16 जनवरी।। झुग्गी झोपड़ियों में रहने वालों का खून चूसा जाता है।।
झुग्गी, झोंपड़ियों में रहने वाले का खून चूसा जाता है।
झुग्गी झोपड़ियों में रहने वाले मजदूरों की महानता और कुर्बानी किसी भी लेखक, कवि को नजर नहीं आती है। सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी ने मजदूरों की दुर्दशा और उन के जीवन के बारे में लिखने का साहस किया था। उन्होंने मजदूर की फटी नियति का चित्रण करते हुए लिखा था, पेट पीठ दोनों मिल कर एक, चल रहा लकुटिया टेक! ऐसा लिखने का खामियाजा उन को यह भुगतना पड़ा कि वे सारी आयु नंगे, भूखे और विपन्न रहे। मजदूर नंगा, भूखा रहता है, जिस के कारण मजदूर इतना कमनीय हो जाता है, कि उस का अपना पेट और पीठ आपस में मिल कर एक ही बन जाते हैं।
सर्वोच्च कवि निराला बेटी की शादी नहीं कर सका:--अपनी एकमात्र बेटी की शादी करने के लिए भी निराला जी के पास कौड़ी तक नहीं थी, जिस के कारण उन को अपनी बेटी बिना शादी की रश्मों को पूरा किये ही एक विद्वान लेखक को सौंपना पड़ा था। ऐसा मेरा भारत महान है कि जो असहाय नंगे, भूखे लोगों की दुर्दशा का पर्दाफाश कर के महान भारत के अन्यायी राजनेताओं की पोल खोल के रख दे, उस को भी भूखे ही मरना पड़ता है, ऐसे कवियों और लेखकों के साहित्य को कोई पढ़ना पसंद नहीं करता है क्योंकि पढ़ने वाले शोषक मजदूरों का खून चूसने वाले ही होते हैं, उनके जेहन में गरीबों, मजदूरों की दुर्दशा को पढ़ने की फुर्सत ही नहीं होती है, जबकि सारे देश ही नहीं सम्पूर्ण विश्व का नवनिर्माण केवल मजदूर ही करता है।
नव निर्माण का आधार मजदूर:--- विश्व के हर कोने में जा कर के देख लीजिए कि जितने में नवनिर्माण किए जा रहे हैं, उन को केवल और केवल झुग्गी-झोंपड़ियों में नारकीय जिंदगी जीने वाले मजदूर ही कर रहे हैं।
सरकारें और अमीर मजदूरों का खून चूस रहे हैं:--- भारतवर्ष ही एक ऐसा देश है जहां मनुवादी सरकारें और शासन-प्रशासन मजदूरों को मात्र तीन सौ रुपये मजदूरी दे कर के उन के खून पसीने की कमाई को खा रहे हैं और उन की कमजोर हड्डियों के ऊपर अपनी रोटियां सेंक रहे हैं मगर इन हैवानों को उन लोगों के ऊपर कोई तरस नहीं आता है, जो गंदी नालियों, छपड़ों तालाबों और नदियों के किनारे झुग्गी-झोपड़ी में जीवन जी कर के अपने बच्चों को को निरक्षर रख कर भारत का नव निर्माण करते आ रहे हैं, यदि मजदूर एक दिन काम पर ना आए तो लोगों में हाहाकार मच जाती है और तुरंत गाड़ियों में बैठ कर के मजदूरों के अड्डों के ऊपर पहुंच जाते हैं और मजदूरों को अपनी गाड़ी में बैठा कर के अपने नवनिर्माण कार्य को करवाना शुरू करते हैं।
मजदूरों को झुग्गी झोपड़ी में क्यों रखा जाता है:---मनुवादी समझते हैं कि यदि गरीबों, मजलूमों, मजदूरों और शोषितों को पढ़ा-लिखा करके शिक्षित कर दिया गया तो फिर मजदूरी कौन करेगा क्योंकि 80% लोग केवल मजदूर ही हैं जो विभिन्न प्रकार के व्यवसायों को करके अपना भरण पोषण करते हैं और अमीरों के सभी प्रकार के काम कर के उन को ऐश्वर्याशाली जीवन जीने का प्रबंध करते हैं, इसलिए गरीब, मजलूम मजदूरों और शोषितों को जानबुझ् कर, गरीब, खानाबदोश रख कर के उन के साथ आर्थिक, सामाजिक, मानसिक और शारीरिक अत्याचार किए जाते हैं। आर्थिक रूप से कमजोर रख कर शोषण किया जा रहा है।
