5 जनवरी।। दनुज, दानव, राक्षस और असुर कौन??

!!! दनुज, दानव, राक्षस और असुर कौन? आदिकाल से प्राणी जगत का धरती के ऊपर पदार्पण हुआ है। आदि पुरुष ने जिन जिन प्राणियों को जिस रूप में बनाया है, वे प्राणी उसी रूप में धरती के ऊपर जीवन व्यतीत करते आ रहे हैं। पशु, पक्षी और वनस्पति का रंग रूप सारे विश्व में एक जैसा ही है, उन में किसी में भी कोई परिवर्तन नहीं हुआ है, किसी के सिर पर ना तो सींग उगे हुए हैं और ना ही किसी पशु के सींग गिरे हैं। किसी भी पक्षी के ना तो पंख बदले हैं और ना ही समाप्त हुए हैं, मगर केवल भारतवर्ष में ही मनुष्य को सींग उगे हुए थे, जब कि यूरोप, अरब देशों में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं हुआ है और ना ही किसी का इतिहास मिलता है। राक्षस का शाब्दिक अर्थ:--- *रक्ष* धातु से राक्षस शब्द की व्युत्पत्ति हुई है, जिस का अर्थ होता है रक्षा करना। जब आदि पुरुष द्वारा सृजित प्रकृति के प्राणियों के स्वामी मनुष्य ने मनुष्य के साथ अन्याय, अत्याचार और अपराध करने शुरू किये थे, तब तत्कालीन सम्राट जुगाद, नील, कैल, चंडूर, मंडल, कैलास और सम्राट सिद्धचानो जी महाराज को अपराधियों से भोलेभाले मनुष्यों की रक्षा के लिए, जिन योद्धाओं को रक्षा करने के लिए नियुक्त किया गया था, उन को ही राक्षस कहा गया था, अर्थात जो लोग अपने अपने क्षेत्र की रक्षा करने का कार्य करने लगे थे, उन्हीं को ही राक्षस कहा गया था। राक्षस कौन कौन हुए हैं:---मक्का मदीना से शासन करने वाले तेजस्वी चँवर वंश के सम्राटों ने कई वीर, बहादुर और शक्तिशाली योद्धाओं को क्षेत्र विशेष के राक्षस नियुक्त किया हुआ था, जिन्हें आज कल जनरल कहा जाता है। इन में बलि, चंड, मुंड, रावण, कालनेमि, सुबाहूं, मारीच, सुकेतु, कुंभकरण, कबंध, विराध, अहिरावण, बाणासुर, अंधक, भस्मासुर, बकासुर, चंद, दूषण, हिरण्यकशिपु, हिरण्याक्ष, होलिका, जालंधर, काकासुर, दिति, महाबली, महिषासुर, मायासुर, मुकासुर, शुंभ-निशुंभ, नरकासुर, राहु-केतु, रक्तबीज, संवर, शुक्र (असुरों के गुरु) स्वरभानु, शिता सुर, स्वरभानु, सुभाली, तारकासुर, त्रिपुरासुर, उपसंद, वृषवर्ष, वृत्रासुर, वज्राँग, मत्स्य, कच्छ, वराह, हयग्रीव, अरुण आदि अत्यंत खूंखार सीमा रक्षक थे, जिन को विदेशी आर्यों ने राक्षस तो लिखा हुआ है मगर वीरता के द्योतक राक्षस का अर्थ विपरीत कर के अपमानजनक, अमानव, लिखा हुआ है। राक्षसों के ऐतिहासिक कार्य:--- ये राक्षस क्षेत्र विशेष के रक्षक हुआ करते थे, जिन के आतंक से विदेशी युरेशियन भारत की सीमा के अंदर प्रवेश नहीं कर पाते थे मगर आर्यों ने इन को सुंदरियों से मोहित करवा कर छल बल और धोखे से मरवा कर, इन के सिरों पर सींग लगा कर अति मानव सिद्ध कर के लिखा हुआ है। वर्तमान राक्षस:--प्राचीन इतिहास फिर वर्तमान में भी दोहराया जा रहा है। जिस प्रकार सम्राट शिव और मातेश्वरी गौरजां की मूर्तियाँ श्मशान घाटों पर लगाई गई हैं, वैसे ही आज गुरु रविदास जी महाराज की मूर्तियाँ मुर्दाघरों, शमशान घाटों पर लगा कर अपमानित किया जा रहा