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Showing posts from January, 2023

हर शाख पर बैठ कर उल्लू लूट रहे।।

हर शाख पर बैठ कर उल्लू (भ्रष्टाचारी) लूट रहे! शायर रियासत हुसैन रिजवी उर्फ शौक बहराईची का जन्म छ: जून 1884 ईस्वी को अयोध्या के सैयदवाड़ा मोहल्ले में हुआ था लेकिन जन्म के बाद वे बहराईच में बस गए थे, इसलिए उन को शौक़ बहराईची के नाम से अधिक जाना जाता है, इस देश प्रेमी शायर ने आजादी के तत्काल बाद फैल रहे भ्रष्टाचार को अनुभव किया था और अक्षर:श उसी रूप में उन्होंने भ्रष्टाचारियों के ऊपर कटाक्ष करते हुए लिखा था, कि--- बर्बाद ऐ! गुलिस्तां करने को बस एक ही उल्लू काफी है! हर शाख पे उल्लू बैठे हैं अंजाम ऐ गुलिस्तां क्या होगा?" शौक बहराईची ने यह शेर बहराईच की कैसरगंज विधानसभा से विधायक और 1957 के प्रदेश मंत्री मंडल में कैबिनेट स्वास्थ्य मंत्री रहे हुकम सिंह की एक स्वागत सभा में भ्रष्टाचारियों के ऊपर कटाक्ष करते हुए पढ़ा था। शौक साहिब ने जिस मंच पर यह शेर पढ़ा था, वह दंड दिलाने वाले शासक का मंच था मगर बेखौफ लेखनी चलाने वाले निडर और साहसी शौक बहराइची ने देश में फैलते जा रहे भ्रष्टाचार के ऊपर कड़े शब्दों में कटाक्ष करते हुए जो लिखा है, उस से राजनेताओं की लूटघसूट का जनाजा निकलता आ रहा है। आज जो ...

30जनवरी।। हाय हाय रिश्वतखोर डायन खाए जा रही।।

हाय हाय रिश्वतखोर डायन खाय जा रही!!! मजदूर के शरीर की हड्डियों को गिना जा सकता है, उस के पेट पीठ को एक डंडे की तरह बना हुआ देखा जा सकता है, मुख पर झुर्रियाँ जवानी में ही हिलोरें मारती हुई नजर आती है मगर फिर भी वही कोहलू के बैल की तरह दिन रात मजदूरी करता ही जाता है। शाम को मन मसोस कर, रूखी सूखी खा कर वच्चों के साथ सो जाता है, प्रात:फिर वही कन्धे पर खून चूसने वाले की पंजालि उठा लेता है और कोहलू में जुत जाता है, इसी तरह मजदूरी के कोहलू में जीवन की शाम भी आ जाती और उस के अंधेरे में लुप्त हो जाता मगर वह फिर अपने बेटों को अपनी जगह तैनात कर के, खून पीने वाले राक्षसों के हवाले कर जाता है, यही मजदूर के परिवार की नियति चलती रहती है, किसी भी शासक को मजदूर के अस्थि पिंजरों पर तरस नहीं आता कि उसे भी इंसान की सुविधाएं दे कर इंसान की जिंदगी जीने का अवसर दिया जाए। राजनेता रिश्वत खा रहे:---जिन शासकों से मजदूरों, मजलूमों, गरीबों, किसानों को न्याय की आशा होती है, वही अन्यायी और लुटेरे हों तो फिर किस से न्याय की उम्मीद की जा सकती है। नौकरी लेनी हो तो रिश्वत, ठेका लेना हो तो रिश्वत, स्थानांतरण करवाना हो ...

24 जनवरी की यूक्रेन जंग की विस्मयकारी घटना

24 जनवरी की युक्रेन जंग की विस्मयकारी घटना!!! राजाओं को सत्ता इसलिए सौंपी जाती है, कि वे जनता और उस के जानमाल की सुरक्षा सुनिश्चित कर के, उन के पालन पोषण का बन्दोबस्त करे मगर ये लोग पावर मिलने पर इतने अहंकारी और अंधे हो जाते हैं, कि जनता को ही जनता से मरवाना शुरू कर देते हैं। अंतर्देशीय युद्ध तो असंख्य हो चुके हैं मगर दो विश्व युद्धों की रक्त रंजित दास्तानें कभी नहीं भूलती, जिन में हिटलर आदि तानाशाहों का इतिहास मानव संहार का प्रमाण है। ऐसा ही एक और नया इतिहास 24 फरवरी 2022 को रूस और युक्रेन के युद्ध के शंखनाद से लिखा जाने लगा है, जिस का क्या अंत होगा, ये भविष्य के गर्भ में है। 29 जनवरी को युद्ध का 341वां दिन:--- नाटो देशों ने अपनी अपनी सर्वोच्चता बर्करार रखने के लिए और अपने प्रतिद्वन्दि रूस को नीचा दिखाने के लिए, उस के अलग हुए भाई युक्रेन के सनकी राष्ट्रपति जलेंसकी को मोहरा बना कर रूस के राष्ट्रपति पुतिन के साथ भिड़ा दिया गया है। चौबीस फरवरी 2022 से दोनों देशों के राष्ट्रपति अपने देशों को युद्ध की आग में झोंक कर अपनी ही बर्बादी करते आ रहे हैं। रूस की राजधानी कीव पर युद्ध की तैयारी:...

