13जनवरी।। भारत में दास, दासतागुलामी
13जनवरी।। भारत में दास, दासता और गुलामी।।
विश्व के हर देश में दास, दासता और गुलामी शब्द प्रयोग किए जाते हैं, जिस से ज्ञात होता है कि हर देश में गरीब, अमीरों के गुलाम होते आए हैं क्योंकि दास शब्द केवल उन लोगों के लिए ही प्रयोग किया जाता है, जो अमीरों के पास सेवा करते हैं और उसके बदले में उन को कुछ नहीं दिया जाता है, सुप्रसिद्ध ग्रीक लेखक मेगस्थनीज ने इंडिका में लिखा हुआ है कि, मौर्य साम्राज्य में दास शब्द प्रतिबन्धित था।
मौर्य साम्राज्य में दास शब्द क्यों प्रतिबन्धित था:--- वास्तव में आदिकाल से ही भारत की धरती के ऊपर आदर्श शासकों का शासन चलता आ रहा था, जिस में कोई भी ऊंच-नीच, जातिवाद धर्मबाद, छुआछूत नहीं थी, कोई भी किसी की सेवा नहीं करता था, कोई किसी की नौकरी चाकरी नहीं करता था। जिस प्रकार सेवा निवृत पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा अपने परिवार का पालन पोषण करने के लिए स्वयं भी और परिवार भी मेहनत कर के अपनी कमाई से अपना जीवन जी रहे हैं, वैसे तब भारत के शासक खुद अपना परिवार पालते थे, जैसे ही विश्व में आदमी आदमी से श्रेष्ठ बन कर रहने लगा तब से ही श्रेष्ठ, संपन्न और उच्च पदाधिकारी अपनी सेवा के लिए जिन लोगों का शोषण करने लगे उन को दास कहा जाने लगा।
भारत में दासता का आरंभ:-- भारत के इतिहास से मालूम होता हैं, कि भारत के अंतिम सम्राट शिव स्वयं खेती-बाड़ी कर के अपने परिवार का पालन पोषण करते थे और जनता से किसी प्रकार का कोई टैक्स नहीं लेते थे। कृषक शिव को भगवान सिद्ध करने का प्रयास किया गया है, कि उस ने अपनी जटाओं से धरती पर गंगा नदी उतारी थी मगर यह कपोल कल्पित कथा उन घुसपैठियों की लिखी हुई है, जो भारत में मूलनिवासियों का खून चूसने आए थे, इन्होंने यह सिद्ध करने की कोशिश है कि अमीर और गरीब ईश्वर की रचना है, जब से भारत में यूरेशियन लोगों ने घुसपैठ की है तब से ही ऐसी कपोल कल्पित कथाएं घड़ी गई हैं, महामूर्ख व्यक्ति भी समझ सकता है कि कोई भी आदमी जो मां के गर्भ से जन्म लेता है, वह ईश्वर नहीं हो सकता है, इसलिए शिव कोई ईश्वर या देवता नहीं था और ना ही वह अपनी जटाओं से किसी नदी को जन्म दे सकता था मगर ऐसी कथाओं को आधार बना कर के मनुवादी कवियों, लेखकों और इतिहासकारों ने उन को चमत्कारी सिद्ध करने के लिए काल्पनिक कथाएं लिखी हुई हैं ताकि सम्पन्न और गरीब व्यक्तियों के बीच अंतर स्पष्ट कर के उन के सेवकों के बारे में भ्रमजाल फैला कर मालिक और गुलाम की वास्तविकता को सत्य सिद्ध किया जा सके।
यूरेशियन घुसपैठियों द्वारा दास प्रथा का आरंभ:--जब यूरोप और ऐशिया से आए हुए लोगों ने भारत के मूलनिवासी भोले भाले लोगों को छल बल से अपना गुलाम बना लिया, तब से ही गुलामी शुरू हुई और तब से ही दास, दासता और गुलामी शब्दों का चलन शुरू हुआ है, उस से पहले भारत की धरती के ऊपर दास शब्द का प्रचलन नहीं था। उस समय से यूरेशियन घुसपैठिए भारत के मूलनिवासियों को दास, गुलाम बना कर हर क्षेत्र में शोषण करते आ रहे हैं, यही कृषि कर के उन का पालन पोषण करते आ रहे, जिस से ये लोग विलासी हो गए, जिन को फिर यूरोप एशिया से आए हुए नए घुसपैठियों ने अपना गुलाम बनाने के लिए भारत के ऊपर आक्रमण करना शुरू कर दिए और उसी कड़ी में सातवीं शताब्दी में नए मुस्लिम लुटेरे मोहम्मद बिन कासिम ने भारत को अपना गुलाम बना लिया और फिर मनुवादी भी उन के गुलाम हो गए।
