7 जनवरी।। वर्तमान शासक गरीब भारतीयों का खून चूस रहे हैं।।

।।वर्तमान शासक गरीब भारतीयों का खून चूस रहे हैं।। वर्तमान शासक गरीब भारतीयों के खून पसीने को चूस रहे हैं, वह भी समय ही था जब अखंड भारतवर्ष के शिव और गौरजां जैसे शासक अपना पेट भरने के लिए स्वयं खेतों में हल चला कर के अनाज पैदा करते थे, पशुपालन करते थे और अपने परिवार का निर्वाह स्वयं मेहनत मजदूरी कर के किया करते थे। कोई भी शासक जनता से टैक्स इकठ्ठा कर के मौज मस्ती से अपना जीवन व्यतीत नहीं करता था, इसी तरह जनता भी खेतों में कड़ी मेहनत कर के ही अपने परिवार का भरण पोषण किया करती थी, कोई किसी के ऊपर भार बन कर नहीं जीता था। 1947 तक वेतन भत्ते:----सन 1947 तक विधायकों को कोई भी वेतन, भत्ते नहीं मिलते थे। विधायकों को समाज सेवक कहा जाता था और जो लोग समाज सेवा किया करते थे, वे समाज सेवा के बदले में कुछ नहीं लेते थे। जब सन 1936 में पहले विधानसभा चुनाव हुए तो उस समय विधायकों को किसी प्रकार का कोई वेतन नहीं मिलता था, पंचों, सरपंचों की बात तो दूर रही। स्वतंत्रता के बाद वोटर की जेब लूटी जाने लगी, जैसे ही भारत स्वतंत्र हुआ, वैसे ही जनता द्वारा चुने गए सांसद और विधायक सरकारी नौकर हो गए और अपनी जेबैं भरने के लिए कानून बना लिए। जनता के खून पसीने की गाढ़ी कमाई को लूट कर खाना शुरु कर दिया। अपने लिए हजारों ही नहीं लाखों रुपए वेतन और भत्ते लेना शुरू कर दिया। महात्मा गांधी का जीवन स्तर:---सन 1883 ईसवी में महात्मा गांधी विदेश पढ़ने गए, तो वे एक धोती में हीं गए और बकालत पास कर के अपनी जीवनचर्या भी धोती पहन कर ही शुरू की थी। उसी धोती में अंग्रेजों के साथ आजीवन आजादी की लड़ाई लड़ते रहे। एक बार जब उन को तत्काल किसी मीटिंग में जाना पड़ा, तो वे थर्ड क्लास रेल डिब्बे में भीड़ होने के कारण घुस भी नहीं पा रहे थे, तब उन्होंने एक गुंडे को बुलाया और उस को बीस रुपए देकर के कहा, कि "मुझे इस डिब्बे में घुसा दो"। तब उस गुंडे ने गांधी से बीस रुपए लेकर के उन्हें जबरन रेल के डिब्बे के अंदर घुसाया। महात्मा गांधी हमेशा थर्ड क्लास डिब्बे में ही सफर कर के अपना पैसा बचाया करते थे। भारतवर्ष को स्वतंत्र कराने के बाद भी वे धोती में ही जीवन यापन करते रहे मगर फैशन परस्ती में धन बर्बाद नहीं करते थे। उन्होंने उसी धोती में अपनी जीवन लीला भी समाप्त कर ली। लाल बहादुर शास्त्री का जीवन स्तर:--- लाल बहादुर शास्त्री अत्यंत गरीब परिवार से संबंध रखते थे, जब वे पढ़ने के लिए गंगा नदी को पार करने के लिए जाते थे, तो वे अपने थैले को पीठ के ऊपर बांध कर तैर कर जाते थे और वही *लाल* बाद में भारत का प्रधानमंत्री बन गया और प्रधानमंत्री बनने के साथ ही अन्य चुनौतियों का सामना करते हुए भी एक धोती में ही जीवन व्यतीत करते रहे। जब अमेरिका ने भारतवर्ष को गेहूं देने के लिए अपमानजनक शब्द कहते हुए अपनी हेकड़ी दिखाई थी, तब स्वाभिमानी लाल बहादुर शास्त्री ने भारतवासियों से आग्रह किया था कि "आप सभी भारतवासी सोमवार का व्रत रख कर के करोड़ों