चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास।। भाग 17।।
चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास जी।। भाग 17।।
गुरु रविदास जी को मूर्ख मनुवादी कंगाल लिखते:---बालक रविदास जी का जन्म अमीर घराने और उद्योगपति परिवार में हुआ था मगर ईर्षालु मनुवादी लेखक गुरु रविदास जी को कंगाल परिवार में जन्मे हुए लिखते आए हैं, जिस के आधार पर कई ऐसी काल्पनिक कथाएँ, लघु कथाएँ, छोटी बड़ी फिल्में और ना जाने कितने अपमान जनक किस्से घड़े गए हैं, जो ब्राह्मणबाद की मानसिक जलन और ईर्षा को दर्शाते है।
गुरु आदि प्रगास ग्रंथ के रचयिता स्वामी ईशर दास जी इस पवित्र ग्रंथ में लिखते हैं कि जब बालक रविदास जी का प्रकाश हुआ था तब उन के बाबा कालू दास ने अपने कर्मचारियों को ही नहीं आम जनता का कर्ज तक माफ कर दिया था, वे फरमाते हैं कि--
।।शब्द बिहाग।।
बधाईयां देण तां सामीयां आईयां है। बाबे कालू ने बहियाँ कढवाईयां है। व्याज मूल ते माफ करवाईयां है। धन धन कैहंदे जन्मिया येह साईयां है। जन्म दे सार तां बंधन तुड़वाईयां है । लखां दान कीते मझां ते गाइयां है। धन धन कैंहदे है जांदे । लखां शीशां है दुआंदे। रविदास गुण हैं गांदे।
बालक रविदास के प्रकाश पर वधाइयाँ:-- जब बाबा कालू दास के घर में भावी चिराग ने प्रकाश किया तब उन के परिवार और सारे बनारस में खुशियों की लहर उत्पन्न हो गई थी। हजारों लोग बाबा कालू दास और पिता संतोष दास जी को बधाईयां देने के लिए आ रहे थे घर में उत्सव का माहौल बन चुका था ऐसे में बाबा की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था।
बाबा कालूदास द्वारा कर्ज माफ करना:---- बाबा कालू दास बनारस के तत्कालीन रईसों, उद्योगपतियों में से एक अमीर ही नहीं थे अपितु दानी भी थे, जैसे ही उन के घर में बालक रविदास का जन्म हुआ, वैसे ही उन्होंने अपने कर्जदार सामियों का कर्ज ढूंढने के लिए अपने मुंशियों को आदेश दिया कि सभी बहियों को निकाल कर के उधार लेने वाले कर्जदारों का कर्ज निकाला जाए। बाबा कालूदास ने उधार लेने वाले लोगों का कर्ज माफ कर दिया। कर्ज माफी के बाद सभी सामियां खुशी मनाती हुई कह रही थी, कि सचमुच कोई मालिक अर्थात ईश्वरीय शक्ति ने जन्म लिया है, जिन के जन्म लेते ही गरीब सामियों को कर्ज मुक्त कर दिया गया हैं।
बाबा कालूदास द्वारा दान देना:----- बालक रविदास जी के जन्म की खुशी में बाबा कालू दास ने लोगों को दान देने के लिए अपने खजाने की तिजोरियां खोल दी थी और साधु, संतों और बालक के दर्शन करने के लिए आने वाली संगतों को भी जी भर कर के दान-दक्षिणा दी। साधु-संतों और निवस्त्र अंधों, लङ्गड़ों, लूलों को वस्त्र पहना कर के दक्षिणा देकर कृतार्थ किया। जिस किसी को गाय की जरूरत थी उन को गायें दी गई, जिस किसी को भैसों की आवश्यकता थी उन्हे भैसें दान में दी गई। स्वामी ईशर जी फरमाते हैं कि बालक के दर्शन करने के लिए आने वाली संगत घर वापस जाती हुई धन्य हैं,धन्य हैं बाबा कालू दास जी जिन्होंने बालक के जन्म की खुशियाँ मनाने के लिए हम जैसे बिपन्नों को भी शामिल किया।
