भारत का राष्ट्रपति अन्याय का प्रतीक!!!
भारत का राष्ट्रपति अन्याय का प्रतीक!!!
भारत के संविधान का महत्व :--- भारत का संविधान इसलिए बनाया गया है, ताकि भारत का शासन सुनियोजित और सुचारू रूप से चलाया जा सके, जिस से भारत के नागरिकों को न्याय, रोटी, कपड़ा और मकान मिल सके, किसी के साथ किसी प्रकार का कोई भेदभाव ना हो सके और शासन-प्रशासन पर पूरी निगरानी रखने के लिए एक और सर्वोच्च पद का सृजन किया गया था, जिसे "राष्ट्रपति" कहा जाता है
संविधान में शक्तियों का बंटबारा किया हुआ है:--- संविधान में शासन और प्रशासन को चलाने के लिए सरकार के तीन अंग बनाए गए थे, जिन को पूर्णरूपेण स्वशक्ति संपन्न बनाया गया है, ताकि एक अंग दूसरे अंग के अधिकारों का अतिक्रमण ना कर सके।
विधानपालिका:--- भारत के शासन और प्रशासन को चलाने के लिए जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों की विधानपालिका का गठन किया गया है, जो भारत की जनता की सुख सुविधाओं के लिए विधान (कानून) बना कर के समान रूप से भारतवासियों को अन्याय, अनाचार, अत्याचार, व्यभिचार, बलात्कार भ्रष्टाचार ऊंच-नीच, छल-कपट, बेईमानी, शोषण, छुआछूत को रोक कर समतामूलक जीवन जीने की व्यवस्था करे।
न्यायपालिका:---जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों द्वारा जनता की सुख सुविधा के लिए जो कानून बनाए जाते हैं, उन को न्याय और समतापूर्वक, बिना किसी भेदभाव के, कानून की तर्कसंगत व्याख्या कर के देश में लागू कराने के लिए जिस अंग का गठन किया गया है, उसे न्यायपालिका कहा गया है मगर आजादी के बाद न्यायपालिका केवल विधानपालिका के काले निर्देशों को लागू करने वाला तंत्र बन कर रह गया है। विधानपालिका द्वारा बनाए गए कानूनों को विधानपालिका ही लागू करने में रोड़े अटकाती है मगर न्यायपालिका अपने अधिकारों को समझती हुई भी विधानपालिका के निर्देशों, आदेशों के अनुसार ही अपना कार्य करती आ रही है, जिस से भारतवासियों को न्याय नहीं मिल पा रहा है। न्यायधीश केवल विधानपालिका के नौकर बन कर कार्य करते जा रहे हैं।
कार्यपालिका:--- संविधान के अनुसार विधानपालिका और न्यायपालिका के निर्देशानुसार कार्य करने वाले सरकारी अंग को कार्यपालिका कहा गया है। लोकतंत्र का यह अंग विधानपालिका द्वारा पारित कानूनों के अनुसार ही प्रशासन चला सकता है मगर आज यह अंग केवल मात्र विधानपालिका का गुलाम बन कर के रह गया है। जिस प्रकार विधानपालिका और न्यायपालिका, कार्यपालिका को आदेश देती हैं, कार्यपालिका भी उसी के अनुसार काम करती है, चाहे इन अंगों के निर्णय अन्यायपूर्ण ही क्यों ना हों? जिन से राजनीतिक दलों के निर्णय के अनुसार ही जनता को सुखी कम और दुखी अधिक रखा जा रहा है।