है। डाक्टर भीम राव अम्बेडकर की मूर्तियाँ तोड़ी जा रही हैं, साहिब कांशी राम को मरवा दिया गया, जिन को कल फिर राक्षस लिखा जाएगा। ऐसे ही मूलनिवासी वीर योद्धाओं और महापुरुषों का अपमान करने के लिए कल को उन के सिरों पर सींग लगाए जाएंगे। राक्षस का अर्थ क्यों विपरीत किया गया:--- जो मूलनिवासी वीर सेनापति जनता को दुष्टों से बचाए रखने के लिए दिन रात प्रहरी का कार्य करते थे, उन को इतिहास में अपमानित करने के लिए ही राक्षस शब्द को विपरीत कर के लिखा गया है, ताकि अपने कल्पित कागजी शेरों के बीच अंतर स्पष्ट किया जा सके। राक्षस कौन बनाए गए:---भारत के मूलनिवासी राजाओं, महा राजाओं, शासकों, वीर योद्धाओं को ही अति मानव लिख कर उन के नामों को कलंकित करने के लिए राक्षस बनाया गया है। मनुवादी कोई भी अवतार नहीं हुआ:--- सभी अवतार भारत के मूलनिवासी महापुरुष ही हुए हैं, जिन्हें रावण, महिषासुर, कंस, राक्षस लिखा गया है। आज तक किसी भी मनुवादी ने निकृष्ट मनुस्मृति के सिवाय कोई भी श्रेष्ठ ग्रंथ, महाकाव्य नहीं लिखा है। जितने ऐतिहासिक ग्रंथ लिखे गए हैं,मूलनिवासी व्यास ने वेद, पुराण, गीता, वाल्मीकि ने रामायण, स्वामी ईशर दास जी ने गुरु आदि प्रगास ग्रंथ, डाक्टर भीम राव अम्बेडकर ने स्वतंत्र भारत का संविधान और साहिब कांशी राम जी ने चमचा युग लिखे हैं। वास्तविक राक्षस कौन है:--- राक्षस तो बो लोग हैं, जो पढ़ने, लिखने, सत्संग सुनने पर कानों में सिक्का भर देते हैं, जो लोग किसी की ओर देखने पर आंखें निकाल देते हैं, ऊँची जगह पर बैठने पर पिछवाड़े में कीलें ठोक देते हैं, लड़कियों के स्तनों को ढकने नहीं देते हैं, जिंदा लोगों को धरती में गाड़ देते हैं, आरे से लोगों को चीर देते हैं, जो लोग रास्तों, सड़कों और जंगलों से गुजरते हुए बेगुनाह लोगों को मावर्लिंचिंग द्वारा छाती पर चढ़ चढ़ कर मार रहे हैं और अकारण बहू-बेटियों के साथ बलात्कार कर के रात के अंधेरे में जलवा रहे हैं, या जला रहे हैं, या उन हत्यारों, दुराचारियों, पापियों को बचाने के लिए कानूनों का उल्लंघन कर रहे हैं, वास्तव में यही लोग राक्षस हैं। आज वही राक्षस राज चल रहा है। मूलनिवासी राजनेता भूतकाल से सीखें:-- भूतकाल की तरह मनुवादी लेखक वर्तमान मूलनिवासी विद्वानों, नेताओं को भी पूर्व मूलनिवासी शासकों, ज्ञानियों, विज्ञानियों की तरह ही कल को दानव, दनुज, राक्षस असुर लिख कर के भावी इतिहास में अपमानित करेंगे इसलिए आज जरूरत है, कि 85 प्रतिशत मूलनिवासी जनता और राजनेता तत्काल एक मंच पर इकट्ठा हो कर के बहुजन मुक्ति पार्टी को सफल बनाने के लिए एक मंच पर इकठ्ठे हो जाएं और मूलनिवासी एकता बना कर के वहुजन राज स्थापित करें। गुरु रविदास जी कहते हैं कि--- ऐसा चाहूँ राज मैं जहां मिले सभन को अन्न। छोट बड़ सभ सम वसै तां रविदास रहै प्रसन्न। गुरु रविदास महाराज का बताया गया समाजवाद ला कर गरीबों को भी सुखमया जीवन जीने दिया जाए अन्यथा सच्चे अर्थों में जो आज राक्षस राज चल रहा है, वह चलता ही रहेगा।

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