टन अनाज बचा सकते हैं, इसीलिए भारत के लोगों ने शास्त्री जी की बात मान कर, सोमबार का व्रत रख कर करोड़ों टन अन्न बचा कर आत्मनिर्भर बना कर शास्त्री जी ने अमेरिका को उस की औकात दिखा दी थी। जब भारत-पाकिस्तान युद्ध हो रहा था, तब पाकिस्तान की सारी सेना छंब जोड़ियाँ में डेढ़ सौ किलोमीटर भारत के अंदर घुस आई थी, तब शास्त्री जी ने सेना के नवयुवकों को शहीद होने से बचाने के लिए, अपनी बुद्धि से का ले कर अपनी सेना लाहौर की तरफ लगा कर, एक ही रात में डेढ़ सौ किलोमीटर घुस कर पाकिस्तान को नानी याद करवा दी थी, जब वे संधि करने के लिए ताशकंद जा रहे थे, उस दिन उन की धोती मैली थी, उन्होंने धोती को धो और सुखा कर, उसी को पहन कर के ताशकंद गए मगर उन्होंने भारत सरकार के बजट को फैशन परस्ती के लिए चूना नहीं लगाया। वर्तमान सांसदों और विधायकों का जीवन स्तर:-- मेहनत मजदूरी करने वाले मजदूर भी अगर कोई विधायक और सांसद बन जाते हैं तो उन के पांवों के नीचे एक दम फॉर्चून गाड़ी आ जाती है, डिजाइनरों द्वारा तैयार पेंट, कोट और टाई उन के शरीर पर विराजमान हो जाती है। आय कर से बचने के लिए वेतन कम और भत्तों की भरमार लग जाती है, जिन का कोई हिसाब किताब ही नहीं रहता है। पांच सालों में इन के पास इतना धन दौलत हो जाता है, जितना किसी स्मगलर के पास भी नहीं होता है। कई एकड़ जमीन के मालिक बन जाते हैं, कई होटलों के स्वामी बन जाते हैं, इन के कई उद्योग लग जाते हैं मगर जो गरीब इन्हें वोट देते हैं, वे गरीब ही रहते हैं। सांसदों के वित्तीय लाभ:--- सभी संसदों को 465 करोड़ रुपए वेतन के रूप में और 164 करोड़ रुपए इन की सुरक्षा के ऊपर खर्च किए जाते हैं। इस के साथ अन्य जो सुविधाएं मिलती हैं उन का तो कोई हिसाब-किताब ही नहीं लगाया जा सकता है। मान्यवर विधायकों के खर्चे:--- भारतवर्ष में 4582 एमएलए और एमएलसी हैं, जिन के ऊपर 11000 करोड़ रुपए प्रतिवर्ष खर्च किया जाता है। इस प्रकार विधायकों और सांसदों के ऊपर भारतवर्ष के गरीब मजदूरों, कमजोर लोगों का खून पसीने का कमाया हुआ धन सौ अरब खर्च होता है, जिस को ये बेदर्दी लोग बड़े आनंद से हजम करते हैं। भारत की जनता गरीब ही रहेगी:----भारत में हाथ से काम करने वाले केवल मजदूर ही हैं, जिन के खून पसीने की कमाई चपरासी से लेकर के कैबिनेट सचिव तक खाते हैं, उन से अधिक तो विधायक और सांसद मजदूरों का खून पीते हैं मगर जो जनता अपने हक हलाल की कमाई का हिस्सा टैक्स के रूप में सरकार को देती है, वे गरीब, गरीब ही रहते हैं और काफिर लुटेरे शासकों से डर कर जीते हैं मगर ये अफसर और चयनित नेता इतने बेशर्म है कि इन को वे लोग नजर ही नहीं आते हैं, जिन के कारण ये लोग ऊंचे ऊंचे पदों पर पहुंच कर के सुंदर आलीशान महलों में रहते हुए गाड़ियों और जहाजों में सैर, सपाटे करते हुए विलासमय जीवन जीते हैं। ना जाने भारत के गरीब लोग अपने दिमाग की गरीबी को कब खत्म कर के अपने अधिकारों के प्रति सचेत हो कर के लुटेरों के खिलाफ विद्रोह करेंगे।

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