चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास जी।। भाग 14।।
चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास जी।। 14।।
बालक रविदास जी की दैवी शक्ति:---- बालक रविदास जी जन्म से ही अपनी दैवी शक्तियों का प्रदर्शन कर रहे थे, जिस से प्रभावित हो कर के चारों वर्णों के लोग उन के दर्शनों के लिए उमड़ पड़े थे। जब उन्होंने चमड़े के खिलौने को हाथ से छुआ था तब वह रेलगाड़ी की तरह दौड़ने लग पड़ा था, जिस दृश्य को देख कर के उपस्थित सभी लोग हैरान हो गए थे और बालक के प्रति आध्यात्मिक आस्था बढ़ती गई। परिवार के सभी सदस्य प्रतिदिन बालक रविदास के अनूठे कामों को देख कर के बहुत प्रभावित होते जा रहे थे, जिस के कारण उन के मामा के लड़के जीवनदास और उसकी पत्नी भानी ने बालक रविदास को अपना ईष्ट स्वीकार कर लिया था और उनके प्रति अथाह श्रद्धा उत्पन्न हो गई थी।
बालक रविदास की रचनात्मक शक्ति:----- बालक रविदास जी अभी पांच वर्ष के भी नहीं हुए थे, कि उन के मुख से निकले हुए प्रत्येक वाक्य काव्य रचना से कम नहीं होते थे। ऐसा लगता था कि बालक रविदास जन्मजात ही कवि और लेखक हैं। स्वामी ईश्वर दास जी महाराज ने उन के कृतित्व और काव्य रचना के बारे में फरमाया है, कि जब वे पांच वर्ष के हो गए तब बालक रविदास जी ने वाणी उच्चारण शुरू कर दी थी ------
।।शलोक।।
पंज बरस दे हो गए गुरु रविदास। वाणी उच्चारण अनुभव रब्बी होई जोत प्रकाश। जा खेलन नाल बालकाँ जउ तुम गिरबर शब्द उचारा। लाए समाधि बैठ के सबना से होत निआरा। जीवनदास दी नार सी भानी। नाम दोहाँ ने लिआ। पहले पहल गुर से चरणा अमृत इन्हें पिआ। बहुते जनां नूं होईआ भरोसा, लै गुर मंतर जावण। मुख होंठ बिन सोहम जपणा इह गुरु आख सुनामण। चाबीआं रहिआं बैकुंठ दिआं हथ बामण जाण। सुगम मारग गुरां ने बेगम घडाया आँण। किते डंडी किते पगडंडी किते सड़क इक मोड़। औरों फरलांग गुर नाम दिया ना सड़कां ना लोड़। डंडी पुराण ख़ट शास्त्र सड़कां वेद ग्रंथ। अजपा जाप गुर दे दिआ ना लोड शास्त्र पंथ।
बालक रविदास द्वारा गुर मंत्र देना:-----जब बालक रविदास जी महाराज पांच वर्ष के हो गए, तब उन्होंने स्वयं शब्द वाणी की रचना कर के संगत को क्रांतिकारी सत्संग से अभिभूत करना शुरू कर दिया था। साध संगत बालक रविदास जी महाराज के अलौकिक ही नहीं क्रांतिकारी प्रवचन को सुन कर के दंग हो रही थी क्योंकि आज तक भारत के मूलनिवासियों (शूद्रों) को सत्संग सुनाना तो दूर की बात थी, वे ना तो काव्य रचना कर सकते थे और ना ही लिख सकते थे, सत्संग और कथा का नाम तक नहीं सुन सकते थे, धार्मिक ज्ञान ना होने के कारण शूद्र पशुओं की तरह जीवन जीते थे और तीनों मनुवादी वर्ण पचासी प्रतिशत मूलनिवासियों को पशुओं की तरह काम में जोते रखते थे मगर यह पहला अवसर था कि बालक रविदास ने मनुवाद की गुलामी के खिलाफ जंग शुरू कर दी थी और स्वयं शब्द रचना कर के शूद्रों को ज्ञान देना शुरू किया था। सब से पहले बालक रविदास जी ने गुरमंत्र संत जीवन दास और उन की पत्नी भानी को ही दे कर कृतार्थ किया था।
