चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास जी।। भाग13।।
चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास जी।। भाग 13।।
बालक रविदास का जन्म सम्पन्न परिवार में:---गुरु रविदास जी महाराज का जन्म चँवरवंश के अमीर उद्योगपति परिवार में हुआ था। उन के बाबा कालू दास जी और पिता संतोष दास जी चमड़ा, कपड़ा और खिलौना उद्योग के सुप्रसिद्ध उद्योगपति थे। जिन उद्योगों में सैकड़ों लोग कार्य करते थे। चमड़े से बने वच्चों के खिलौने खरगोश, शेर, गेंद, और कोट जैक्ट,बैलट, मस्क आदि उच्च कोटी का सामान विदेशों में निर्यात किये जाते थे। उच्च स्तर का रंग बिरंगा कपड़ा कारखानों में बनता था, जिस का व्यापार अखंड भारत में होता था। ऐसे संपन्न परिवार में गुरु रविदास जी महाराज का जन्म हुआ था। जब बालक रविदास जी का जन्म हुआ था, तब बाबा कालूदास जी अपनी बेटी के घर भागलपुर गांव में गए हुए थे। बालक रविदास जी का जन्म उत्सव ग्याहरवें दिन उन के निवास स्थान पर मनाया गया।
बालक रविदास का पंजाप:--- गाँव कालू माजरे में बालक रविदास का जन्मदिन उत्सव बड़े ही शाही ढंग से बड़ी धूमधाम से मनाया जा रहा था। जिस में सभी रिश्तेदारों और कारखानों के कर्मचारियों और अधिकारियों को आमंत्रित किया गया था, जिस के बारे में गुरु आदि प्रकाश ग्रंथ के रचयिता स्वामी ईश्वर दास जी महाराज फरमाते हैं, कि------
।।शलोक।।।
सुंदर खिलौने दा प्रसंग दिया सुणाए। संतोष दा बणोहिया मितु सुंदर खिडाउणे बणावे। रतनी मितु झगगा दुपट्टा ढोआ खिलौउणे लिआए। श्री गुरु रविदास दे बुआ फुफ़ड़ सदाए। भागलपुर पिंड ते कालू माजरे आमण। झग्गा चुन्नी कंगण खिलाउणा रविदास दे अंग लामण।
संतोष दास जी की बहन रतनी देवी और बहनोआ मितु को जब पता चला की बालक रविदास का जन्म हुआ है, तब से वे फूले नहीं समा रहे थे और दोनों ने हीं बालक को भेंट करने के लिए अपने हाथों से खिलौने बनाए और रतनी ने बालक रविदास के लिए सुंदर सुंदर कपड़े, दुपट्टा और खिलौने ले कर आए। दोनों ही बालक के फूफा और बुआ लगते थे। वे भागलपुर से चल कर गांव कालू माजरे आ गए। बालक रविदास को अपने से हाथों कपड़े और हाथों में कंगन पहना कर खिलौने थमाए। उत्सव में आए मेहमानों ने भी बालक रविदास जी को असंख्य कपड़े, खिलौने नजराना कर के अपनी श्रद्धा पूर्ण की। बाबा कालू दास ने बालक की खुशी में आई संगत को खूब दान दक्षिणा दे कर स्वादिष्ट भोजन करबा कर रुखसत किया।
।।शब्द बिहाग।।
झग्गा चुन्नी ढोआ लै के भुआ गुरु रविदास दी आई। नाम रतनी भागलपुर पिंड सी। झग्गा चुन्नी खिडौंणे लिआ फिंड सी। श्री गुरु रविदास लाई अंग सी। खिलौने हाथ लगा पर पै गई जिंद सी। गल सारे देश गई ऐ खिंड सी। शोर मचिआ कुल पिंड सी।
खिलौने के स्पर्श का चमत्कार:---बालक रविदास जी को बुआ रतनी ने कपड़े पहना कर के हाथ में जब खिलौना दिया तो उस समय बड़ी हैरानी की बात हो गई कि बालक के हाथ से छूने मात्र से ही खिलौने में प्राण पड़ गए थे और खिलौना चलने लग पड़ा था। यह बात तुरंत चारों ओर फैल गई और उपस्थित सभी लोग इस चमत्कार को देख और सुन कर के हैरान हो रहे थे। स्वामी ईशर दास जी महाराज *गुरु आदि प्रगास ग्रन्थ* में फरमाते हैं कि-----
