरमाते हैं, कि राजा विजय पाल सिंह ने चुगलखोर कबुद्धु को इनाम दे कर के अपनी मौत का सामान खरीद लिया। राजा यह नहीं जानता था कि गुरु रविदास जी महाराज के आश्रम में उस की मौत का सामान इकट्ठा हो गया है क्योंकि वह इतना बिलासी, कामी और क्रोधी था कि उस के राज्य में कोई भी सुंदरी सुरक्षित नहीं थी, जिस अत्याचार को खत्म करने के लिए ही आदिशक्ति कुंवारी कन्या गंगा और गुरु रविदास जी की जोड़ी ने राजा विजयपाल सिंह के अत्याचारों का अंत करने के लिए नाटक रचा हुआ था। ऐसे ही कुकर्मी, दुष्कर्मी और पाखण्डी ब्राह्मणों, तिलकधारियों के अडंबरों और पाखण्डों को उजागर करने के लिए गुरु जी ने यह खेल रचा था।
*करनी भरनी कुटुंभ साहिरद ते अहिलकार मंत्री करने फौत राजा ने*।
राजा की करनी का फल परिवार को भरना पड़ा:---- स्वामी ईश्वर दास जी महाराज फरमाते हैं, कि बिलासी, कामी, क्रोधी राजा विजयपाल सिंह यह नहीं जानता था, कि जो करनी मैं कर रहा हूं, जो बीज मैं बीज रहा हूँ, उस का फल मुझे भरना पड़ेगा। केवल मुझे ही नहीं अपितु मेरे सारे रिश्तेदारों और सगे-संबंधियों को भी भरना पड़ेगा।
राजा ये नहीं समझ रहा था कि मैं जो दुष्कर्म करने जा रहा हूँ, उस से मेरे अहिलकार, मंत्री और फौज भी मौत के घाट उतर जाएगी।
*गुराँ दा दरोहि संतां महंतां दा शत्रु जग बिच तौर लई कहौत राजा ने*।
संतों का दुश्मन राजा विजयपाल सिंह:---- सारे संसार के विलासी राजा लोग गुरुओं-पीरों के विरोधी और विद्रोही होते हैं। संतों-महंतों के ही नहीं अपितु सारी मानवता के दुश्मन होते हैं, इस कहावत को राजा विजय पाल सिंह नहीं जानता था। उस ने इस शास्वत सत्य को उजागर कर दिया। उस के चाल चलन और चरित्र से पूरी तरह ज्ञात हो रहा था कि ऐसे लोग अच्छे लोगों के दुश्मन होते हैं, जिस कहावत को राजा ने सत्य सिद्ध कर दिया
*काम दा मताहुआ करदा तिआरी किती ना मन नू समझौत् राजा ने*।
कामवासना का गुलाम राजा विजयपाल सिंह:--- चुगलखोर बुद्धू की झूठी चुगली सुन कर के कामवासना का गुलाम राजा विजयपाल सिंह अपनी मौत की तैयारी करने लग पड़ा। उस ने यह नहीं सोचा कि संतों के आश्रम में कोई साधारण सुंदरी नहीं रह सकती है। उस ने मन में यह भी नहीं सोचा कि वह स्त्री कौन है और ना ही उस ने इस सत्य को जानने की कोशिश की। राजा ने मन में यह समझने का प्रयास ही नहीं किया की सारी प्रजा मेरी संतान है, उस की देखभाल और रक्षा करना मेरा परम कर्म है और जो आश्रम में साधु-संत और देवियाँ रहती हैं, उन की रक्षा करना भी मेरा ही परम कर्तव्य है, इसलिए स्वामी ईशर दास जी महाराज फरमाते हैं, कि कामवासना का गुलाम राजा अपनी मृत्यु की तैयारी कर रहा था।
*मंदे दिन अनाऊंदे जदों किसे संदे सते सुधाँ भुल गिआ अठाउत् राजा ने*।
विनाश काल में बुद्धि का विनाश हो जाता है:---ज्ञानियों और बुद्धिमानो ने यह सत्य ही कहा है कि जब विनाश काल आता है, तो बुद्धि का नाश हो जाता है। वर्तमान में भी ये भी कहावत सत्य सिद्ध हो रही है। अभी अभी चाउ शेस्कू एक ऐसा ही तानाशाह हुआ हैं जो खुद और अपने परिवार की विलासिता के कारण, लोगों ने मौत के घाट उतार दिया था, ऐसे ही राजा विजयपाल सिंह इतिहास को दोहरा रहा था। स्वामी ईशर दास जी महाराज फरमाते हैं, कि जब किसी के बुरे दिन आते हैं, उस के पापों का घड़ा भर जाता है, तब उस की सातों बुधियां काम करना बंद कर देती हैं। उस पथभ्रष्ट की बुद्धि बुरे कर्मों की ओर ही लगी रखती है। यह शाश्वत सत्य विलासी राजा विजयपाल सिंह के ऊपर सत्य चरितार्थ हो रहा था। राजा कामवासना के अधीन हो कर के केवल सुंदरी के रूप, रंग और सौंदर्य पर मोहित हो कर के उसी के ख्वाबों में डूबा हुआ था।
वास्तव में गुरु रविदास जी महाराज भारत में व्याप्त छुआ-छूत, ऊंच-नीच, छल-कपट और शक्तिशाली अमीरों, राजाओं- रानियों, महाराजाओं-महाराणियों, बादशाहों-बेगमों, के बुरे कर्मों का फल देने के लिए ही धरती पर आए थे। स्वामी ईशर दास जी महाराज के फरमान से ज्ञात होता है, कि गंगा जैसी अनेकों कुंवारी कन्याएं और गुरु रविदास जी के समान सतपुरुष धरती के ऊपर आते रहते हैं जो मिल कर के अत्यारियों, पापियों का विनाश करते रहते हैं। इसी कारण गुरु रविदास जी महाराज और कुंवारी कन्या गंगा ने पापों से भरपूर विजय पाल सिंह को अपने कुकर्मों द्वारा ही मौत के घाट उतारा था।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष,
विश्व आदि धर्म मंडल, हिमाचल प्रदेश।
Comments
Post a Comment