12जनवरी।। भारतीय मूलनिवासी गुलामी की पृष्ठभूमि।।

12 जनवरी।। भारतीय मूलनिवासी गुलामी की पृष्ठ भूमि।। आद, जुगाद से चली शासन व्यवस्था भारत की धरती के ऊपर करोड़ों वर्षों तक चलती आ रही थी, जिस के अंत में सम्राट शिव का शासन था, इसी समय तेल और वर्फ से त्रस्त अरब और यूरोप के नंगे भूखे मरने वाले लोगों को, जब भारत के मूलनिवासी लोगों के ऐश्वर्य संपन्न जीवन के बारे में पता चला था, तब वे भारत की तलाश में बाँसों के बेड़े बना कर के उन के ऊपर बैठ कर सागरों को पार करते हुए धरती पर बने स्वर्ग भारत की ओर चल पड़े थे, जिस के पहले झुंड का नेतृत्व ब्रह्मा नामक यूरेशियन कर रहा था। ब्रह्मा शब्द की व्युत्पत्ति अब्राहम शब्द से हुई है, जो बर्फ से ढके गोरे लोगों का पैगंबर था। उसी के वंशज भारत में आते गए थे। इन घुसपैठियों ने अब्राहम के स्थान पर अपने नेता का नाम ब्रह्मा रख लिया था, जिस के नेतृत्व में इन लोगों ने सिंधु नदी के दोनों ओर डेरे डालें और रात के समय में भारत के मूलनिवासियों को लूट कर, मार कर अन्न-धन इकट्ठा करके जीवन जीने लगे। जिस तरह जवाहर लाल ने डिस्कबरी आफ इंडिया में लिखा है कि कबीले आते गए और कारवां बनता गया, उसी आधार पर उन्होंने भारत के शासकों को मार काट कर, छल कपट के द्वारा शासन छीन लिया था। जब कभी भी राजा *राज धर्म* और *तलवार* को छोड़ कर साधु, संत और दयालु बन जाए, तो वह जनता के लिए अभिशाप बन जाता है, इसीलिए सम्राट शिव भी ऐसा ही दयालु और भोला भाला सम्राट बन गया था। वह हिंसा में विश्वास नहीं करता था और आदिपुरुष का परम भगत बन गया था, जिस की शराफत का नाजायज फायदा उठा कर के ब्रह्मा और उसके साथियों ने उस के परिवार को बर्बाद कर के भारत की राजसत्ता छीन ली थी। युरेशियन सत्ता छीन कर भी सफल नहीं हो सके:---छल बल से सता छीन कर भी ब्रह्मा को भारत के ऊपर शासन करना बड़ा कठिन हो गया था मगर उन्होंने साम, दाम, दंड, भेद आदि कुटिल नीतियां अपना कर के भारत के मूलवासियों को गुलाम बनाने का अभियान चलाया। साम नीति क्या है :--- शातिर, चतुर, चालाक और शैतान लोग अपने लक्ष्य को सिद्ध करने के लिए साम नीति का प्रयोग करते हैं, जिस का अर्थ होता है *समझाना* इस प्रकार उन्होंने भारत के भोले भाले मूलनिवासियों को समझाने का प्रयत्न किया था मगर जब इस में सफल नहीं हुए, तो दूसरी नीति अपनाई जिसे दाम कहते हैं। दाम नीति का अर्थ:--- जब कोई प्रपंची अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहता है तो वह प्रतिद्वंदी को खरीदने के लिए धन दौलत देने का प्रयास करता है अर्थात दाम (कीमत) चुका कर के अपने लक्ष्य को प्राप्त करना चाहता है, तो इस दिशा में भी जब आर्य लोग सफल नहीं हुए और भारत के कर्मठ, सत्यनिष्ठ, ईमानदार मूलनिवासी यूरेशियन आर्यों के पास नहीं बिके तो फिर उन्होंने दंड नीति को अपनाया था। दंड नीति क्या है:---- जब कोई साम, दाम से भी नहीं बिकता है तो फिर कपटी, छ्ली लोग दंड दे कर के अपने लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रयास करते हैं, परंतु जब भारत