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Showing posts from September, 2022

मूलनिवासियों स्वाभिमान से जीना सीखो

मेरे 85% मूलनिवासी साथियो, सोहम, जय गुरुदेव! जब से सिंधुघाटी की सभ्यता धवस्त कर के यूरेशियन आक्रमणकारियों ने छल बल कर के आप को गुलाम बनाया हुआ है, तब से आप का सारा इतिहास, सभ्यता, संस्कृति और भाषा को खत्म करके छद्म राज शुरू की हुआ है। आप लोगों का स्वाभिमान इतना गिरा दिया गया है कि आप अपने आप में भूल चुके हैं कि हम भी इंसान हैं। आपके अंदर इतनी हीनता भर दी गई है कि आप स्वाभिमान को समझ नहीं पा रहे हैं। आप का आदधर्म स्वाभिमानी धर्म था मगर उस को समूल नष्ट कर के आप के ऊपर धार्मिक गुलामी थोंप दी है। सिंधु घाटी की सभ्यता के बाद यूरेशियन लोगों के पास कोई धर्म नहीं था जिसके कारण महात्मा बुद्ध ने बौद्ध धर्म की स्थापना कर दी थी जो सारे भारत में फैल गया था इस बौद्ध धर्म को भी कलंकित करने के लिए भी मनु वादियों ने इस के बीच घुसपैठ कर दी थी और घुस कर के बौद्ध धर्म के दो खंड कर दिए थे, महायान अपने मनुवादियों के लिए और हीनयान आप लोगों के लिए बना दिया था, जिस के कारण आप अपना धार्मिक स्वाभिमान भी खत्म कर बैठे। स्वाभिमान से जीना सीखो:---- हे मेरे देश के पचासी प्रतिशत गुलामो जागो, अपनी आत्मा को झकझोड़ कर द...

मनुवादियों ने निजी करण क्यों किया

मेरे 85% मूलनिवासी साथियो, सोहम, जय गुरुदेव! आजादी के बाद भारत का शासन-प्रशासन ठीक चलने लगा था, शिक्षा व्यवस्था भी सुचारु रूप से चल रही थी। अधिकतर कर्मचारी, अधिकारी भी ईमानदारी से अपनी डियूटी देते आ रहे थे मगर जब राजनीतिक पार्टियां बढ़ने लगीं, तब कुछ छल कपट शुरू हो गया। चुनावों में अथाह धन खर्च करना शुरू हो गया, डंडे-झंडे, गाड़ियों का ताम-झाम और उन की शराब का खर्च इतना होने लगा कि कोई भी पार्टी उस को वहन करने में असमर्थ हो गई हैं। जनता भी समझ गई, कि ये विधायक और सांसद जीतने के बाद केवल अपनी ही तिजोरियां भर कर करोड़पति और अरबपति बन रहे हैं, अपने ही सगे सम्ब्धियों, वाल-वच्चों की ही देखभाल कर रहे हैं, उन्हीं को ही रोजगार देने लगे हुए हैं, जिस के कारण इन लोगों से जनता का विश्वास उठता गया। कोई इन डाकुओं को चन्दा तक नहीं दे रहा था। कोई भी इन को मुँह नहीं लगा रहा था, जिस से यह लोग चुनाव लड़ने में असमर्थ होते गए, क्योंकि चुनावों के लिए इन के पास अथाह धन इकट्ठा नहीं हो पा रहा था। मनुवादी राजनेताओं को सरकारी सेक्टर से कोई मदद नहीं:---- सरकारी सेक्टर को एक एक एक पाई का भी हिसाब किताब देना पड़त...

मनुवादी आंतरिक रुप से एक है सिर्फ स्वार्थ के लिए पाशा पढ़ते हैं

मेरी 85% मूलनिवासी साथियो, सोहम, जय गुरुदेव! बड़ी हैरानी की बात है कि भारत के मूलनिवासी शूद्र और अछूत 85% होते हुए भी शताब्दियों से मुट्ठी भर मनुवादी लोगों के गुलाम बन कर जीते आ रहे हैं। आजादी से पूर्व तो विदेशी तानाशाहों का शासन था, उस से पहले मनुस्मृति के हैवानों का शासन चलता था मगर आजादी के बाद तो मूलनिवासियों को भी समानता के अधिकार के साथ मौलिक अधिकार भी मिल चुके हैं। साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवालिया जी के कड़े संघर्ष के बाद आरक्षण जैसी सुविधाएं भी उपलब्ध हो चुकी हैं, इस के बावजूद भी 85% मूलनिवासी आज भी मनुव्यवस्था के गुलाम ही हैं, जिस का मुख्य कारण पूना पैक्ट है। पूना पैक्ट ने सभी मूलनिवासियों के अधिकारों को छीन कर पुन: मनुवादियों की गुलामी थोंप दी है, मगर फिर भी मूलनिवासी अपने वोट की कीमत नहीं पहचानते हैं। यदि मूलनिवासी अपने ही मूलनिवासी को वोटिंग करते, तब भी गुलामी का अंत हो सकता था, मगर मूलनिवासी राजनेताओं की अहंकार पूर्ण प्रवृत्ति के कारण ये घमण्डी लोग कभी एक फ्रंट में शामिल होकर 15% मनुवादियों के साथ मुकाबला नहीं करते हैं और अपनी अलग-अलग डफली बजा कर, अपनी अपनी राजनीतिक दुकाने...