तीनों अंगों द्वारा गरीब जनता पीसी जा रही:--- भारत का लोकतंत्र जनता के लिए अलोकतंत्र बन चुका है क्योंकि लोकतंत्र को चलाने वाली विधानपालिका के राजनेता ही संविधान की हत्या कर के लोकतंत्र की धज्जियां उड़ाने के लिए न्यायपालिका और कार्यपालिका को विवश करते आ रहे हैं। ये राजनीतिक दल अपने प्रतिद्वन्दियों को सबक सिखाने के लिए न्यायपालिका और कार्यपालिका के ऊपर अपना दबाव बना कर, उन को किसी ना किसी बहाने जेल में बंद कर के वर्षों तक जेलों में ही सड़ने के लिए विवश करते आ रहे हैं, जिन की कोई दलील-अपील भी सुनी नहीं जाती है, यहां तक कि लाखों लोग जेल की काल कोठरी और सलाखों के पीछे बंद पड़े हैं। विधानपालिका उन के लिए काल सावित हो रही है।
अन्याय की जड़ राष्ट्रपति :-भारत के संविधान में सर्वोच्च पद राष्ट्रपति बनाया गया है, सर्वशक्तियों का प्रयोग करने वाले इस पद को सर्वशक्तिमान घोषित किया गया है मगर सर्वशक्तिमान होने के बावजूद भी राष्ट्रपति जनता को न्याय दिलाने की अपेक्षा अन्याय ही दिलाता आ रहा है। आज तक किसी भी राष्ट्रपति ने विधानपालिका और न्यायपालिका के अपराधियों के विरुद्ध कभी कोई कार्यवाही नहीं की है। अनेकों राजनैतिक मर्डर हो चुके हैं, ईमानदार लोगों को मारा जा चुका है मगर उन्हें न्याय तो क्या मिलना, उन का नाम तक मिटा दिया गया मगर राष्ट्रपतियों ने निष्पक्ष हो कर के उन के विरुद्ध रचे गए षडयंत्रों को उजागर करने के लिए कभी भी अपनी शक्तियों का प्रयोग नहीं किया है, जिस के कारण भारत का लोकतंत्र श्मशान घाट बन चुका है। अरबों-खरबों रुपयों के घोटाले करने वाले राजनेता ऐश्वर्या की जिंदगी जी रहे हैं मगर जो शासक-प्रशासक, कर्मी ईमानदारी, बहादुरी, धर्म, ईमान और निष्ठा से अपनी सेवाएं देते आ रहे हैं उन के साथ सम्मानजनक व्यवहार तो दूर रहा है, ऐसे लोगों के ऊपर कई प्रकार की अनुशासनात्मक कार्यवाईयां कर के दंडित तक किया जा रहा है, इसलिए राष्ट्रपति पद भारत के लोकतंत्र के विनाश का कारण बन चुका है, जिस पार्टी का राष्ट्रपति होता है, वह उस पार्टी के अन्यायपूर्ण निर्णयों को अन्यायपूर्ण ढंग से लागू करवाता आ रहा है मगर अन्याय के खिलाफ तनिक भी मुँह नहीं खोलता है। वर्तमान राष्ट्रपति द्रोपती मुर्मू जी ने केवल संकेतों में ही अत्याचारों के खिलाफ कहने की हिम्मत की है।
न्यायपालिका विवश:--यदि न्यायपालिका, विधानपालिका के अपराधियों को दण्डित कर दे तो उसे ही परेशानी खड़ी कर दी जाती है, जिस से बचने के लिए विधानपालिका राष्ट्रपति द्वारा अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करवा कर अपनी पार्टी कें नेताओं और सरकार को बचाती है। राष्ट्रपति कभी भी इन लोगों के खिलाफ कोई निर्णय नहीं देता है, यदि सुप्रीमकोर्ट के न्यायाधीश कोई उचित फैसला कर भी दें तो राष्ट्रपति उस को लागू करने नहीं देता है, इस प्रकार राष्ट्रपति भारत के संविधान का गला घोंटता आ रहा है। किसी को भी न्याय नहीं मिल पा रहा है, यहाँ तक कि राष्ट्रपति खुद के लिए भी न्याय नहीं ले पाता।
विधानपालिका वोटरों को खुश करने के लिए कानून तो अवश्य बनाती है मगर विधानपालिका ही, न्यायपालिका द्वारा लागू नहीं करवाती है, जिस प्रकार पचासिवां संविधान संशोधन का निर्णय है, जो भारत के लोकतंत्र की हत्या ही है, इसलिए यह पद समाप्त कर दिया जाना चाहिए या अमेरिका की तर्ज पर सशक्त किया जाए।
रामसिंह आदवंशी।
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