भारत का राष्ट्रपति अन्याय का प्रतीक!!!

भारत का राष्ट्रपति अन्याय का प्रतीक!!! भारत के संविधान का महत्व :--- भारत का संविधान इसलिए बनाया गया है, ताकि भारत का शासन सुनियोजित और सुचारू रूप से चलाया जा सके, जिस से भारत के नागरिकों को न्याय, रोटी, कपड़ा और मकान मिल सके, किसी के साथ किसी प्रकार का कोई भेदभाव ना हो सके और शासन-प्रशासन पर पूरी निगरानी रखने के लिए एक और सर्वोच्च पद का सृजन किया गया था, जिसे "राष्ट्रपति" कहा जाता है संविधान में शक्तियों का बंटबारा किया हुआ है:--- संविधान में शासन और प्रशासन को चलाने के लिए सरकार के तीन अंग बनाए गए थे, जिन को पूर्णरूपेण स्वशक्ति संपन्न बनाया गया है, ताकि एक अंग दूसरे अंग के अधिकारों का अतिक्रमण ना कर सके। विधानपालिका:--- भारत के शासन और प्रशासन को चलाने के लिए जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों की विधानपालिका का गठन किया गया है, जो भारत की जनता की सुख सुविधाओं के लिए विधान (कानून) बना कर के समान रूप से भारतवासियों को अन्याय, अनाचार, अत्याचार, व्यभिचार, बलात्कार भ्रष्टाचार ऊंच-नीच, छल-कपट, बेईमानी, शोषण, छुआछूत को रोक कर समतामूलक जीवन जीने की व्यवस्था करे। न्यायपालिका:---जनत...

27 जनवरी।। मूलनिवासी बहुमत में हो कर भी गुलाम क्यों?

मूलनिवासी बहुमत में हो कर भी गुलाम क्यों? भारत के 85% मूलनिवासी अपनी ही धरती के ऊपर गुलाम क्यों हैं, चिंतनीय विषय है! चार हजार वर्षों से विदेशी यूरेशियन आर्य 85% मूलनिवासियों के ऊपर गुलामी थोंप कर के खुद बादशाह बने हुए हैं और विदेशी हो कर के भारत के मूलनिवासियों की किस्मत का फैसला करते आ रहे हैं, जिस के बारे में भारत के मूलनिवासी राजनेता समझ तो जरूर रहे मगर इस गुलामी को समूल नष्ट करने के लिए जो जरूरी उपाय हैं, वे नहीं कर पा रहे हैं। मूलनिवासियों की गुलामी के कारण:--- मनुवादियों ने साम दाम, दण्ड, भेद नीतियों को खोज कर विश्व की सर्वश्रेष्ठ धरती भारत को मूलनिवासियों से हथिया रखा है, जिन के सहारे ही मनुवादी शासन चलाने में सफल होते आए हैं। मनुवादी छल कपट:--भारत के मनुवादी छल बल कर के पचासी प्रतिशत मूलनिवासी जनता को नंगा, भूखा रख कर गुलाम बना कर रखते आ रहे हैं, जिस के सहारे मनुवादी कुशासन चलता आ रहा हैं। मूलनिवासी चिंतकों, नेताओं की हत्या:--- मूलनिवासी मेधावी, बुद्धिजीवी राजनेताओं, समाज सुधारकों, चिंतकों को मनुवादी व्यवस्था के साथ चलने के लिए राष्ट्रपति, मंत्री, सांसद, विधायक आदि के लालच द...