मनुवादी राजनीतिक दलों के झूठे घोषणा पत्र

मेरे 85% मूलनिवासी साथियो, सोहम, जय गुरुदेव! चुनावी कुंभ 5 वर्ष बाद आता है:---चुनाबी कुंभ पांच वर्ष बाद आता है। इस पवित्र कुंभ में केवल मनुवादी ही स्नान करते थे मगर एक ऐसा मनीषी भारत भूमि पर अवतरित हुआ जिस ने अनुभव किया कि 85% वोट भारत के असली मूलनिवासियों के हैं और केवल मध्यएशिया और इजराइल से आ कर के 15% लोग राज कर रहे हैं, इसलिए उन्होंने यह सोचा कि क्यों ना 85% मूलनिवासियों को एक मंच पर इकट्ठा किया जाए और उन की ही एक पार्टी बना कर भारत के असली मूलनिवासियों की ही सरकार क्यों ना बनाई जाए, जो गुरु रविदास जी महाराज के अधूरे कार्य को पूरा करने का ऐतिहासिक काम होगा। समाजवाद की स्थापना:--- गुरु रविदास जी ने कहा था, कि:---- ऐसा चाहूँ राज मैं, जहाँ मिले सबन को अन्न। छोट बड़ सभ सम वसै तां रविदास रहै प्रसन्न।गुरु रविदास जी के इसी लक्ष्य को पूर्ण करने के लिए 1984 में साहब कांशीराम जी ने बहुजन समाज पार्टी की स्थापना की थी, बिना खूनी क्रांति किये उन्होंने अल्प समय में ही उतर प्रदेश में वहुजन समाज पार्टी की सरकार बना कर, सारे विश्व को हैरत में डाल दिया था। उन्होंने विश्व को दिखा दिया, कि भारत के...

चौबीस सितम्बर को पूना पैकेट बना था काला दस्तावेज।।

मेरे 85% मूलनिवासी साथियो, सोहम, जय गुरुदेव! चौबीस सितम्बर को श्री विद्या प्रकाश कुरील जी राष्ट्रीय अध्यक्ष हिस्सा आंदोलन के निमंत्रण पर मुझे लखनऊ उत्तर प्रदेश के अमृता विद्यालय के समीप एक्शन श्री कालका प्रसाद जी के भवन में आयोजित सम्मेलन में उपस्थित होने का शुभ अवसर मिला है। मैं चंडीगढ़-लखनऊ ट्रेन से दस बजे लखनऊ रेलवे स्टेशन पर पहुंचा, जहां से मुझे तेलीबाग चौक होते हुए अमृता विद्यालय, सेक्टर नंबर 10 होते हुए श्री विद्याप्रकाश कुरील जी श्री कालका प्रसाद एक्शन के भवन में ले गए, जहां पर श्री कालका प्रसाद जी,  प्रिंसिपल अरविंद हर जी मध्य प्रदेश, प्रोफेसर डाक्टर दुर्गेश जी बैठे हुए थे। मैंने सभी को अभिवादन किया। श्री कुरील जी ने मेरा सभी महापुरुषों से परिचय करवाया। सभी गणमान्य महापुरुष बड़े खुश हुए कि हिमाचल प्रदेश जैसे दुर्गम प्रदेश से भी आप यहाँ पहुँचे हैं। अध्यक्षता:---- इस ऐतिहासिक सम्मेलन की अध्यक्षता के लिए पूर्व प्रोफेसर डाक्टर लालती देवी जी बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से आग्रह किया गया, जिसे स्वीकारते हुए उन्होंने अध्यक्ष की कुर्सी को अल्लंकृत किया। सभी उपस्थित विद्वान, स्कालरों ने...