अंग्रेजों की घुसपैठ से दोहरी गुलामी:----24 अगस्त 1608 ईस्वी को सूरत बन्दरगाह पर अंग्रेजों का व्यापारिक मंडल सर थॉमस रो की अगुवाई में भारत में घुसा। उस के बाद अंग्रेजों ने भारत में घुसपैठ करने के लिए अपने गुप्तचर भेजे, जिन को मनुवादी लेखकों ने घूमने वाले घुमक्कड़ लिखा है। इन यात्रियों ने मनुवादियों की कमजोर नसों को समझा, परखा, जाना और नई धरती की खोज के अभियान के नाम पर भारत में आ कर भारत के यूरेशियन लुटेरों से भारत की सभ्यता, संस्कृति, सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था के साथ भारत की संपदा के बारे में भी ज्ञान हासिल किया और उस के बाद अंग्रेजों ने भारत में घुसने के लिए अपने व्यापार को माध्यम बनाया और व्यापारी बन कर के भारत की धरती पर घुस कर अपना अधिपत्य जमाने का प्रयास किया, जब ये व्यापारी पूर्णरूपेण भारत में घुस कर रहने लग पड़े, तब वे अपने सामान के साथ टीनों में बंदूकें भर कर ले आए और भारत में ला कर बंदूकों की नोक पर भारतीयों को अपना गुलाम बनाना शुरू कर दिया, जब उन्होंने भारत के मनुवादी राजपूत शासकों, अमीरों को बंदूक की नोक पर पूरी तरह अपना गुलाम बना लिया, तब फिर नए यूरेशियन घुसपैठियों ने भारत के पुराने युरेशियन को अपना दास, गुलाम बना लिया और इस प्रकार यह दास और गुलामी शब्द भारत में प्रयोग होते आए हैं।
नए घुसपैठियों ने पुराने मनुवादी दासों को भी युद्धों में प्रयोग किया:---जैसे-जैसे मुस्लिम शासक भारत में घुस कर मनुवादी राजाओं को फतेह करते गए, वैसे वैसे ही उन्होंने भारत के प्राचीन युरेशियन और मूलनिवासियों को पुन: दास बना कर के उन्हीं को अपनी सेना में भर्ती कर के भारत में युद्ध किए और दासों को दासों से मरवा कर के राजसत्ता का आनंद ले कर के, भारत की धन संपदा को ले कर अपने देश भाग गए।
आजादी के बाद पुराने लुटेरे पुन: सक्रिय हो गए:--- आजादी के बाद फिर शूद्रों को पुलिस और सेना में केवल सैनिक के रूप में भर्ती कर रहे हैं मगर अफसर अपने ही मनुवादी भर्ती किये जाते हैं। 80% सैनिक भारत के मूलनिवासी ही होते हैं, जिन में से ही अधिकतर वही शहीद होते मगर उनके परिवारों को उन की शहादत के बदले में कोई खास मुआबजा नहीं दिया जाता है। कई विधवाएं तो अपने वच्चों की रोटी के लिए भी तरसती हैं, उन्हें ही भूमिहीन रख कर बेईमानी की जा रही है, जो सीमाओं पर शहीद नहीं होते, जो खुद हाथों से कृषि नहीं करते वही शोषक भूमालिक (लैंडलार्ड) हैं, मूलनिवासी राज आने पर ही ये मनुवादी अन्याय खत्म होगा।
रामसिंह आदवंशी।
प्रदेश महासचिव,
वहुजन मुक्ति पार्टी, हिमाचल प्रदेश।
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