1937 के विधानसभाओं में मूलनिवासी विधायक।।

बिहार विधानसभा में मूलनिवासी विधायक 1 बाबू राम प्रसाद, 2 बाबू सुक्कारी पासी, 3 बाबू बूंदी पासी, 4 बाबू जगजीवन राम बीएससी, 5 बाबूराम बास्वान रविदास, 6बाबू बाल गोविंद भगत, 7बाबू शिवनंदन पासवान, 8 बाबू केश्वर पासवान, 9 बाबू सुंदर पासी, 10 रघुनंदन प्रसाद,11 बाबू बरसू चमार, 12 बाबू जगलाल चौधरी पासी, 13 मिस्टर कालू दुसाद, 14 मिस्टर जीतू राम, 15 मिस्टर गुल्लू धोपा। उड़ीसा में जीते मूलनिवासी विधायक।। बाबू कनाई समाल, बाबू बीरा किशोर बेहेरा। बाबू निधि दास, बाबू पुनिया नैको, बाबू विश्वास नाथ बेहेरा, बाबू बीसी बिभार। मद्रास में जीते मूलनिवासी विधायक। अदिमूलम जमेदार, बालाकृष्णा कुंडूमवन के, चैनगम पिल्लई ओ, चिन्नमुथु पी,दोरैकन्नू एम, गोविंदा दोस, गुरुवुलू एस, ईश्वरा के, कादिरप्पा डी, काननान ई, कोलानदावेलु नयनार, कृष्णा कुंडूमबान एस, कुलासे करण के, कुरमायया वी, लाकेसयुमानास्वामी पी, मनीककाम आर एस, मारीईम मीयूथु एम, मारी थाई आर, मिस्टर वी आई मुनीस्वामी पिल्लई (मनीस्टर), मिस्टर बी एस मूर्ति, नागप्पा एस, नागिआह एस, पेरीया स्वामी एम पी, एम सी राजा एम एल ए, रामालिंगम ए, साहा जानानदा स्वामी ए एस, शानम...

23जनवरी।। 1937 के चुनाव में आरक्षित सीटों से बंगाल विधानसभा के लिए चुने गए विधायक।।

1937 के चुनाव में आरक्षित सीटों से बंगाल विधानसभा के लिए चुने गए विधायक। बंगाल में 285 विधानसभा सीटों का सृजन किया गया, जिन में तीस विधान सभा सीटें साहिबे कलाम मंगूराम मुगोवालिया और स्वामी अछूतानंद जी महाराज के अथक प्रयासों से आरक्षित की गई थी, जिन पर केवल और केवल अछूत जातियों के लोग ही चुनाव लड़ सके थे, इसी कारण तीस अछूत विधायक चुनें गए थे, जिन में निम्नलिखित मान्यवरों ने जीत हासिल कर के बंगाल की पहली विधानसभा में प्रवेश किया था--- 1 वर्धमान सेंट्रल:--- ये सीट अद्वेता कुमार मांझी ने 526 रुपये खर्च कर के जीती थी, उन के साथ दूसरे मोहितोश साहा ने 929 रुपये, तीसरे अरविंदा साह ने 32 रुपये, खर्च कर के चुनाव हारा था मगर तीसरे अमरेंद्र नाथ शाह ने 10 रुपये खर्च कर के नाम वापस ले लिया था, पांचवें उम्मीदवार कृष्णा चंद्र मंडल ने भी केवल 10 खर्च कर के सीट हारी थी। 2 बर्धवान नॉर्थवेस्ट:--बांकु बिहारी मंडल ने, विधानसभा वर्धमान नॉर्थ वेस्ट से 284 रुपये खर्च कर के चुनाव जीता था। सुखदेव 559 रुपये और हरिहर दास 911 रुपये खर्च कर के हार गए थे। 3 वीरहूंम:---देवेंद्र नाथ दास, आशुतोष मलिक, वीरहूंम सीट से 26...

21जनवरी।। 1970 के विधानसभा चुनाव में महाराष्ट्र में डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की पार्टी के विधायक।।

21 जनवरी।।1937 के विधानसभा चुनाव में महाराष्ट्र में डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की पार्टी के विधायक। भारत छोड़ कर जाने से पहले अंग्रेजों ने भारत में लोकतांत्रिक ढंग से राजनीति चलाने के लिए भारत में स्वायत शासन की नींव बनाने के लिए सारे देश में विधानसभाओं का गठन करने के लिए सन 1937 में चुनाव करवाए थे, जिन में भारत के कई सामाजिक, धार्मिक और राजनैतिक संगठनों ने चुनाव लड़ा था, जिस के परिणामस्वरूप विशाल पंजाब में आद धर्म मंडल, महाराष्ट्र में डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी, बिहार में जगजीवन राम ने भी डीप्रेस्ड क्लासिज लीग, युनिनिष्ठ पार्टी आदि संगठनों के माध्यम से चुनाव लड़ा गया था। डाक्टर भीम राव अंवेदकर की पार्टी:--- सन 1936 में डाक्टर भीम राव अंवेदकर ने इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी का गठन किया था। जिस में सवर्ण जातियों को भी शामिल कर के अपनी पार्टी के पदाधिकारी बना कर विधानसभा चुनाव लड़ाया गया था। इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी का चुनाव लड़ना:--- डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी ने भी सन 1937 के पहले विधान सभा में आरक्षित और अनारक्षित सीटों पर भी अपने उम्मीदवार खड़े किए...