संगत आशीष देती हुई जाती:--- बाबा कालूदास जी ने दिल खोल कर साधु संतों, महंतों, फकीरों, गरीबों और उन के उधार पर अपने वच्चों का पालन पोषण करने वाले बालक रविदास जी की दीर्घ आयु की शुभ कामनाएं और ढेरों सारी आशीष देते हुए जाते थे।
उपरोक्त ऐतिहासिक विवरण से स्पष्ट ज्ञात होता है कि रविदास जी का जन्म किसी भी आम साधारण गरीब घर में नहीं हुआ था। यह केवल मनुवादियों की चमार वंश में अवतरित दान वीरों, पैगम्बरों और महापुरुषों को अपमानित करने की एक डूंगी और शैतानी साजिश लगती है।
बाबा कालू दास का संपन्न परिवार था:---- जब बाबा कालू दास जी का एक संपन्न परिवार था, अथाह धन दौलत के स्वामी थे, बनारस के सुप्रिसिद्ध अमीर थे, उन के तीन तीन बड़े उद्योग बनारस में चलते थे, जिनमें हजारों लोग नौकरी करते थे, उन के प्रोडक्ट देश विदेश में निर्यात होते थे और उन से लाखों करोड़ों रुपए की आय होती थी, फिर गुरु रविदास जी महाराज के पिता संतोष दास को मनुवादियों ने गरीब कंगाल कैसे लिख दिया? ये सोचने का विषय है!
ब्राह्मण जाति दूसरी जाति को सम्मान नहीं देती:--- वास्तव में, ब्राह्मण जाति किसी भी राजपूत, वैश्य, शूद्र को मान सम्मान नहीं देती आई है। अपने सिवाए किसी को श्रेष्ठ देख ही नहीं पाती है, जो आज भी जारी है। किसी भी सामाजिक संगठन का चुनाव हो उस का मुखिया, प्रधान केवल ब्राह्मण ही बनाया जाना चाहिए, भले ही चुनाव झाड़ू मारने वाले संगठन का ही क्यों ना हो।
ये मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि जब हमारे अध्यापक संगठन का पहला प्रादेशिक चुनाव हुआ तो मुझे शुकला समझ कर प्रदेश का महासचिव चुन लिया और ब्राह्मणी को हरा दिया। अपनी ही ब्राह्मणी को इसलिए हरा दिया कि वह नारी थी। उस के बाद जब पंजाब, हिमाचल प्रदेश के संगठनों का आंदोलन चलने वाला था, तब भी मुझे पंजाब, चंडीगढ़ और हिमाचल प्रदेश की संयुक्त संघर्ष समिति का महासचिव बनाया गया मगर इसी बीच जब ब्राह्मणों को ज्ञात हो गया, कि मैं जाति का चमार हूँ, तब अगले बार्षिक चुनाव के आरम्भ होंते ही एक आशुतोष नामक ब्राह्मण (प्रदेश डेलिगेट) ने मंच से कहा कि हम चमार को प्रधान नहीं बनाएंगे, जिसे सुन कर मैंने भी सहर्ष कह दिया कि मैं भी अब चमारों की ही नेतागिरी करूँगा, आप की नहीं और संगठन से सदा के लिए त्याग पत्र दे दिया। ब्राह्मण अपनी ही जाति की औरत को भी अछूत मानते हैं, फिर गुरु रविदास जी को ये लोग कहाँ मान सम्मान दे सकते थे? जब कि विश्व में गुरु रविदास से बड़ा कोई अवतार नहीं हुआ है, फिर 151 वर्ष की आयु में कौन उन्हे कतल कर सकता था? कौन हैवान उन को मार सकता था? मगर ब्राह्मण और ब्राह्मणों के दल्ले अछूत लेखक भी गुरु रविदास को अपमानित करने के लिए ऐसी ऐसी नीच घटिया हरकतें करते आ रहे हैं। भावी गुरु सेवकों को ऐसा करने वालों के खिलाफ कड़ा संज्ञान ले कर मानहानि का केस कर के दंडित करवाने का काम करना होगा।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष,
विश्व आदधर्म मण्डल, हिमाचल प्रदेश।
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