मूलनिवासियों स्वाभिमान से जीना सीखो

मेरे 85% मूलनिवासी साथियो, सोहम, जय गुरुदेव! जब से सिंधुघाटी की सभ्यता धवस्त कर के यूरेशियन आक्रमणकारियों ने छल बल कर के आप को गुलाम बनाया हुआ है, तब से आप का सारा इतिहास, सभ्यता, संस्कृति और भाषा को खत्म करके छद्म राज शुरू की हुआ है। आप लोगों का स्वाभिमान इतना गिरा दिया गया है कि आप अपने आप में भूल चुके हैं कि हम भी इंसान हैं। आपके अंदर इतनी हीनता भर दी गई है कि आप स्वाभिमान को समझ नहीं पा रहे हैं। आप का आदधर्म स्वाभिमानी धर्म था मगर उस को समूल नष्ट कर के आप के ऊपर धार्मिक गुलामी थोंप दी है। सिंधु घाटी की सभ्यता के बाद यूरेशियन लोगों के पास कोई धर्म नहीं था जिसके कारण महात्मा बुद्ध ने बौद्ध धर्म की स्थापना कर दी थी जो सारे भारत में फैल गया था इस बौद्ध धर्म को भी कलंकित करने के लिए भी मनु वादियों ने इस के बीच घुसपैठ कर दी थी और घुस कर के बौद्ध धर्म के दो खंड कर दिए थे, महायान अपने मनुवादियों के लिए और हीनयान आप लोगों के लिए बना दिया था, जिस के कारण आप अपना धार्मिक स्वाभिमान भी खत्म कर बैठे। स्वाभिमान से जीना सीखो:---- हे मेरे देश के पचासी प्रतिशत गुलामो जागो, अपनी आत्मा को झकझोड़ कर देखो, अपने अतीत को पढ़ो और उसका विश्लेषण कर के देखो, कि 5000 वर्षों से आप को किस प्रकार पशुओं की तरह जीने के लिए विवश किया हुआ है? निर्दयी यूरेशियन लोगों ने आप को गुलाम बनाए रखने के लिए किस किस प्रकार के फतवे लगाए हुए हैं? आज भी आप आर्यों के साथ स्पर्श तक नहीं कर सकते हो, उन के साथ तुम रोटी, बेटी का संबंध और व्यवहार नहीं कर सकते हो, तुम इन के मंदिरों में प्रवेश नहीं कर सकते हो! आप ही  मनुवादियों के भवनों और मंदिरों का निर्माण करते हो मगर निर्माण करने के बाद आप उन के बीच घुस तक नहीं सकते हो,अगर घुसकर स्पर्श कर भी लें, तो आप को प्राणों से हाथ धोने पड़ते हैं, इतने अमानवीय अत्याचार होने पर भी आप लोग अपने स्वाभिमान को नहीं समझते हो! आप अपने मरे हुए स्वाभिमान को जिंदा करो और स्वाभिमान से जीना सीखो अन्यथा पशुओं और आपके बीच कोई अंतर नहीं रहेगा। मनुवादी धर्म ग्रन्थ खून खराबे से भरे हुए हैं:--- मनुवादियों के धर्म ग्रंथ खून खराबे से भरे हुए हैं, कल्पित अवतार राम,कृष्ण के द्वारा खून की नदियाँ वहा कर आप को राक्षस सिद्ध करके जलील किया गया है, आप के महापुरुषों के सिरों के ऊपर सींग लगा कर काले, नीले, कपड़े पहना कर के काले मुंह कर के अति मानव बना कर के, अपने मंदिरों में गुर्ज ले कर बेशकल बना कर, चौकीदार बना कर बैठाया आया हुआ है, जिन को देखने मात्र से ही मन में नफ़रत और घृणा पैदा हो होती है। जब आप के छूने से ये लोग भ्रष्ट हो जाते हैं, आप के हाथों से खाने पीने पर यह लोग अपवित्र हो जाते हैं, अपने बराबर चारपाई और ऊंचे स्थान पर, कुर्सी पर बैठने से ये लोग आप से खफा हो कर आप को मारते है, घोड़ी के ऊपर चढ़ने पर आप की पिटाई करते हैं, आप के मंदिर प्रवेश करने से मनुवादियों के मंदिर अपवित्र हो जाते हैं, भ्रष्ट हो जाते हैं, स्पर्श मात्र से कलुषित हो जाते हैं, आप का प्रसाद मंदिरों में स्वीकार नहीं किया जाता है, जब कि इन के मंदिरों में बैठी पाषाण मूर्तियों के ऊपर कुत्ते, बिल्ले, बंदर, चूहे उछल कूद कर सकते हैं, पेशाब कर सकते हैं मगर आप उन में प्रवेश तक नहीं कर सकते हैं, ना ही इन के पत्थरों से बनाए गए देवताओं को स्पर्श करने के लिए उन के नजदीक जा सकते हैं, तो फिर आप इन के  धार्मिक स्थलों पर जा कर अपमानित क्यों होते हैं? आप लोग स्वाभिमान से क्यों नहीं जीते हो? हर आदमी का स्वाभिमान ही सर्वोच्च है और जो व्यक्ति स्वाभिमानी नहीं होते हैं, उन का कोई भी मान-सम्मान नहीं करता है और हर व्यक्ति उसे हीनता की भावना से देखता है। जब तक आप को स्वाभिमान की पहचान नहीं होगी, तब तक तुम पशुओं की ही जिंदगी जीते रहोगे, आप की अपेक्षा तो भारतीय पशु पक्षी ही बंदनीय और पूजनीय है, सांप और बैल शिव के मंदिर के सामने बैठा रहता है, जिस के खुरों की बंदना करने के बाद उन की पत्थर की मूर्ति को दूध से नहलाया जाता है। आप लोगों से तो पत्थर का लिंग श्रेष्ठ, पवित्र और पूज्य माना जाता है मगर आप लोग इन पत्थर के लिंगों को उकेर और तराश कर के बनाते हैं और मंदिरों में स्थापित करते हैं, स्थापना के बाद ये मरे हुए पत्थर पवित्र हो जाते हैं मगर आप अपवित्र ही रहते हो! आप लोग इस छल, कपट, प्रपंच को तनिक भी नहीं समझते हैं और अपनी मरी हुई निर्जीव आत्मा को तनिक भी जगाने का प्रयास नहीं करते हैं, कि जिस गंदे मंदे पत्थर से हम ने मूर्ति को अपनी दूरदृष्टि और बुद्धिमत्ता से चीरा है, तराशा है, उस को हम स्पर्श क्यों नहीं कर सकते हैं? हम उस के पास नतमस्तक हो कर के नमन क्यों नहीं कर सकते हैं? इस छल, कपट और प्रपंच को समझो! अपनी मरी हुई आत्मा को जिंदा कर के आत्मसम्मान को समझो! स्वाभिमान से जीने का प्रयास करो, अन्यथा तुम मजदूर बन कर के ही गंदगी साफ करते हुए ही जिंदगी जीते रहोगे, जब कि कोई भी जाट, ब्राह्मण, राजपूत और बानिया आप की तरह पेट भरने के लिए दुर्गन्ध से भरे हुए शौचालयों में नहीं सोता है, शौचालयों में बैठ कर खाना नहीं खाता है, सारी आयु मजदूर बन कर मजदूरी कर के पेट नहीं भरता है, इसलिए आप जागो! जागो! मूलनिवासियो स्वाभिमान से जीना सीखो! राम सिंह आदवंशी। हिमाचल प्रदेश। महासचिव, वहुजन मुक्ति पार्टी, हिमाचल प्रदेश।

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