निजीकरण।।

मेरे 85% मूलनिवासी साथियो, सोहम, जय गुरुदेव! सरकारों का काम होता है, देश को का बहुमुखी विकास करना, देश की जनता की रक्षा करना, देश की सीमाओं को सुरक्षित रखना, किसी भी देशवासी से अन्याय ना हो, इसके लिए जरूरी कदम उठाना, किसी का शोषण ना हो उस के लिए शासन प्रशासन को चौकस रखना, परंतु सरकारी क्षेत्र के दुश्मन मनुवादी प्रधानमंत्री नरसिंहा राव, अटल बिहारी बाजपेयी, ने सरकार का मुखिया होते हुए इन जिम्मेदारियों को दूसरों के कंधों पर फैँक खुद बेफिक्र हो कर जनता को बर्बादी, भूखमरी और शोषण के कगार पर ला कर पहुंचा दिया है। सरकार की परिसम्पतियाँ बेकार पड़ी:--- भारत के गरीबों के दुश्मन नरेंद्र मोदी ने तो कहा है, कि सरकार के पास अनेकों ऐसी संपत्तियां हैं, जिन का पूर्ण रूप से उपयोग नहीं किया गया है और यह बेकार पड़ी हुई हैं। इस प्रकार की सौ परिसंपत्तियों की नीलामी कर के ढाई लाख करोड़ रुपए इकट्ठे कर के गरीबों के पेट में लात मारी जाएगी और कहा है, कि उपक्रमों और कंपनियों को समर्थन देना सरकार का काम है, लेकिन यह जरूरी नहीं है, कि सरकार कंपनियों का मालिकाना हक अपने पास ही रखें। वास्तव में ऐसा वही सोचते हैं, ज...

संविधान बदलने वालों को वोट मत दो

मेरे 85% मूलनिवासी साथियो, सोहम, जय गुरुदेव! पन्द्रह प्रतिशत विदेशी मनुवादियों ने भारत के 85% मूलनिवासियों को चार हजार सालों से अपना गुलाम बना कर के रखा हुआ था और बड़ी बेरहमी के साथ 85% मूलनिवासियों के साथ अमानवीय व्यवहार कर के मानसिक और शारीरिक शोषण करते आ रहे हैं, यहां तक कि सारा सारा दिन काम लेने के बाद भरपेट भोजन तक नहीं दिया जाता था, जो कुछ दिया जाता था, वह भी बासी मक्की और मँढल की रोटी के ऊपर दो-चार दिन का पड़ा हुआ बासी साग ही खाने को दिया जाता था। मूलनिवासी मौलिक अधिकार हीन:--किसी भी मूलनिवासी को कोई मौलिक अधिकार नहीं थे, बस केवल पशुओं की तरह काम करते करते मरने का ही अधिकार था, जिस को खत्म करने के लिए निरंकार आदपुरुष ने सातवीं शताब्दी में मुसलमानों को भारतवर्ष में भेजा था, परंतु भारत में आ कर मुसलमान भी अपनी राजसत्ता को बचाए रखने के लिए ब्राह्मणों के साथ आंतरिक समझौता कर के भारत की जनता को लूटते रहे, उस के बाद सोहलवीं शताब्दी में अंग्रेजों ने भारत में आ कर भारत की राजसत्ता पर कब्जा करना शुरू किया था, वे भी भारतवर्ष को लूट लूट कर के सारा धन दौलत अपने देश इंग्लैंड ले जाते रहे मगर...

पूना पैकेट की औलादें।

मेरे 85% मूलनिवासी साथियो, सोहम, जय गुरुदेव! आप सभी ये आशा छोड़ दो कि पूना पैक्ट की औलादें कभी आप के अधिकारों के लिए विधान सभाओं और संसद में आप की गुलामी को खत्म करने के लिए कभी मुंह खोल कर मनुवादियों के साथ उलझ सकेंगी। ये औलादें जिस पूना पैक्ट बाप से उत्पन्न हुई हैं और उन्हीं की ही हिमायती हैं। ये उन्हीं के ही बच्चे बन कर के, आप के लिए नागनाथ और सांपनाथ हैं, जिन के कारण आप को प्रतिदिन नए नए दंश मिलते हैं और उन का जहरीला विष आप के बच्चों को डँस मारता जा रहा है। मनुवादी मनुस्मृति के सपूत अपने बच्चों के प्रति चिंतित है:--- मनुवादी अपने बच्चों के उज्जवल भविष्य के लिए हर क्षण क्षण चिंतित रहते हैं। वे अपने बच्चों के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार रहते हैं। आजादी की लड़ाई चल रही थी मगर आप की 85% आबादी का आतंक मोहनदास करमचंद गांधी, जवाहर लाल नेहरू, वाल गंगाधर तिलक, मदन मोहन मालवीय, लाला लाजपत राय आदि को सता रहा था, कि यदि इन मूलवासी लोगों को भी पूर्ण आजादी मिल गई तो फिर हम 85% मूलनिवासियों के गुलाम बन जाएंगे और हमारी आने वाली नस्लें भारत के मूलनिवासियों की गुलाम बनी रहेंगी, इधर हमारे 85% लोग आ...