19 जनवरी।। 1937 के चुनाव में पंजाब विधानसभा के विधायक।।

पंजाब में आदि धर्म मंडल के विजयी विधायक सन 1937 में भारतवर्ष में पहला विधानसभा चुनाव संपन्न हुआ जिसमें 1585 विधानसभाओं के लिए चुनाव सम्पन्न हुए थे, जिन में से 151 विधानसभा सीटें आरक्षित की गई थी, जिन में केवल उन्हीं लोगों को आरक्षण दिया गया था, जो केवल अछूत थे अर्थात मनुवादी उस समय जिन लोगों को स्पर्श नहीं करते थे, जिन को अस्पृश्य समझते थे, उन्हीं लोगों को अंग्रेज सरकार ने आरक्षण की व्यवस्था कर के विधानसभाओं में प्रतिनिधित्व दिया था। ये विधायक निडर हो कर अछूत जातियों की समस्याओं को विधानसभा में बड़ी विनम्रता और निडरता के साथ प्रस्तुत किया करते थे, इस का मुख्य कारण यही था, कि ये लोग मनुवादी दलों के गुलाम नहीं थे और शासक वर्ग भी अंग्रेज था। पंजाब आदि धर्म मंडल के अध्यक्ष साहिबे कलाम गद्दरी बाबा मंगू राम मुगोवालिया जी के नेतृत्व में पंजाब आदि धर्म मंडल ने विधानसभा का चुनाव लड़ाया था, जिस में पंजाब केई आठ सुरक्षित सीटों से केवल और केवल आदि धर्म मंडल के ही आठ विधायक चुने गए थे। जिन में एक आजाद विधायक शामिल हो गया था और इस प्रकार 1937 की पंजाब विधान सभा असेंबली में आदि धर्म मंडल के नौ विधाय...

18जनवरी।। वोटिंग मशीन से बोट चोरी करके मनुवादी गुलामी जारी है

वोटिंग मशीन से वोट चोरी कर के मनुवादी गुलामी जारी है। मनुवादी युरेशियन, मनुस्मृति के काले कानून कायदे थोंप कर भारत के मूलनिवासियों को गुलाम बना कर रखते आए थे मगर जब 1924 में गद्दरी बाबा मंगू राम मुगोवालिया जी ने भारत के कोने कोने में, भ्रमण कर के भारत के मालिक मूलनिवासी लोगों को मनुवादी गुलामी के बारे में जागृत कर के, विश्व का पहला आदिवासी, आदि धर्म सम्मेलन 11/12 जून 1926 को अपने ही गाँव मुगोवाल (पंजाब) में किया और घोषणा कर दी कि हम भारत कें मूलनिवासी हैं और हम सभी हिंदू नहीं हैं, हम आदि धर्म को मानने वाले आदधर्मी हैं, तब मनुवादी समझ गए कि अब तो हमारे बुरे दिन आने वाले हैं, और आ भी गए थे। आदधर्म मंडल ने अंग्रेजों से आरक्षण ले कर, भूमि और शिक्षा का अधिकार ले कर मनुवादी मनुस्मृति को दफन कर दिया, जिस से विदेशी हिंदू अंग्रेजों से चिढ़ गए मगर कुछ कर नहीं सके। सन् 1937 के चुनाव में आरक्षण:---आदधर्म मंडल ने 1937 के विधान सभाओं की कुल 1585 सीटों में से 148+3= 151सीटें आरक्षित करवा कर चुनाव में आरक्षण लागू करवा लिया था। जिन में क्षेत्रानुसार मद्रास को 215/30, सेंट्रल प्रोविन्सिस को 112/20, बॉ...

17जनवरी।। बहुजना! वर्तमान सांसद विधायक आपकी प्रतिनिधि नहीं है।

वहुजनो! वर्तमान सांसद, विधायक आप के प्रतिनिधि नहीं। गद्दरी बाबा मंगू राम मुगोवालिया ने सन 1924 ईस्वी में भारत के गुलामों के गुलाम मूलनिवासियों को आजाद करवाने के लिए अंग्रेजों को कई बार मेमोरेंडम दिए थे कि हम दोहरी गुलामी में जिंदगी जी रहे हैं। पहली बार जब लार्ड साईमन कमीशन भारत में आया था, तो उन्होंने लाहौर में मेमोरेंडम सौंपते हुए कहा था कि हमें जमीन और जायादात रखने का कोई अधिकार नहीं है। नौकरी करने का कोई अधिकार नहीं है, यहां तक कि अछूतों को पढ़ने, लिखने और बोलने की भी आजादी नहीं है। जिस रिपोर्ट को लार्ड साईमन ने गुलाम भारत के शासक वर्ग ब्रिटिश सरकार को सौंप कर, गद्दरी बाबा मंगू राम मुगोवालिया जी की मांगों को ब्रिटिश प्रधानमंत्री लॉर्ड मैंकनाडल्ड को प्रस्तुत किया था, जिस के परिणामस्वरूप ही, उस मांग पत्र की सचाई को जानने के लिए दूसरा कमीशन लार्ड लोथियन की अध्यक्षता में सन 1932 ईस्वी में भारत आया था, जिस के सामने फिर गद्दरी बाबा मंगू राम गोवालिया ने अपनी दोहरी गुलामी के प्रमाण प्रस्तुत करते हुए सिद्ध किया था, कि हम गुलामों के गुलाम हैं, इसीलिए लंबी लड़ाई लड़ने के बाद भारत के मूलनिवासि...

