39 भाग।। चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास।।
39 भाग।। चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास।।
कुंवारी कन्या गंगा कुटिया में विराजमान हो कर गुरु रविदास जी से कहने लगी, कि हे गुरु महाराज! इन ढोंगी, पाखण्डी ब्राह्मणों ने रास्ते में मुझे बड़ा सताया, मैं ने केवल आप के बारे में सुना था कि आप सारे विश्व में सर्वश्रेष्ठ गुरु ही नहीं अपितु सर्व शक्तिमान ईश्वरीय अवतार हैं, आप के अतिरिक्त धरती के ऊपर कोई भी ऐसी शक्ति नहीं है, जो दीन-दुखियों, दलितों, पीड़ितों को सहारा देकर उन की मुशीबतों का निराकरण कर सके। ये तिलकधारी तो अमीरों और गरीबों का खून चूसने वाले डाकू, ठग और लुटेरे ही हैं। अच्छे सभ्य विद्वान साधु संतों से सुना है, कि आप के अतिरिक्त सारे विश्व में कोई भी पीर, पैगम्बर और औलिया नहीं है इसीलिए मैं आप के दर्शन के लिए लालायित थी। स्वामी ईशर दास जी महाराज अपने गुरु आदि प्रकाश ग्रंथ के पृष्ठ संख्या ४५७-४५८ पर लिखते हुए फरमाते हैं कि---
।। शब्द भैरबी।।
मैं गंगा तां वेखण आई रविदास गुरु जी।
तुम निकले अनामी निज खास गुरु जी।
मैं गुरु जी आप के दर्शन करने आई:---- हे गुरु रविदास जी महाराज! मैं ने आप के यश और प्रसिद्धि के बारे में सुना था, जिस से आकर्षित हो कर आप को देखने की तमन्ना जागृत होती थी, आज आप के दर्शन कर के मैं धन्य हो गई हूँ। मैं ने जितना सुना था, आप की जितनी प्रसिद्धि सुनी थी, आप तो उस से भी कई गुना अधिक खास अर्थात विशेष निकले। आप तो अनामी है आप तो साक्षात ही आदपुरुष हो, आप तो नाम रहित हो और प्रत्येक घट घट में विद्यमान हो।
तेरा अंत किसे ना पाया है। सभी विश्वहि तुम्हें बनाया है।
हूँण बण बैठे रविदास गुरु जी। अज दर्शन आ कीना जी।
गुरु जी आप अनंत ही हैं:---- हे गुरु रविदास जी महाराज! आप के रंग, रूप, आचरण, व्यवहार से ज्ञात हो रहा है, कि आप अनंत हो कर भी सामान्य, आम व्यक्ति हो। आप ने जिस तरह से मेरा सामान्य कन्या का मान सम्मान, आदर, सत्कार, अभिनंदन और अभिवादन किया है, वैसा तो कोई भी धरती पुत्र मेरी जैसी साधारण कन्या को देखने का प्रयास भी नहीं करता। आप के आचरण से मालूम हुआ है कि आप ने सारी कायनात की रचना की हुई है। अब आप तो साधारण लौकिक, सामान्य नागरिक गुरु रविदास बन गए हो। आज आप ने मुझ जैसी लौकिक कन्या को सर्वोच्च सम्मान दे कर दर्शन भी दे दिये हैं।
रूप अदभुत नया नवीना जी। सभी मंजलां पास गुरु जी।
ऐसी जुगत नाम बतलाई है। असंख व्योम भवन चढ़बाई है।
मेरी असली मंजिल नजदीक है:----- कुंवारी कन्या गंगा गुरु जी की शिफत करती हुई फार्माती हैं कि हे गुरु जी! आप का स्वरूप अत्यंत अनुपम, अनूठा, अदभुत और नया नवीना है। आप के दर्शन से आभास हो रहा है कि अब मेरी वास्तविक मंजिल नजदीक है अर्थात मेरा लक्ष्य पूर्ण होने वाला है। आप ने जो *सोहम* रूपी नैया भव सागर को पार करने के लिए बताई है, इस पर चढ़ कर मैं ने असंख्य आसमानों, अनेकों लोकों के वास्तविक सत्य को देख और सुन लिया है।
अरबां गगन आकाश गुरु जी। बल बल बारने जावां तेरे जी।
कोट कोट अघ कटे मेरे जी। आई समीप तेरे नवास गुरु जी।
गुरु जी मैं अरबों खरबों गगन देख कर बलिहार हूँ:---- हे गुरु महाराज! अंतरिक्ष में अरबों ही आसमान हैं। मैं आप के ऊपर कुर्बान जाती हूँ, आप ने मेरे करोड़ों करोड़ों पापों को नष्ट कर दिया। हे गुरु जी! ये तभी संभव हुआ है, जब मैं आप के पास आई हूँ।
गुरु रविदास जी महाराज की जल थल और अंतरिक्ष में निवास करने वाले सभी प्राणियों के ऊपर दया दृष्टि थी, जिस सत्य को सत्यवती गंगा जान चुकी थी, इसीलिए वह उन को सर्वोच्च अपरम्पार, अदृष्य, अगोचर और निराकार ईश्वर मान रही थी। गुरु रविदास जी महाराज की अपरम्पार शक्ति का ज्ञान देवी कन्या गंगा के वक्तव्य से हो रहा है मगर तत्कालीन ब्राह्मणों ने गुरु जी के बारे में निम्न से निम्न कथाएँ लिख कर नीचा दिखाने का ही कार्य किया है। जिस महापुरुष के असंख्य शिष्य हों, अनेकों शासक अनुचर हों, जिन के सामने विद्वान ब्राह्मण भी न मस्तक हों, वे चर्म कारों का काम कैसे करते? इस तर्क संगत सत्य को समझना जरूरी है।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष,
विश्व आदि धर्म मंडल। हिमाचल प्रदेश।
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