चयन आयोग अन्याय का अड्डा।

मेरे 85% मूलनिवासी साथियो, सोहम, जय गुरुदेव! भारत का संविधान देशी विदेशी संविधानों के अच्छे-अच्छे कानूनों की नकल कर के बनाया गया है, ताकि भारत की जनता को न्याय मिल सके और कोई भी अन्याय से त्रस्त ना हो सके मगर मनुवादी सरकारों ने भारतीय संविधान को धत्ता दिखा कर के किनारे कर दिया है और उस में बनाए गए कानूनों को स्वेच्छा से प्रयोग करने के लिए उस को ताक पर रख दिया है, यह जिस उद्देश्य को ले कर के लिए बनाया गया था, उस से भारत के मनुवादी राजनेता भटक गए हैं और भारतवर्ष की जनता नारकीय जीवन जीने के लिए विवश हो चुकी है। भारतीय संविधान में ऐसी व्यवस्था की गई है कि कोई भी व्यक्ति मनमानी कर के संविधान का उल्लंघन नहीं कर सकता है। कोई भी तानाशाह नहीं बन सकता है, सारी शक्तियाँ जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों के हाथ में दी गई है, संसद में बैठे जनप्रतिनिधि ही सर्वोच्च शक्ति के मालिक हैं, यदि कर्मचारी, अधिकारी और राष्ट्रपति संविधान विरोधी काम करता है तो यह जनप्रतिनिधि दो तिहाई बहुमत से मुख्य न्यायाधीश, राष्ट्रपति को भी पदच्युत कर सकते हैं, जब कि प्रधानमंत्री को तो वहुमत में केवल एक वोट की कमी के कारण ही कुर्...

प्रशासनिक अधिकारी जिम्मेदारी नहीं समझते।

मेरे 85% मूलनिवासी साथियो, सोहम, जय गुरुदेव! न्यायधीशों, आईएएस और आईपीएस, गुप्त चर आदि अधिकारियों को जनता के अधिकारों की रक्षा के लिए नियुक्त किया जाता है। इन में से कुछ एक ऊंचे पदों पर बैठ कर के खुदा बन कर इतने अहंकारी हो जाते हैं, कि जो दुखी,पीड़ित लोग इन अधिकारियों के पास अपनी समस्याओं को ले कर जाते हैं, तो ये घमंडी लोग जिन लोगों के रहमों करमो के ऊपर अपना और अपने परिवार का पालन पोषण करते हैं, उन को बैठने के लिए कुर्सी तक उपलब्ध नहीं करवाते हैं और ना ही सीधे मुंह लोगों के साथ बात नहीं करते हैं, कई बार तो जातीय वैमनस्य के कारण फरियाद करने वालों से बदतमीजी तक कर बैठते हैं जिन को कोई भी पूछने वाला नहीं होता है, जिस के कारण जनता का इन अधिकारियों से विश्वास उठता जा रहा है। न्यायधीशों से विश्वास खत्म:--- संविधान में न्यायपालिका को सब से अधिक शक्तिशाली बनाया गया है, किसी के साथ अन्याय ना हो, इसी कारण संविधान में न्याय व्यवस्था को इतना मजबूत किया गया है, जिस के भय से राष्ट्रपति, उपराष्ट्पति, प्रधानमंत्री, मंत्री, विधायक और बड़े बड़े अधिकारियों, कर्मचारियों को किसी के साथ अन्याय करने की हि...