16 जनवरी।। झुग्गी झोपड़ियों में रहने वालों का खून चूसा जाता है।।

झुग्गी, झोंपड़ियों में रहने वाले का खून चूसा जाता है। झुग्गी झोपड़ियों में रहने वाले मजदूरों की महानता और कुर्बानी किसी भी लेखक, कवि को नजर नहीं आती है। सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी ने मजदूरों की दुर्दशा और उन के जीवन के बारे में लिखने का साहस किया था। उन्होंने मजदूर की फटी नियति का चित्रण करते हुए लिखा था, पेट पीठ दोनों मिल कर एक, चल रहा लकुटिया टेक! ऐसा लिखने का खामियाजा उन को यह भुगतना पड़ा कि वे सारी आयु नंगे, भूखे और विपन्न रहे। मजदूर नंगा, भूखा रहता है, जिस के कारण मजदूर इतना कमनीय हो जाता है, कि उस का अपना पेट और पीठ आपस में मिल कर एक ही बन जाते हैं। सर्वोच्च कवि निराला बेटी की शादी नहीं कर सका:--अपनी एकमात्र बेटी की शादी करने के लिए भी निराला जी के पास कौड़ी तक नहीं थी, जिस के कारण उन को अपनी बेटी बिना शादी की रश्मों को पूरा किये ही एक विद्वान लेखक को सौंपना पड़ा था। ऐसा मेरा भारत महान है कि जो असहाय नंगे, भूखे लोगों की दुर्दशा का पर्दाफाश कर के महान भारत के अन्यायी राजनेताओं की पोल खोल के रख दे, उस को भी भूखे ही मरना पड़ता है, ऐसे कवियों और लेखकों के साहित्य को कोई पढ़ना पसंद...

15 जनवरी।। क्रांतिकारी वीरांगना फूलन देवी।।

मनुवादी दुर्गाओं के शरीर अस्त्रों-शस्त्रों से लदे पड़े हैं, जिन्होंने भारत के मूलनिवासी शासकों को छल-बल कर के मारा था। इन नारियों ने, नारी जाति को कलंकित करने के लिए आत्महत्या कर के मनुवादी शासन कायम करने के लिए निरीह, सत्यवादी, दानवीर मूलनिवासी राजा बलि महाराज, महिषासुर आदि को मार कर सुरों ( शराब पीने वालों का, नशेड़ियों का राज )राज स्थापित किया है, जो आज भी जारी है। मूलनिवासी औरतों को ये मनुवादी अपनी हबस का शिकार बना कर हबस तो पूरा करते ही हैं मगर कानून के भय से मूलनिवासी कन्याओं को बड़ी क्रूरता से हत्या कर के मुख्यमन्त्रियों और मंत्रियों की सह पर रात के अंधेरे में ही जलवा देते हैं। यदि मूलनिवासी कन्याओं को अपनी अस्मत की रक्षा करनी है, तो वीरांगना फूलन देवी बनो ताकि भेड़िये आक्रमण कर ही ना सकें। फूलन देवी का जीवन परिचय:--- फूलन देवी का जन्म 10 अगस्त 1963 में उत्तर प्रदेश के जालौन जिले के घूरा का पुरवा नामक छोटे से गांव में गरीब परिवार मल्लाह जाति में हुआ था। उसके पिता का नाम देवी दीन मल्लाह और माता का नाम मूला देवी था। फूलन देवी के साथ अत्याचार:--- जब फूलन देवी 15 वर्ष की हुई तब गा...

14जनवरी।। सामाजिक गुलामी से मूलनिवासी स्वतंत्र क्यों नहीं हो रहे?

14 जनवरी सामाजिक गुलामी से मूलनिवासी स्वतंत्र क्यों नहीं हो रहे? जब यूरेशियन आर्यों ने भारतवर्ष मैं प्रवेश किया था, तब भारत की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक, सभ्यता उन्नति की चरम सीमा पर थी। कोई किसी का गुलाम नहीं था, कोई किसी का शोषण नहीं करता था, भारतवर्ष को सोने की चिड़िया कहा जाता था और इसी सोने की चिड़िया को लूटने के लिए यूरेशियन लोग भारतवर्ष में आए थे और छल बल से भारत के मूलनिवासियों को पूर्णरूपेण अपना गुलाम बना लिया था, इस गुलामी से कोई विद्रोह ना करे, उस के लिए इन्होंने भारत के मूलनिवासियों को हिप्नोटाइज करने के लिए ऐसे ऐसे मूलमंत्र तैयार किए, जिन में सब से पहला हथियार अनपढ़ता का प्रयोग किया गया। मूलनिवासियों की गुलामी का दूसरा हत्थियार:---- भारत के मूलनिवासियों की शिक्षा खत्म करने के बाद दूसरा औजार आत्मा-परमात्मा, स्वर्ग-नरक और पुनर्जन्म को बनाया गया, जिन का खौफ पैदा कर के सारी जनता को फिर हिप्नोटाइज कर दिया गया। वर्षों तक चले इस छल-कपट ने, बुद्धिमान, सुसंस्कृत मूलनिवासियों को मूर्ख, अंध भक्त बना दिया और जो तत्कालीन मुल्लों, पादरियों, तिलकधारियों ने उन के दिमाग में ई...