जेहड़े गुरु रविदास हैं। पुत्र मामे दा जीवन ते दास है। रिहा सदा गुरां दे तां पास है। सेवक गुरां दा सदाया एह जी खास है। दुआ भुआ दा पुत रैदास है। रहे रात दिन गुरां दे ऐह दास है। पास रहे दोनों भाई। नाले सेवक सदाई। मैहमा गुरां दी कराई। धन धन रविदास नूं सुणाई।
मामा के पुत्र जीवन दास:---- जीवन दास जी गुरु रविदास जी के मामा जी के लड़के थे। वे हमेशा ही गुरु रविदास जी के साथ ही रहते थे और अपने छोटे भाई के सेवक बन कर के उन की सेवा करते रहे इसी तरह वे दिन-रात उन की देखभाल करने में बिताते थे।
।। शलोक।।
कालू माजरे तों थोड़ी दूर हाजी पर जाण। धारू नाना गुरु रविदास दा स्वर्ण कड़ें अधाण। धारू दा पूत तिस का नाम जीवन दास। जन्म चौदह सौ चौबीस बिकर्मी रिहा गुरां दे पास। जीवन खिलाबे गुरां नूं नेहचा यह धार। दृढ़ जकीना खिड़ाऊंणे तउ रविदास गुरु अवतार।
बुआ के पुत्र रैदास:----दूसरे भाई रैदास जी महाराज, बुआ रतनी देवी और फूफा मितु के पुत्र थे। वे भी बालक रविदास के साथ ही सेवक बन कर रहते थे। ये दोनों भाई जीवन दास जी महाराज और रैदास जी महाराज, गुरु रविदास जी जहां भी देश विदेश जाते थे, उन के साथ ही सेवक और अनुचर बन कर के ही रहते थे। इन्होंने गुरु रविदास जी महाराज के साथ ही जीवन बिताया। जहां गुरु रविदास जी महाराज जाते ये दोनों भी गुरु जी के साथ दिन-रात भ्रमण करते थे और जनता की सेवा भी करते थे।
ब्राह्मणों ने गुरु रविदास महाराज को ही रैदास लिख डाला:---- गुरु रविदास जी महाराज के समकालीन ईर्षालु और जातिबादी ब्राह्मण लेखकों ने विश्व में गुरु जी के नाम के प्रति भ्रांति पैदा करने के लिए गुरु रविदास जी महाराज को रैदास के नाम से प्रसिद्ध कर दिया है, जब कि रैदास जी महाराज उन की बुआ के पुत्र थे। रैदास जी महाराज भी एक बहुत बड़े साधु, संत और फकीर हुए हैं, जो रविदास जी की सेवा में रहते थे।
गुरु रविदास जी का एक ही नाम है:--- गुरु रविदास जी महाराज ने आदि धर्म का प्रचार सारे विश्व में किया है, तभी तो उन्होंने भी फरमाया है कि----
आद से प्रगट भयो जा को ना कोउ अंत।
आद धर्म रविदास का जाने बिरला संत।
मूलनिवासी जनता से अपील:---आज भले ही स्वार्थी और अमर होने वाले महत्वाकांक्षी लोगों ने गुरु रविदास जी की शक्ति का नाजायज लाभ उठा कर के उन के नाम पर नये नये मतों का सृजन कर दिया है मगर गुरु जी ने केवल भारत के मूलनिवासी लोगों को आदपुरुष से चले आ रहे आदवंशी आदिवासियों के धर्म *आदधर्म* का ही प्रचार किया है। नये नये धर्म का सृजन मनुवादी लोगों ने मूलनिवासी भारतीयों को टुकड़े टुकड़े करने के लिए करवाया है, इसीलिए भारत की मूलनिवासी जनता मनुवादियों की चाल को समझ कर केवल आदधर्म को ही आगामी जनगणना में दर्ज करवाएं।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष,
विश्व आदधर्म मण्डल। हिमाचल प्रदेश।
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