भारत में अंधा युग चल रहा है।

मेरे 85% मूलनिवासी साथियो, सोहम, जय गुरुदेव! भारत के इतिहास में 2014 से ले कर एक ऐसा युग शुरू हुआ है, जिस में खूनी खेल खेलने वाले कुछ राजा, महाराजा और पुलिस हिस्ट्रीशीटर राज कर रहे हैं, जिन लोगों के नाम पर कत्ल के केस चल रहे हैं, मर्डर और खून खराबे के केस चल रहे हैं, वे लोग भारत का शासन, प्रशासन चला रहे हैं, जिन के शासन में सारे भारतवासी जानों से तंग आ चुके हैं, इसी तरह का खेल एक बार पहले भी हुआ है, जब मुस्लिम तानाशाह तैमूरलंग मारोमार करता हुआ भारत आया था, उस ने इतने कत्लेआम और अत्याचार शुरू कर दिए थे, कि भारत के सभी लोग कहने लग पड़े थे कि:----- तैतारियों को लेकर तैमूर लंग आए। दिल्ली के रहने वाले जानों से तंग आए। कातिल तैमूरलंग ने भारतवर्ष के लोगों का जीना मुहाल कर दिया था। भारतवासियों को अंधाधुंध मौत के कुएं में फैँकता जा रहा था, कहीं किसी की कोई दलील अपील नहीं चलती थी, बस मौत का तांडव नृत्य करता जा रहा था, अब यही हाल 2014 से शुरू हुआ है। माबलिंचिंग की खुली छूट देकर अछूतों और मुसलमानों को दिनदहाड़े दस, बीस गुंडे पशुओं की तरह पीटते हैं और वे अंततः मार दिये जा रहे हैं। आप ने देखा होग...

मूलनिवासियों के प्रति मनुवादियों की मानसिकता।

मेरे 85% मूलनिवासी साथियो, सोहम, जय गुरुदेव! मनुवादी चाहे कितने भी बड़े विद्वान बन जाएं? कितने ही बड़े राजनेता बन जाएं? कितने ही बड़े दार्शनिक बन जाएं? कितने ही बड़े धर्मात्मा बन जाएं? मगर इन लोगों की कमीनी जातिवादी मानसिकता कभी नहीं बदल सकती है, क्योंकि जब यह लोग अपने घरों में बैठ कर के अपने परिवार में, अपने मनुवादी भाईचारे के बीच बैठ कर आपस में बातचीत, विचार मंथन करते हैं, तो केवल 85% मूलनिवासियों को गुलाम बनाए रखने के लिए ही ये लोग योजनाएं बनाते हैं और उन को सिरे चढ़ाने के लिए अनेकों प्रकार के सुझावों का आपस में आदान-प्रदान करते हैं। ये सभी लोग भलीभांति जानते हैं, कि यदि 85% मूलनिवासियों को अपना गुलाम बना कर, सेवा करवानी है, तो इन को भूमिहीन और विपन्न बनाए रखना बहुत ही जरूरी है, क्योंकि यदि मूलनिवासी धन धरती के मालिक बन गए तो ये कमाऊ पूत अपने खेतों में अन्न धन पैदा कर के हमारे खेतों में काम नहीं करेंगे, इसीलिए जब 1947 में मुसलमान 400000 एकड़ भूमि छोड़ कर पाकिस्तान चले गए थे, तब हमारे नेता साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवालिया, स्वामी अछुतानंद जी, डाक्टर भीम राव अंवेदकर आदि ने केंद्रीय सर...

मूलनिवासियो पा का खून अमीर पी रहे।

मेरे 85% मूलनिवासी साथियो, सोहम, जय गुरुदेव! वर्तमान राजा और प्रजा के संबंधों के बारे में आप लोग तनिक भी गंभीरता से सोच विचार नहीं कर रहे हैं। आज 85% लोग दिन रात मजदूरी करते हुए पुलों, सड़कों, बांधों, बड़े-बड़े आलीशान बंगलों, विश्राम गृहों, विशाल भवनों को बनाते समय अपना खून पसीना बहा रहे हैं, दिन-रात कोल्हू के बैल की तरह काम करते जा रहे हैं। काम करते समय आप लोग दीवारों से गिर कर बेमौत मर रहे हैं, बांधों में काम करते करते डूब कर मर रहे हैं, सड़कों पर काम करते करते चट्टानों से गिर कर, चट्टानों की स्लाइडिंग से, बिजली के खंभों से गिर कर, बिजली की तारों को बिछाते समय कई मजदूर शहीद हो जाते हैं। नदियों, नालों और समुद्रों में पुल बनाते समय ना जाने कितने मजदूर खडडों के बीच दब कर मर जाते हैं, ना जाने कितने ही चालक (ड्राईवर) दूरदराज, अति दुर्गम स्थानों, पहाड़ों के ऊपर गाड़ियां चलाते समय दुर्घटनाग्रस्त हो कर के मारे जाते हैं। सीमाओं के ऊपर इन्हीं मजदूरों के बच्चे अंधाधुंध मरवाए जाते हैं, जिन के नाम पर गन्दी राजनीति कर के चुनाव जीते जाते हैं। भारत के मनुवादी शासकों और प्रशासकों के दिल इतने पत्थर ह...