13जनवरी।। भारत में दास, दासतागुलामी

13जनवरी।। भारत में दास, दासता और गुलामी।। विश्व के हर देश में दास, दासता और गुलामी शब्द प्रयोग किए जाते हैं, जिस से ज्ञात होता है कि हर देश में गरीब, अमीरों के गुलाम होते आए हैं क्योंकि दास शब्द केवल उन लोगों के लिए ही प्रयोग किया जाता है, जो अमीरों के पास सेवा करते हैं और उसके बदले में उन को कुछ नहीं दिया जाता है, सुप्रसिद्ध ग्रीक लेखक मेगस्थनीज ने इंडिका में लिखा हुआ है कि, मौर्य साम्राज्य में दास शब्द प्रतिबन्धित था। मौर्य साम्राज्य में दास शब्द क्यों प्रतिबन्धित था:--- वास्तव में आदिकाल से ही भारत की धरती के ऊपर आदर्श शासकों का शासन चलता आ रहा था, जिस में कोई भी ऊंच-नीच, जातिवाद धर्मबाद, छुआछूत नहीं थी, कोई भी किसी की सेवा नहीं करता था, कोई किसी की नौकरी चाकरी नहीं करता था। जिस प्रकार सेवा निवृत पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा अपने परिवार का पालन पोषण करने के लिए स्वयं भी और परिवार भी मेहनत कर के अपनी कमाई से अपना जीवन जी रहे हैं, वैसे तब भारत के शासक खुद अपना परिवार पालते थे, जैसे ही विश्व में आदमी आदमी से श्रेष्ठ बन कर रहने लगा तब से ही श्रेष्ठ, संपन्न और उच्च पदाधिकारी अपनी सेवा क...

12जनवरी।। भारतीय मूलनिवासी गुलामी की पृष्ठभूमि।।

12 जनवरी।। भारतीय मूलनिवासी गुलामी की पृष्ठ भूमि।। आद, जुगाद से चली शासन व्यवस्था भारत की धरती के ऊपर करोड़ों वर्षों तक चलती आ रही थी, जिस के अंत में सम्राट शिव का शासन था, इसी समय तेल और वर्फ से त्रस्त अरब और यूरोप के नंगे भूखे मरने वाले लोगों को, जब भारत के मूलनिवासी लोगों के ऐश्वर्य संपन्न जीवन के बारे में पता चला था, तब वे भारत की तलाश में बाँसों के बेड़े बना कर के उन के ऊपर बैठ कर सागरों को पार करते हुए धरती पर बने स्वर्ग भारत की ओर चल पड़े थे, जिस के पहले झुंड का नेतृत्व ब्रह्मा नामक यूरेशियन कर रहा था। ब्रह्मा शब्द की व्युत्पत्ति अब्राहम शब्द से हुई है, जो बर्फ से ढके गोरे लोगों का पैगंबर था। उसी के वंशज भारत में आते गए थे। इन घुसपैठियों ने अब्राहम के स्थान पर अपने नेता का नाम ब्रह्मा रख लिया था, जिस के नेतृत्व में इन लोगों ने सिंधु नदी के दोनों ओर डेरे डालें और रात के समय में भारत के मूलनिवासियों को लूट कर, मार कर अन्न-धन इकट्ठा करके जीवन जीने लगे। जिस तरह जवाहर लाल ने डिस्कबरी आफ इंडिया में लिखा है कि कबीले आते गए और कारवां बनता गया, उसी आधार पर उन्होंने भारत के शासकों को मा...

