30जनवरी।। हाय हाय रिश्वतखोर डायन खाए जा रही।।

हाय हाय रिश्वतखोर डायन खाय जा रही!!! मजदूर के शरीर की हड्डियों को गिना जा सकता है, उस के पेट पीठ को एक डंडे की तरह बना हुआ देखा जा सकता है, मुख पर झुर्रियाँ जवानी में ही हिलोरें मारती हुई नजर आती है मगर फिर भी वही कोहलू के बैल की तरह दिन रात मजदूरी करता ही जाता है। शाम को मन मसोस कर, रूखी सूखी खा कर वच्चों के साथ सो जाता है, प्रात:फिर वही कन्धे पर खून चूसने वाले की पंजालि उठा लेता है और कोहलू में जुत जाता है, इसी तरह मजदूरी के कोहलू में जीवन की शाम भी आ जाती और उस के अंधेरे में लुप्त हो जाता मगर वह फिर अपने बेटों को अपनी जगह तैनात कर के, खून पीने वाले राक्षसों के हवाले कर जाता है, यही मजदूर के परिवार की नियति चलती रहती है, किसी भी शासक को मजदूर के अस्थि पिंजरों पर तरस नहीं आता कि उसे भी इंसान की सुविधाएं दे कर इंसान की जिंदगी जीने का अवसर दिया जाए। राजनेता रिश्वत खा रहे:---जिन शासकों से मजदूरों, मजलूमों, गरीबों, किसानों को न्याय की आशा होती है, वही अन्यायी और लुटेरे हों तो फिर किस से न्याय की उम्मीद की जा सकती है। नौकरी लेनी हो तो रिश्वत, ठेका लेना हो तो रिश्वत, स्थानांतरण करवाना हो तो रिश्वत, कोई भी काम किसी नेता से करवाना हो तो रिश्वत, बस रिश्वत, रिश्वत, रिश्वत जिंदावाद, ईमानदारी मुर्दावाद, होती जा रही है। अफसर रिश्वत खा रहे:--- जब तक रिश्वतखोर को रिश्वत नहीं दी जाए तब तक वे काम नहीं करते, बड़े बड़े अफसरों का भी यही हाल है, यहाँ तक तो साहिब का चपरासी भी अपने साहिब से तब तक फरियादी को नहीं मिलाता, जब तक फरियाद करने वाला उस की मुठ्ठी गर्म नहीं कर देता, अन्यथा वह दुखी, पीड़ित को कार्यालय के बाहर घण्टों तक बैठाए रखता। रिश्वतखोर पी ए :--- सरकारी और निजी निजी कम्पनियों में भी नौकरी कहाँ मुफ्त में मिल रही है, पहले ही दलाल तीन तीन महीने का वेतन कैंडिडेट से लिया जा रहा है, यदि ना दे तो काम किसी और का होगा, जो रिश्वत देगा। आउट सोरसस नियुक्तियां :--- भारत की सरकारों ने चोर दरवाजों से अपने चहेतों को नौकरी दिलाने के लिए आउट सोर्सस शब्द को इजाद कर लिया है, आउट सोर्सस के ठेकेदार तो सरकारी दलाल हैं, जो सरकारी कार्यालयों के लिए कर्मचारी उपलब्ध कर रहे है और उन के द्वारा चयनित अक्षम कर्मियों को मनमाने ढंग से सैलरी देकर शोषण करते जा रहे, सरकारी चयन आयोग सरकार की मर्जी से कर्मियों को चुन नहीं पाते थे, जिस के कारण सरकार ने ही चोर दरवाजा तलास लिया और मनमर्जी के लोगों को नौकरी दिला कर, पचास हजार का कर्मी सात आठ हजार में नियुक्त करवा लिया जा रहा। निजी कम्पनियों के पी ए रिश्वत खा रहे:--- निजी कम्पनियों में भी दलाल ही कम्पनियों को नौकरी दिला रहे हैं, चाहे नौकरी आम मजदूर, कर्मी की हो, चाहे बड़े अधिकारी की, नियुक्ति से पहले कम्पनी के पी ए को चढ़ावा चढ़ाया जा रहा, जिस में मैरिट की कोई परवाह नहीं की जाती, केवल रिश्वत की ही मैरिट देखी जा रही है। सेना, पुलिस में वच्चे जान हथेली पर रख कर जाते:-- केवल गरीब युवा ही सेना और पुलिस में भर्ती होते हैं। ये गरीबी की भठ्ठी से शार्टकट तरीके से निकलना चाहते हैं, इसी कारण ये युवा अपनी जान हथेली पर रख कर भर्ती होते हैं, वर्षों तक व्यायाम, उछल कूद, दौड़ लगा लगा कर भर्ती के लिए तैयारी करते हैं, फिर रिश्वत दे दी तो मौत का सामान मिल भी जाता ह, यदि नहीं मिले तो हतास हो कर घर में आहें भरनी पड़ती, यदि भर्ती हो गए तो वहाँ भी राजनेताओं द्वारा कराए जाने वाले दङ्गों में शहीद होना पड़ता, पुलवामा जैसे कांडों में गरीबों को जातीय आधार पर स्वर्ग जाने का सुअवसर भारत के मुखिया तक देते आ रहे। ये नेता, अभिनेता और लालफीताशाही अपने फूल जैसे नाजुक बेटों-बेटियों को सेना और पुलिस की बैरकों के दर्शन तक नहीं करवाते, उन्हें तो छल बल से राजगद्दी की सवारी कराने की विसातें बिछाने की योजनाएं बनाई जाती, बरिष्ठ गरीब घरानों के नेताओं को किनारे लगा कर अपने ही राज कुंवरों को मुख्यमन्त्री और प्रधानमन्त्री बनवाया जाता, जो गरीब परिवार से निकला राजनेता गरीबों को गरीबी से निजात दिलाना चाहता है, उसे सत्ता तक जाने ही नहीं दिया जाता। जगजीवन राम जैसे अजेय सांसदों को प्रधानमंत्री बनने ही नहीं दिया जाता और ऐसे योग्य जिनीयस लोगों को बेआबरू हो कर भटकना पड़ता है, लाल बहादुर शास्त्री, साहिब कांशी राम जैसे अवतारों का पता नहीं चलता कि किस हादसे के शिकार हो गए, यहाँ तक कि मौत की जाँच तक नहीं होने दी जाती। मजदूर मरते मरते ही मर रहे:--- सभी अमीर चाहे वे किसी भी धर्म, समुदाय और जाति के हों, वे मौज मस्ती की जिंदगी जीते हुए मरते हैं मगर मजदूर मरते, मरते ही मरता है, उस के पास ना अप्रोच, ना रिश्वत, वह केवल नंगे भूखे पेट, सर्दी, गर्मी में विवश हो कर मरता मरता, मरता ही आ रहा है और मरता ही जाएगा, उस के लिए कोई सरकार नहीं, यदि कोई सरकार बना भी लें तो उस की मौत भी जल्दी आ जाती, ऐसा है मेरा देश भारत महान। रामसिंह आदवंशी। महासचिव, वहुजन मुक्ति पार्टी, हिमाचल प्रदेश।

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