सरकारी स्कूलों में केवल साक्षर किया जा रहा है:--- गरीब मजदूरों को भारत के मनुवादी जानबूझ कर सरकारी स्कूलों में केवल मात्र साक्षर करते आ रहे हैं और अपने बच्चों के लिए डीएवी जैसे उच्च स्तर के शिक्षा संस्थान खोल कर अंग्रेजी भाषा में शिक्षा देते आ रहे हैं मगर गरीबों, वंचितों, शोषितों के बच्चों को ना तो अच्छा पाठ्यक्रम और ना ही पूरे टीचर दिए जाते हैं। कहीं कहीं तो पांच कक्षाओं को पांच टीचर भी नहीं दिए जाते हैं ताकि एक टीचर दो-तीन तीन कक्षाओं को पढ़ा कर के उन को पूर्ण ज्ञान दे ही ना सके।
मजदूरों को जल, जंगल, जमीन से वंचित रखा गया है:-- भारत के बेईमान शासक गरीब मजदूरों को भूमिहीन रख कर बंधुआ मजदूरों की तरह प्रयोग करते आ रहे हैं। गरीब भूमिहीनों को भूमि इसलिए नहीं दी जाती है ताकि वे कर्मठ लोग अपनी भूमि में अन्न-धन पैदा कर के कहीं अमीर ना हो जाएँ और करूर मनुवादियों की मजदूरी करने के लिए बे इंकार ना कर दे, उन की गंदी नालियों, सड़कों और घरों को साफ करने के लिए कोई नहीं मिलेगा। सारे नवनिर्माण कार्य, सारी गंदगी को साफ करने के लिए स्वयं काम करना पड़ेगा इसलिए जल, जंगल और जमीन को बेकार रख कर के अरबों खरबों का राष्ट्रीय नुकसान सहन करते आ रहे हैं मगर गरीबों, भूमिहीनों को पेट भरने के लिए भूमि उपलब्ध नहीं करवाई जाती है
भारतीय मजदूर संगठित नहीं है:--- मजदूरों की दुर्दशा का कारण उन की अपनी ही मूर्खता है। ये लोग कभी भी ईमानदार नेता चुन कर संगठन नहीं बनाते हैं, जो संगठन बने हुए भी हैं, उन के नेता कांग्रेस, बीजेपी और कम्युनिस्ट आदि मनुवादी दलों के दलाल बन कर के अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं और मजदूरों को खूंखार भेड़ियों की भूख का शिकार होने देते हैं, यदि मजदूर पार्टी विहीन अखिल भारतीय मजदूर संगठन की स्थापना कर लें तो फिर कोई मजदूरों का शोषण नहीं कर सकता है।
भारत में मजदूरों का सशक्त सशक्त नेतृत्व चाहिए:-- भारत के सभी जातियों के अमीर लोग मजदूरों का शोषण कर के ही अमीर बने हुए हैं। गरीबों को सरेआम लूटा जाता है, शोषण किया जाता है, बलात्कार किया जाता है, अन्याय, अनाचार, और अत्याचार किए जाते हैं मगर इन को कहीं कोर्ट कचैहरियों में भी न्याय नहीं मिलता!
मजदूर सशक्त संगठन बनाएं तो समस्या हल हो सकती:--- यदि मजदूर अपना ईमानदार, सशक्त नेतृत्व तैयार कर के राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत संगठन बना कर अपने अधिकारों की सुरक्षा के लिए संघर्ष करें तो कोई भी मजदूरों का शोषण नहीं कर सकेगा, मजदूर जो मजदूरी मांगेगा सरकार और अमीर देने के लिए विवश हो जाएंगे और ये लोग नारकीय जीवन जीने से सुरक्षित हो जाएंगे।
सरकारों और अमीरों को भी मजदूर क्रांति से बचने के लिए, तत्काल शोषण बंद कर देश चाहिए!
रामसिंह आदवंशी।
परदेश महासचिव,
वहुजन मुक्ति पार्टी हिमाचल प्रदेश।
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