11जनवरी।। भारत में सामाजिक गुलामी के कारण।।

11 जनवरी।। भारत में सामाजिक गुलामी के कारण।। भारत में गुलामी क्यों है? भारत में 15% लोगों ने 85% लोगों को गुलाम बना कर रखा हुआ हैं मगर यह गुलामी क्यों है? इस के क्या कारण है? इस पर गुलाम लोग चिंतन नहीं करते हैं और गुरु रविदास जी महाराज, गुरु कबीर और साहिब कांशीराम जैसे क्रांतिकारी महापुरुषों ने चिंतन किया भी तो इन गुलामों ने उन का साथ भी नहीं दिया, जिसके कारण ये लोग गुलाम बने हुए हैं भारतीय मूलनिवासी गुलाम कैसे हुए:--- सम्राट शिव के पतन के बाद यूरेशियन लुटेरों ने भारत की सभ्यता और संस्कृति को नष्ट कर दिया था और इस देश के मूलनिवासियों को गुलाम बना कर इन की शिक्षा व्यवस्था को ध्वस्त कर दिया था, उन को पढ़ने लिखने पर प्रतिबंध लगा दिए थे। ग्राम स्तर पर मूलनिवासियों को आत्मा-परमात्मा, स्वर्ग-नरक, ऊंच-नीच और छुआ-छूत का पाठ पढ़ा कर मानसिक रूप से सम्मोहित कर के अपने वश में कर लिया। कालांतर में लोगों ने छुआछूत को अपनी नियति स्वीकार कर लिया, जिस के कारण भारत के मूलनिवासी सामाजिक रुप से यूरेशियन के गुलाम बन गए। यह कथा तो तीन चार हजार साल पुरानी है। डकैत मुहम्मद बिन कासिम:-सातवीं शताब्दी में अरब...

9 जनवरी।। भारत की न्यू एजुकेशन पालसियाँ

भारत की न्यू एजुकेशन पौलिसियाँ।। मोहनजोदड़ो हड़प्पा, सिंधु घाटी, राखीगढ़ी की खुदाइयों में जिन सभ्यताओं के अवशेष मिले हैं, उन से ज्ञात होता है कि उन के समय उच्च स्तर का शिक्षा तंत्र था। अनेकों प्रकार के आभूषण, बर्तन, विशाल शहरों का निर्माण तत्कालीन शिक्षा व्यवस्था के ही परिणाम थे, यदि उस समय शिक्षाविद्ध और वैज्ञानिक ना होते तो ये खोजें नहीं हो सकती थी। वर्तमान काल में भी निर्माण कार्य इंजीनियरों द्वारा करवाए जा रहे हैं और प्रोफेसर, डाक्टर, शिक्षा व्यवस्था के कारण ही बन पा रहे हैं, इसलिए युरेशियन लोगों के आने से पहले ये सब खोजें हो चुकी थी और शिक्षा का भी प्रचार प्रसार हो चुका था। तत्कालीन खोजों से ज्ञात होता है कि भारत के मूलनिवासियों की शिक्षा व्यवस्था वर्तमान शिक्षा व्यवस्था से हजारों गुना अधिक बेहत्तर और उन्नत थी मगर वर्तमान मनुवादी एजुकेशन पॉलिसियाँ केवल मात्र मनुवादी शिक्षा शास्त्रियों के पेट भरने और उन के ऊपर धन खर्च करने के सिवाय कुछ नहीं है। ये लोग एनसीआरटी के शीशे के महलों में बैठ कर के न्यू एजुकेशन पॉलिसियाँ बनाते हैं, जिन को धरातल पर लागू करना बड़ा मुश्किल है और ये नीतियां ...

8 जनवरी।। भारत में आदमी की पहचान जाति प्रमाण पत्र।।

8 जनवरी।।भारत में आदमी की पहचान जाति प्रमाण पत्र।। ब्राजील शहर मन को लुभावने वाले समुंदरों के किनारों पर घूमने का आनंद दिलाने वाला प्रसिद्ध शहर है, मलेशिया चाय के मन मोहक बाग़ानों के सौंदर्यों की पहचान के लिए विश्व में प्रसिद्ध है। सिंगापुर शाम के समय होने वाली चकाचौंध से भरे नजारों को देखने के लिए प्रसिद्ध है। स्वीटजरलैंड अपने अदभुत नजारों के लिए प्रसिद्ध है, जिस का दुनिया में कोई बराबरी नहीं करता है। संसार में अमेरिका की साल्ट लेक सिटी यूटा देखने के लिए प्रसिद्ध है। अलास्का की खाड़ी के सुंदर नजारे आनंद के सागर में डुबो देने के लिए प्रसिद्ध हैं। स्कॉटलैंड के हरे भरे पहाड़ों की सैर मनुष्य को सदा सदा के लिए अपना बना लेने के लिए प्रसिद्ध है। समुद्र की अथाह गहराईयों में तैरती हुई मछलियों के दृश्य देखने के लिए स्पेन सारी दुनिया में प्रसिद्ध है। वेनिस अपनी सुंदरता के लिए इतना प्रसिद्ध है कि उस को अद्वितीय कहा जाता है, जिसे परीलोक भी कहा जाता है। फ्रांस की राजधानी पेरिस सीन नदी और इस पर बने पुलों के नजारों को देखने के लिए प्रसिद्ध है। भव्य नदी टैगस के नीचे बनी पहाड़ियों से शानदार पहाड़ियों ...