झूठ के भंडार वेदों पुराणों का खंडन:--- बालक रविदास ने जीवन दास और उस की पत्नी भानी को बेगम शहर के बारे में बता कर *सोहम* पवित्र शब्द का अजपा जाप जपने का उपदेश दिया। इस गुरु मंत्र से ब्राह्मणों के वैकुंठ की चाबियां उन के हाथों में ही धरि रह गई अर्थात बैकुंठ के कठोर मार्ग की काल्पनिक और झूठी कथाएं निर्मूल सिद्ध होने लगीं। ब्राह्मणों की बताई हुई ज्ञान की लंबी चौड़ी और दुश्बार सड़कों और पगडंडियों को जड़ से समाप्त कर के केवल मात्र फर्लांग दूरी वाला *सोहम* शब्द का सुगम मार्ग बता कर शूद्रों को सरल सड़क के ऊपर चलना सिखाया। बालक रविदास ने संगत को कच्ची पक्की सड़कों जैसी वेद पुराणों की किताबों के ज्ञान को निरर्थक बता कर के अजपा जाप करने के लिए गुर मंत्र सिखाया और कहा, कि वेदों पुराणों और छह शास्त्रों के ज्ञान की कोई जरूरत नहीं है। केवल एक शब्द ही *सोहम* मानसिक शांति और सुखमय जीवन के लिए जाप करना आवश्यक है। किसी प्रकार के आडंबर और पाखंड करने के लिए किसी भी शास्त्र को पढ़ने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि यह वेद ग्रंथ, पुराण और शास्त्र मनुष्य द्वारा लिखे गए हैं, जिन में कोई सच्चाई नहीं है। केवल शूद्रों को भ्रमित करने का ही इन में आडंबर भरे हुए हैं, इसलिए इन मनुवादी शास्त्रों के ऊपर कोई विश्वास नहीं करना चाहिए। केवल और केवल अजपा जाप करने के लिए *सोहम* जाप ही करना चाहिए। *सो* का उच्चारण करते समय शरीर के अंदर आक्सीजन भारी में मात्रा में जाती है और कुछ देर रोकने के बाद जब *हम, हम * करते हुए वायु कार्बनाक्साईड बन कर बाहर निकाली जाती है , उस से शरीर प्रांजल होता है और सारी शारीरिक समस्याएं समाप्त होती रहती हैं।
बालक रविदास के ज्ञान से मनुवादी टैंट भष्म होने लगे:--- जब बालक रविदास ने संगत को सरल, वैज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक और क्रांतिकारी अध्यात्मिक ज्ञान का मार्ग बता कर गुलाम शूद्रों को धार्मिक क्रांति करने का आबाह्न किया तो मनुवादी धर्मों के टैंट भष्म होने लग पड़े, थोथे ज्ञान की दुकानें बंद होने लग गई।
बालक रविदास के पहराबे का आतंक:---- बालक रविदास जी ने कटवीं धोती लगा कर ब्राह्मण भेष धारण कर लिया, अपने मात्थे पर चन्दन का तिलक लगा कर तिलकधारियों की खिल्ली उड़ाना शुरू कर दी। अलौकिक ध्वनि निकाल कर जब दाहिना शंख बजाया तो उस से सारा मनुवाद ही अग्नि को भेंट हो गया। बालक रविदास जी जानते थे, कि धोती, तिलक और शंख ध्वनि केवल मात्र ढोंग हैं, पाखण्ड और अडंबर के अतिरिक्त कुछ नहीं हैं मगर वे काल्पनिक ब्राह्मणबाद की हवा निकालने के लिए ही ये स्वांग धारण कर रहे थे, जिस से तिलकधारी बौखला उठे और मरने मारने पर उतारू हो गए। पहले तो कुछ समय प्रतीक्षा करो और नजर रखों की नीति पर चलते रहे ताकि डरा धमका कर ही बालक को रोक कर पाखण्डी लुटेरे रास्ते पर चल कर अपना भरण पोषण करते रहे मगर बालक रविदास की सामाजिक और धार्मिक क्रांति की मशाल दिनों दिन भड़कती ही गई।
रामसिंह आदिवंशी।
अध्यक्ष,
विश्व आदि धर्म मण्डल। हिमाचल प्रदेश।
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