स्वाति मिश्रा का अनर्गल विलाप।

 मेरे 85% मूलनिवासी साथियो, सोहम, जय गुरुदेव!  मैंने स्वाति मिश्रा नामक ब्राह्मण लड़की की एक पोस्ट मोबाइल पर देखी, जिस को पढ़ कर के बड़ी हैरानी हुई, कि ब्राह्मण जिन राजपूतों के कंधों के ऊपर अपनी तलवारें रख करके अछूतों और मुसलमानों को बड़ी निर्दयता और गुंडागर्दी से माबलिंचिंग द्वारा मरवा कर अपनी श्रेष्ठता को बरकरार रखते हैं और खुद कभी भी किसी से नहीं टकराते हैं। गुजरात में गाय के नाम चार चमार युवाओं की पिटाई का किस्सा अच्छे इंसानों के रोंगटे खड़े कर देता है। इस कांड को एक ब्राह्मण युवा, चार शूद्र (ओबीसी) युवाओं से करवाता है और खुद दूर खड़ा हो कर तमाशा देखता रहा। ये हैवान गरीबों की निर्मम पिटाई देख कर खुश हो कर जश्न मनाता रहा। ये पत्थर ब्राह्मण खुद ऐशो आराम की जिंदगी जीते हुए, मौज मस्ती करते हुए आराम से खाना खाते हैं। जिन राजपूतों की करणी सेना, बजरंग दल, दुर्गा वाहिनी, शिव सेना और शूद्रों (ओबीसी) से अछूतों और मुसलमानों को आए दिन दुख दिलाते रहते हैं, उन्हीं राजपूतों को संबोधित करती हुई, वे लिखती हैं कि:--- 1 हम वह ब्राह्मण हैं जिसने तीन पग में तीनो लोक नाप डाले।  2 हम वह ब्र...

अधूरे सफर की पूरी कहानी।

 मेरे 85% मूलनिवासी साथियो, सोहम, जय गुरुदेव!  भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र दास मोदी लगभग 100 देशों का सैर सपाटा कर के,भारत के इतिहास की विश्व को विस्तार से जानकारी दे आए हैं। भारत के नाम को चार चांद लगाने वाले ये भारत के पहले प्रधानमंत्री सिद्ध हुए हैं। इस से पूर्व जितने भी राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री हुए हैं, उन का ज्ञान इस विद्वान प्रधानमंत्री से बहुत पीछे रहा है, जिस जिस इतिहास की उन्होंने खोज की है, वह अत्यंत सराहनीय है। ऐसा इतिहास बनाने वाले मोदी जी का कोई सानी नहीं है।  अमेरिका के दौरे पर जा कर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने कहा, कि कोणार्क का सूर्य मंदिर 2000 साल पुराना है, जब कि यह मंदिर केवल 700 साल पुराना है। उस के बाद नवंबर 2003 में विश्व गुरु मोदी जी अपने वक्तव्य में, मोहन लाल करमचंद गांधी कहा, जब कि गांधी का असली नाम मोहनदास करमचंद गांधी है। वर्ष 2013 में बिहार के पटना में एक रैली हुई थी, जिस में मोदी ने बिहार की अपार शक्ति का वर्णन करते हुए कहा था, कि सम्राट अशोक, पाटलिपुत्र, नालंदा और तक्षशिला, बिहार की सम्पदा है, जब कि सत्य यह है कि तक्षशिल...

मूलनिवासियों शेरनी का दूध सोने के बर्तन में टिकता है भैंस का नहीं क्यों

  मेरे 85% मूलनिवासी साथियो, सोहम, जय गुरुदेव! कहा जाता है कि शेरनी का दूध सोने के बर्तन में ही ठहरता है। यह कहां तक सत्य है, इस के बारे में तो हम पूर्णरूपेण जानते नहीं हैं मगर यदि इस कथन को सत्य भी मान लें, तो यह समझा जा सकता है कि शेर और शेरनी अत्यंत ही खूंखार निर्दयी और कुरूर जानवर हैं, जिन के सामने कोई आ जाए, उस के गले को दवा कर उस के खून को पी जाते हैं और यही खून शेरनी के दूध को इतना ताकतवर बना देता है कि वह सोने के बर्तन के सिवाय किसी बर्तन में ठहरता ही नहीं है, भले ही यह कहावत भी हो सकती है मगर इस कहावत से भी एक लैशन अवश्य मिलता है, कि ये जानवर प्राणियों का खून पीता है। ताजा मांस खाता है। तभी ये जानवर अन्य जानवरों से अधिक शक्तिशाली और अजेय होता है, मगर इस के विपरीत यदि देखा जाए तो जो जानवर घास ही घास खाते हैं, वे भी कितने हृष्ट पुष्ट, हटे कटे, मोटे शक्तिशाली और विशालकाय बन जाते हैं, परंतु इतने शक्तिशाली होने के बावजूद भी वे शेर और शेरनी का मुकाबला नहीं कर पाते हैं।सभी एक-एक करके शेर और शेरनी का शिकार होते ही जाते हैं और सभी असहाय हो कर मारे जाते हैं। भय के मारे अपने साथी क...

