चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास जी।। भाग20।।
चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास जी।।भाग 20।।
ब्राह्मणों की पंचायत इस लिए स्थगित हो गई थी कि जल्दी ही बालक रविदास जी की शादी हो रही थी, जिस से इन काफर लोगों ने अनुमान लगा लिया कि शायद विवाह के बाद बालक रविदास ब्राह्मणों के खिलाफ पाखण्ड मिटाओ आंदोलन समाप्त कर देगा और हमारा लूटपाट का अंधा धन्धा चलता रहेगा।
विवाह का वर्णन:---- गुरु आदि प्रगास ग्रंथ के रचयिता स्वामी ईशर दास जी महाराज ने, गुरु रविदास जी महाराज के विवाह का इतिहास और विवरण लिखते हुए फरमाया है कि------
।।शलोक।।
चौदह सौ पचिहतर विक्रमी संगरांद जेठ की आई। श्री गुरु रविदास की इस दिन होई सगाई। मिर्जापुर सुजाने की सुता सुभागण तिस का नाम। तिस संग शादीसुधा गुरु जी मह साठ शब्द पढ़ें आम। शब्द वाणी करदिया वेदाँ लईआं कराई। मुड़ कर मिर्जापुर ते कालू माजरे धाऐ। दइयारी संतोषी भानी वी घुरविनी मेलणा नाल। सुभागण खड़ी टोलिऊँ पढ़न शब्द ना कंडण गाल। कर अरदासा बंड मठिआई मेल गेल सब गिआ। लगी सलामी सतगुरु नूं ऊपर सखां रखियां। शुभागण गुर की आगिआ विच रैंहदी सी दिन-रात। पतिव्रत धर्म बिच पके मन बोले ना कड़वी बात। घर बिच कम कार दी सुची आए गए दी सेवादार। सभ नूं मिठी बोली बोले जो सुने कहन बलिहार। गुरु से नाम नूं लई के रोज समाधि लावण। बेगम पूरे शहर नूं छिन छिन आमण छिन जामण। जदों साहिब जी घर नहीं औण सेवक नाम जपावे। आप तरी और भी तारे सुभागण धन कहावे। संत दास ते संत कौर दो फल इस उदर होई। सो भी नाम जप जप के पवित्र पात्र दोई।
बालक रविदास की सगाई और विवाह:---- किसी भी पण्डित तिलकधारी ब्राह्मण के शुभ महूर्त निकाले बिना, गुरु रविदास जी महाराज की सगाई और शादी बिकर्मी सम्मत चौदह सौ पचहतर के ज्येष्ठ मास की साग्रांद को, गाँव मिर्जा पुर की सौभाग्यवती सुभागण देवी नामक सुकन्या के साथ बड़ी धूमधाम के साथ हुई थी।
सुसराल का वर्णन:---- मिर्जापुर गाँव को बड़े आलीशाँन ढंग से सजाया गया था। अत्यन्त शाही अंदाज में बारात का स्वागत और सत्कार किया गया था। बारात में बाबा कालू दास जी के श्रेष्ठ और उच्च घरानों के उद्योगपति, व्यापारी और अहलकार शामिल हुए थे। सारे मिर्जापुर में उत्सव का वातावरण था।
मिलनी का वृतान्त:--- दोनों समधियों की मिलनी का भी अलौकिक नजारा था। मिलनी के समय किसी भी पुरोहित, पण्डे साध और पुजारी द्वारा कोई भी मंत्रोच्चारण नहीं किया गया था। समस्त बारातियों ने मिलनी का शब्द *मेला मिलनी दा, मिलनी दा, मेल करो महाराज, मिलनी बाबे दी करो जी मिलनी बाबे दी करो, मिलनी मामे दी करो......* सारे बारातियों को सलामी देकर के सम्मानित किया गया और अनेकों प्रकार के स्वादिष्ट वयंजन परोसे गए।
बालक रविदास ने खुद अपना आनंद कार्ज पढ़ा:---- गुरु रविदास जी की शादी में किसी भी ब्राह्मण या पुरोहित, साध को नहीं बुलाया गया था और ना ही उन के अपवित्र मुँह से उन के विवाह का महूर्त निकाल कर मिलनी, लगन, वेद और लांबां पढ़ी गई। गुरु रविदास जी ने खुद अपने विवाह का आनंद कार्ज पढ़ा, जिस में साठ शब्द मिलनी, लगन और वेदों के गाए और पढ़े गए। सारे कार्य व्यवहारों के अंत में गुरु जी ने अपनी शादी की चार लांबैं भी खुद ही पढ़ी, जिन के साथ शादी की सभी रशमें पूरी की गई।
बालक रविदास के सम्मान में गालियाँ नहीं गाई गई:---- शुभ शादी में उपस्थित सभी औरतों ने गुरु रविदास के मान सम्मान में मंगलकारी गीत गाए। सभी सुहागणों ने समय समय के अनुसार बारात के आगमन, मिलनी, खाना खाने, वेदों और विदाई के मंगल गीत गाए मगर किसी ने भी बारातियों के सम्मान में हंसी ठिठोली करते हुए कोई भी व्यंग्यात्मिक सीठणी (गाली) नहीं गाई।
बालक रविदास को सलामी:---- जब बारात वापस चलने लगी तब गुरु जी की सास और अन्य सभी ताईयों, चाचियों, मामियों ने उन्हे भिन्न भिन्न प्रकार के वहुमूल्य वस्त्रों के ऊपर रुपए रख कर सलामियां लगा कर बारात को विदा किया।
सुभागण पतिव्रता:---- गुरु रविदास जी की अर्धांगनि सुभागण अत्यंत सुशीला, पतिव्रत और आज्ञाकारी स्त्री थी। कभी भी किसी को कड़बी बात नहीं करती थी। घर में आए, गए के साथ मान सम्मान के साथ व्यवहार करती थी। घरेलू काम में अत्यन्त निपुण्, प्रवीण और दक्ष थी।
सुभागण की समाधि:------ गुरु रविदास जी से नाम जाप का ढंग सीख कर सुभागण समाधि लगाती थी। हर क्षण खुद भी *सोहम* शब्द की कमाई करती थी और घर पर आई संगत को भी *सोहम* जाप करवा कर धर्म, ईमान के रास्ते पर चल कर, सभी को सभ्य और सदाचारी बन कर, ईमानदारी से कर्म करने का उपदेश देती थी। जब गुरु रविदास जी महाराज महीनों तक घर से बाहर रहते थे, तब वह आई साध-संगत की पूरी सेवा करती, भोजन खिलाती, सत्संग सुनाती और बड़े आदर सम्मान से विदा करती थी। सुभागण ने साधना कर के खुद भी सत्य को पाया और घर आने वाली संगत को भी सत्य का मार्ग दिखा कर कल्याण किया था।
परिवार:---- गुरु रविदास जी महाराज का आदर्श परिवार था, सारे परिवार के सदश्य संत महात्मा ही थे। इन का एक बेटा संत दास और एक ही बेटी संत कौर हुए हैं। दोनों ही बेटा और बेटी अध्यात्मिक शक्ति के ज्ञाता थे।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष,
विश्व आदि धर्म मण्डल, हिमाचल प्रदेश।
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