31 भाग।। चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास।।

भाग 31।।चँवर वंश के देव तुल्य सम्राट गुरु रविदास।। तिलकधारी पंडे पुजारियों और ब्राह्मणों ने भारत के मूलनिवासी लोना उर्फ देवी कामाख्या, सम्राट सिद्धचानो के मंदिरों के ऊपर अपना आधिपत्य जमाया हुआ है, जिन में अपने झूठे, कल्पित भगवानों को बैठा रखा है। ऐसा ही ब्राह्मणों ने जगन्नाथपुरी मंदिर में भारत के असली मूलनिवासियों को उन के ही मंदिर से भगा कर अपना अधिपति जमा कर के लूट मचाई हुई थी, जिस के बारे में गुरु रविदास जी महाराज को ज्ञात हो गया था, कि वहां मूलनिवासी लोगों को मंदिर के नजदीक फटकने नहीं दिया जाता है और मनुवादियों के गुलाम भील लोग असहाय हो कर दूर से ही जगन्नाथ के दर्शन किया करते हैं, इसीलिए एक दिन वे इस राक्षसी अन्याय को खत्म करने के लिए जगन्नाथपुरी मंदिर के लिए रवाना हो गए, जिस दृष्य के बारे में स्वामी ईशर दास जी महाराज ने गुरु आदि प्रकाश ग्रंथ फरमाया है कि------ चौदह सौ अठहतरे श्री गुरु रविदास। मेले जगन्नाथ दे किआ नाम प्रकाश। जगन्नाथ पुरी मंदिर में गुरु रविदास:---- स्वामी ईशर दास जी महाराज फरमाते हैं कि गुरु रविदास जी महाराज विक्रमी संवत 1478 को अर्बाचीन ऐतिहासिक मंदिर जगन्नाथ पुरी में व्याप्त छुआछूत और भ्रष्टाचार का उन्मूलन करने के लिए पहुंच गए। जहां उनके चरण स्पर्श होते ही चारों ओर उनके यश का प्रकाश हो गया। फिरदे फिरदे गुरु जी जगन्नाथ दे गए आई। डिठिया मेला लगिआ अछूत दूर हैं बहाई। जगन्नाथ पुरी में अथाह मेला:--- जब घूमते फिरते हुए गुरु रविदास जी महाराज, कृष्ण यादव, बलराम यादव और भगिनी सुभद्रा यादव के मंदिर में पहुंचे तो क्या देखते? वहाँ वहुत बड़ा मेला लगा हुआ था। लाखों मनुवादी लोग मेले का आनंद ले रहे थे मगर जिन मूलनिवासी लोगों के घरों में जन्मे महापुरुष कृष्ण यादव, बलराम यादव और सुभद्रा यादव का मंदिर था, उन मूलनिवासी लोगों को अपने महापुरुषों के मंदिर में जाने पर प्रतिबन्ध लगा हुआ था और उन्हें दूर बैठाया हुआ था, जिस दृष्य को देख कर गुरु रविदास जी महाराज लाल पीले हो गए थे। लैंण चढ़ावे पण्डे पांडे बामण दूरों दूर। देखिआ रविदास नूं पुजारी गए मगरूर। मंदिर के मनुवादी मगरूर पुजारी:-- गुरु रविदास जी महाराज ने जब देखा कि जगन्नाथ मंदिर के असली उतराधिकारी भील दूर खड़े हैं और पांडे, पुजारी और से दूर खड़े भीलों से भी जगन्नाथ के लिए चढ़ाबा ले रहे हैं। जब ब्राह्मणों ने देखा कि आज गुरु रविदास जी महाराज यहां पधार गए हैं, तो मन में समझ गए कि कुछ ना कुछ तो उलटफेर होने वाला है क्योंकि गुरु रविदास जी महाराज जहां कहीं भी जाते थे, किसी ना किसी लक्ष्य को लेकर के ही जाते थे और वहां कुछ ना कुछ उलटफेर कर के ही आते थे, इसलिए जगन्नाथ पुरी के मंदिर के ब्राह्मण मगरूर हो कर के परेशान हो गए। बकत शाम दा आ गिआ आरती लगी होण। थाली दीवे जगाई कर सभ पंडे लगे खलोण। शाम होने पर आरती होने लगी:---जब शाम के सात बज गए तब हजारों लोग इकट्ठे हो गए और थालों में दीपक जला कर के सभी पंडे, पुजारी घण्टे, घड़ियाल और शंख बजाने लग पड़े। मगर अछूत मूलनिवासी भील उस जगह पर बिठाए गए जहां से ना तो पूजा पाठ का दृश्य नजर आ रहा था और ना ही आरती सुनाई दे रही थी, जिस के कारण गुरु रविदास जी ने आँखें बन्द कर के आदि पुरुष के पास अरदास की, कि हे आदि पुरुष! आप के गरीब वच्चों के साथ क्या भेदभाव किया जा रहा है? कितना अन्याय किया जा रहा है, इन से चढ़ाबा तो लिया गया, जिसे धो माँज कर इन डाकुओं ने अपनी तिजोरी में रख लिया गया मगर इन्हें ना तो आरती के दृश्य दिखाई दे रहे हैं और ना आरती सुनाई दे रही है, इसीलिए न्याय करो! अछूत बठाले ऊहाँ में जहां आरती सुनी ना जाई। बिचे गुरु रविदास है कौतक नईआ नवीन बखाई। गुरु रविदास जी का नया नवीना कौतुक:---- गुरु रविदास जी महाराज बलपूर्वक आरती पूजा के बीच जा कर के खड़े हो गए, जिस से पागल हो कर के पंडे पुजारियों और तिलकधारियों नेसमझ लिया कि आज कोई नया कौतुक होने वाला है। ब्राह्मणों ने अछूतों को वहाँ बैठाया जहां आरती ना तो सुनी नहीं जा सकती थी और ना ही देखी जा सकती थी।। गुरु रविदास जी महाराज कोई साधु-संत, फकीर ही नहीं थे वे सारी कायनात के मालिक थे, जिन्होंने उद्दण्ड मानव को मानव बन कर मानवता से जीना सिखाया और किसी को भी दण्ड दिए बिना सीधे रास्ते पर ला कर खड़ा कर दिया था मगर ये ब्राह्मण तिलकधारी फिर भी नहीं सुधरे। गुरु रविदास जी महाराज को ब्राह्मणों ने उन के जीते जी तो खूब मान सम्मान दिया मगर उन के देह छोड़ने के बाद उन का अपमान करने के लिए अनेकों काल्पनिक कथाएं घड़ कर के अपमानित करने का प्रयास किया है। उन के सारे के सारे इतिहास को नष्ट भ्रष्ट कर के उन का नामोनिशान मिटाने का प्रयास किया है मगर सत्य को कोई कभी मिटा नहीं सकता है, इसलिए गुरु रविदास जी महाराज भारत के मूलनिवासियों के घट घट में विद्यमान है, और सदा सदा विद्यमान रहेंगे। रामसिंह आदवंशी। अध्यक्ष, विश्व आदि धर्म मंडल, हिमाचल प्रदेश।

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