के देश प्रेमी, राष्ट्रवादी मूलनिवासी यूरेशियन से नहीं डरे, तनिक भी विचलित नहीं हुए तो फिर उन्होंने रात के अंधेरे में राजाओं को मारना शुरू कर दिया, शहरों को जला कर के आग के हवाले करना शुरू कर दिया और इस प्रकार छल बल कर के अपने लक्ष्य को पूरा करने का अभियान चलाया था। जब वे उस में सफल हो गए, तब भी भारत के ईमानदार मूलनिवासियों को अपना नहीं बना सके, जिस के लिए उन्होंने चौथी भेद नीति अपनाई। भेद नीति क्या थी:--- अखंड भारत को अपने वश में करने के लिए यूरेशियन लोगों ने भारत के मूलनिवासियों में भेद भाव पैदा करने के लिए वर्ण व्यवस्था, ऊंच नीच, जाति-पाती, छुआ-छूत, संप्रदाय, रीति-रिवाजों, धर्म कर्म, व्यवसाय और उद्योग आदि का अमानवीय सहारा लिया, जिन के सहारे भारत के मूलनिवासियों को छ:हजार सात सौ तेतालीस जातियों में विभक्त कर के छद्म राज शुरू किया । फूट डालो राज करो नीति:--- जब जाति व्यवस्था बनाने से भी आर्यों का दिल नहीं भरा तब फूट डालो राज करो की नीति मूलभारतीयों के ऊपर थोंप कर पूर्ण रूप से अखण्ड भारत के ऊपर अपना आधिपत्य जमा लिया, जिस के लिए मूलनिवासियों की शिक्षा व्यवस्था को खत्म कर दिया गया और उन के जेहन में ईश्वर और स्वर्ग नरक का भय और आतंक फैला दिया गया। जंगली जानवरों के जीवन के आधार पर भारत के मूलनिवासियों को समझाया गया, कि यदि आप अच्छे कर्म नहीं करोगे, ईश्वर के बताए हुए व्यवसायों को नहीं करोगे तो अगले जन्म में गधे, घोड़े, खच्चर, शेर, चीते, मधुमक्खियां, मक्खियां, उल्लू, कौए, साँप आदि बनना पड़ेगा। अशिक्षित अनपढ़ और तर्कहीन गुलाम मूलनिवासी लोग ऐसी बातों पर विश्वास करते गए और अनपढ़, मनुवादियों की काल्पनिक भगवानों की कथाओं को सत्य मानते गए। वर्णाश्रम, जातिवाद, छुआछूत और तर्कहीन, रीति-रिवाजों को अपना लिया और फिर मनुवाद के पूर्णत: गुलाम हो गए। जब मूलनिवासी पाखंडों, ढोंगों और आडंबरों के गुलाम हो गए तो फिर मनुवादियों को शासन करना बहुत सरल हो गया था और वह आज तक चलता आ रहा है। मूलनिवासियों की स्वतंत्रता का मूल मंत्र:--जब तक विश्व के समस्त मूलनिवासी अपनी सभी जातियों, धर्मों, चारों वर्णाश्रमो, ऊंच-नीच की भावना, छुआछूत, जाति-पाती, आदि का परित्याग कर के एकता के सूत्र में बंध कर इकट्ठे नहीं हो जाएंगे, अपना एक सर्वसम्मत राष्ट्रीय नेता नहीं सुनेंगे, सभी मूलनिवासी मनुवाद को वोट ना देने की पक्की कसम खा लेंगे, तब तक भारत के मूलनिवासी मनुवादियों के गुलाम ही रहेंगे और उन के अत्याचारों बलात्कारों, दंगों-फसादों के शिकार होते ही रहेंगे। जब तक सभी भूमिहीन मूलनिवासियों को भूमि के मालिक नहीं बनाया जाएगा, तब तक भी मनुवादियों की गुलामी कभी खत्म नहीं हो पाएगी, इसलिए मूलनिवासियों की स्वतंत्रता का एक ही उपाय है, कि 85% मूलनिवासी तत्काल एक नेता मान कर मनुवादियों से राजसत्ता छीन लें और भारत के धन, धरती और उद्योगों को बांट कर स्वाबलंभी हो जाएं। रामसिंह। प्रदेश महासचिव, वहुजन मुक्ति पार्टी, हिमाचल प्रदेश।

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