जाति वाद छुआछूत खत्म क्यों नहीं किया जाता?

  मेरे 85% मूलनिवासी साथियो, सोहम, जय गुरुदेव! सातवीं शताब्दी में मोहम्मद बिन कासिम ने भारत पर आक्रमण कर के मुसलमानों का शासन स्थापित कर दिया था, जो सन् सोलह सौ तक चलता रहा था, इसी समय ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने भी भारत में घुस कर अपने पांव पसारना शुरू कर दिए थे। सन 1857 में ब्रिटिश सरकार ने भारत को पूर्ण रूप से अपने अधीन कर लिया था। 15 अगस्त 1947 तक भारत में ब्रिटिश शासन चलता रहा। इस शासन काल में क्रूर हिंदुओं द्वारा स्थापित हैवानियत के काले कानून नर-नारी बलि प्रथा, पशु बलि प्रथा, सती प्रथा, देवदासी प्रथा, नियोग प्रथा, छुआछूत प्रथा, देव दासी प्रथा, शूद्रों की नव वर वधु शुद्धी करण प्रथा, चरक पूजा प्रथा और गंगा दान प्रथा जारी थी, जिन को ब्रिटिश सरकार ने रद्द कर के गैर कानूनी घोषित कर के अपराध करार कर दिया था। बलि प्रथा: --- मनुस्मृति के अनुसार भारतवर्ष में देवताओं को खुश करने के लिए केवल सभी जातियों की नारियों और शूद्रों की बलि दी जाती थी। अंग्रेजों ने मनुस्मृति के इस पाश्विक कानून को सन 1830 ईस्बी में रद्द कर दिया था मगर वर्तमान कांग्रेसी और भाजपा सरकार ने इस अमानवीय कानून को...

आदि लिपि और मनुवादी छल कपट।

  मेरे 85% मूलनिवासी साथियो, सोहम, जय गुरुदेव! आठवीं शताब्दी में गुजरात के राजा जय भट्ट के समय में देवनागरी लिपि के प्रचलन का प्रारंभ मिलता है। राष्ट्रकूट के नरेशों के शिलालेखों से ज्ञात होता है कि उन के समय में ही नागरी लिपि का प्रचलन शुरू हुआ था। उस समय भारतवर्ष में केवल तीन ही लिपियां मिलती हैं। सिंधुघाटी लिपि, जिसे अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है। खरोषट्री लिपि शाहबाज गढ़ी और मान सेता में मिले कुछ शिलालेखों से इस लिपि का पता चला है। ब्राह्मी लिपि का प्रचलन ईसवी पूर्व 500 से लेकर के 350 ईसवी तक रहा है। इस समय सम्राट अशोक के वंशज भारतवर्ष में शासन कर रहे थे, यानी कि इस समय भारतवर्ष में संस्कृत भाषा नहीं थी, जब कि भारत के वेद, पुराण और दर्शन- शास्त्रों की भाषा संस्कृत मानी गई है और संस्कृत के विद्वान इन को अपौरुषय मानते हैं अर्थात संस्कृत में लिखी गई पुस्तकें पुरूषों द्वारा नहीं लिखी गई हैं। जिन को दैवीय शक्तियों ने लिखवाया हुआ है। इसी भाषा को देववाणी कहा गया है। युरेशियन का इतिहास :--- भारत का इतिहास बताता है कि, युरेशयन लोग जब कबीलों के रूप में बारी बारी आ कर भारत में घुसे थे, ज...