7 जनवरी।। वर्तमान शासक गरीब भारतीयों का खून चूस रहे हैं।।

।।वर्तमान शासक गरीब भारतीयों का खून चूस रहे हैं।। वर्तमान शासक गरीब भारतीयों के खून पसीने को चूस रहे हैं, वह भी समय ही था जब अखंड भारतवर्ष के शिव और गौरजां जैसे शासक अपना पेट भरने के लिए स्वयं खेतों में हल चला कर के अनाज पैदा करते थे, पशुपालन करते थे और अपने परिवार का निर्वाह स्वयं मेहनत मजदूरी कर के किया करते थे। कोई भी शासक जनता से टैक्स इकठ्ठा कर के मौज मस्ती से अपना जीवन व्यतीत नहीं करता था, इसी तरह जनता भी खेतों में कड़ी मेहनत कर के ही अपने परिवार का भरण पोषण किया करती थी, कोई किसी के ऊपर भार बन कर नहीं जीता था। 1947 तक वेतन भत्ते:----सन 1947 तक विधायकों को कोई भी वेतन, भत्ते नहीं मिलते थे। विधायकों को समाज सेवक कहा जाता था और जो लोग समाज सेवा किया करते थे, वे समाज सेवा के बदले में कुछ नहीं लेते थे। जब सन 1936 में पहले विधानसभा चुनाव हुए तो उस समय विधायकों को किसी प्रकार का कोई वेतन नहीं मिलता था, पंचों, सरपंचों की बात तो दूर रही। स्वतंत्रता के बाद वोटर की जेब लूटी जाने लगी, जैसे ही भारत स्वतंत्र हुआ, वैसे ही जनता द्वारा चुने गए सांसद और विधायक सरकारी नौकर हो गए और अपनी जेबैं भरन...

5 जनवरी।। दनुज, दानव, राक्षस और असुर कौन??

!!! दनुज, दानव, राक्षस और असुर कौन? आदिकाल से प्राणी जगत का धरती के ऊपर पदार्पण हुआ है। आदि पुरुष ने जिन जिन प्राणियों को जिस रूप में बनाया है, वे प्राणी उसी रूप में धरती के ऊपर जीवन व्यतीत करते आ रहे हैं। पशु, पक्षी और वनस्पति का रंग रूप सारे विश्व में एक जैसा ही है, उन में किसी में भी कोई परिवर्तन नहीं हुआ है, किसी के सिर पर ना तो सींग उगे हुए हैं और ना ही किसी पशु के सींग गिरे हैं। किसी भी पक्षी के ना तो पंख बदले हैं और ना ही समाप्त हुए हैं, मगर केवल भारतवर्ष में ही मनुष्य को सींग उगे हुए थे, जब कि यूरोप, अरब देशों में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं हुआ है और ना ही किसी का इतिहास मिलता है। राक्षस का शाब्दिक अर्थ:--- *रक्ष* धातु से राक्षस शब्द की व्युत्पत्ति हुई है, जिस का अर्थ होता है रक्षा करना। जब आदि पुरुष द्वारा सृजित प्रकृति के प्राणियों के स्वामी मनुष्य ने मनुष्य के साथ अन्याय, अत्याचार और अपराध करने शुरू किये थे, तब तत्कालीन सम्राट जुगाद, नील, कैल, चंडूर, मंडल, कैलास और सम्राट सिद्धचानो जी महाराज को अपराधियों से भोलेभाले मनुष्यों की रक्षा के लिए, जिन योद्धाओं को रक्षा करने के लिए नियु...

4 जनवरी।। मजदूरों का खून चूसने वाले देवता।।

मजदूरों का खून चूसने वाले देवता! मजदूर कौन हैं:---- विश्व में दो प्रकार के लोग रहते हैं, एक परजीवी और दूसरे स्वजीवी। परजीवी वे आदमी हैं जो दूसरों की कमाई पर पलते हैं और स्वजीवी वे लोग होते हैं जो अपनी कमाई पर जीवन जीते हैं। जितने भी स्वजीवी लोग हैं, वे ही किसी देश की रीढ़ की हड्डी हैं, जिन को ही मजदूर कहते हैं मगर जो लोग परजीवी हैं अर्थात दूसरों की कमाई पर जीवन जीते हैं। भारत के आदिवासी स्वजीवी थे:--- आदिकाल से भारतवर्ष में आदिवासी साम्राज्य चलता आया है, जिस के शासक जनता को टैक्स लगा कर अपना पेट नहीं भरते थे, वे खुद खेतीबाड़ी करते थे, पशु पालन करते थे और अपनी हक हलाल की कमाई खाते हुए राज करते थे, वे शासक स्वजीवी थे मगर जब से विदेशी यूरेशियन भारत में घुसे हैं, तब से उन्होंने भारत के मूलनिवासी लोगों को अपना गुलाम बनाया हुआ हैं और यही मूलनिवासी इन निठ्ठलों का पालन पोषण करते आए हैं, जिन को परजीवी कहा जाता है। स्वजीवी अपनी हक हलाल की कमाई खाते हैं और परजीवी स्वजीवियों का खून चूसते हैं। मजदूर क्यों बना हुआ है:--- यूरेशियन आक्रांताओं ने भारत के मूलनिवासी लोगों की धन, धरती को छीन कर निहत्थ...