जनरल सीटों से मूल निवासियों को क्यों चुनाव नहीं लड़ाया जाता

  मेरे 85% मूल निवासियो, सोहम, जय गुरुदेव! भारत में आप की आबादी 85% है मगर आप लोगों को विधानसभाओं, संसद और राज्यसभा  में केवल मात्र साढे 15% सीटों के ऊपर ही चुनाव क्यों लड़ाया जाता है? मूलनिवासियों की  आबादी के अनुसार 85% संसद और विधान सभाओं की सीटों के ऊपर अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़ी जाति और अल्पसंख्यक उम्मीदवारों को चुनाव लड़ाया जाना चाहिए और मनुवादियों की 15% आबादी के अनुसार केवल 15% विधायक और सांसद चुने जाने चाहिए। इस षड्यंत्र के पीछे क्या राज है? इस छल कपट को समझने का आप प्रयास नहीं करते हैं और आप अंधाधुंध 85% मनुवादियों को ही संसद, राज्यसभा, विधान सभाओं और लोकल सेल्फ गवर्नमेंट में चुन कर भेजते हैं। मूलनिवासी बुद्धिजीवी: --- अधिकतर 85% मूलनिवासी बुद्धिजीवी यह सोचने का कष्ट नहीं करते हैं, कि भारत के अल्पसंख्यक लोग बहु संख्यक लोगों के ऊपर शासन क्यों करते आ रहे हैं? जो मूलनिवासी विचारक, थिंकर इन गंभीर विषयों पर चिंतन करते हैं, शोषण के खिलाफ आंदोलन करते हैं, मनुवादी सरकारों के साथ संघर्ष करते हैं, उन के साथ भी है ये सभी स्वार्थी कायर बुद्धिजीवी  सहयोग नहीं करत...

मनुवादियों को मूलनिवासी नारी प्यारी क्यों लगती है

  मेरे 85% मूलनिवासियो, सोहम, जय गुरुदेव! भारत की जाति व्यवस्था ऐसी है जिसमें नारी के साथ किसी को भी तनिक भी छुआछूत नहीं है और मनुवादी नारी को भी ब्राह्मण, राजपूत, वैश्य और शूद्रों से कोई छुआछूत नहीं होती है, मगर मनुवादी ब्राह्मण, राजपूत और वैश्य पुरुष ही अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़ी जाति और अल्पसंख्यक मर्दों के साथ ही छुआछूत करते हैं, केवल मर्दों को ही अछूत समझते हैं, इन के छूने से ये मनुवादी मर्द अपवित्र हो जाते हैं, इन के साथ खाने पीने से अपवित्र हो जाते हैं, शूद्र मर्दों के साथ ये लोग स्पर्श करने तक अछूत हो जाते हैं मगर अछूत औरत ब्राह्मणों, राजपूतों, वैश्यों को प्यारी लगती है, क्यों? मनुवादी संविधान : - ---- मनुस्मृति मनुवादी संविधान है जो केवल और केवल मनुवादी लोगों की मौज-मस्ती, विलासिता, ऐश्वर्या के लिए पूर्ण रूप से स्वतंत्रता देता है। नारी शक्ति को केवल अपने भोग विलास की वस्तु समझ कर उस के शरीर के साथ खिलवाड़ करने की पूर्ण इजाजत देता है। नारी चाहे मनुवादी ही क्यों ना हो, वह भी मनुवादी पुरुष के लिए मनोरंजन और भोग की वस्तु है। मनुवादी संविधान के अनुसार नारी जाति कठिन दिनों...

85% मूलनिवासी कब तक 15% सीटों पर चुनाव लड़ते रहेंगे

  मेरे 85% मूल निवासियो, सोहम, जय गुरुदेव! भारत में आप की आबादी 85% है मगर आप लोगों को विधानसभाओं, संसद और राज्यसभा  में केवल मात्र साढे 22% सीटों के ऊपर ही चुनाव क्यों लड़ाया जाता है? मूलनवासियों की  आबादी के अनुसार 85% संसद और विधान सभाओं की सीटों के ऊपर अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़ी जाति और अल्पसंख्यक उम्मीदवारों को चुनाव लड़ाया जाना चाहिए और मनुवादियों की 15% आबादी के अनुसार केवल 15% विधायक और सांसद चुने जाने चाहिए। इस षड्यंत्र के पीछे क्या राज है? इस को छल कपट को समझने का आप प्रयास नहीं करते हैं और आप अंधाधुंध 85% मनुवादियों को ही संसद, राज्यसभा, विधान सभाओं और लोकल सेल्फ गवर्नमेंट में चुन कर भेजते हैं। मूलनिवासी बुद्धिजीवी: --- अधिकतर 85% मूलनिवासी बुद्धिजीवी यह सोचने का कष्ट नहीं करते हैं, कि भारत के अल्पसंख्यक लोग बहु संख्यक लोगों के ऊपर शासन क्यों करते आ रहे हैं? जो मूलनिवासी विचारक, थिंकर इन गंभीर विषयों पर चिंतन करते हैं, शोषण के खिलाफ आंदोलन करते हैं, मनुवादी सरकारों के साथ संघर्ष करते हैं, उन के साथ भी है ये सभी कायर बुद्धिजीवी  सहयोग नहीं करते हैं, ...