मनुवादी आंतरिक रुप से एक है सिर्फ स्वार्थ के लिए पाशा पढ़ते हैं

मेरी 85% मूलनिवासी साथियो, सोहम, जय गुरुदेव! बड़ी हैरानी की बात है कि भारत के मूलनिवासी शूद्र और अछूत 85% होते हुए भी शताब्दियों से मुट्ठी भर मनुवादी लोगों के गुलाम बन कर जीते आ रहे हैं। आजादी से पूर्व तो विदेशी तानाशाहों का शासन था, उस से पहले मनुस्मृति के हैवानों का शासन चलता था मगर आजादी के बाद तो मूलनिवासियों को भी समानता के अधिकार के साथ मौलिक अधिकार भी मिल चुके हैं। साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवालिया जी के कड़े संघर्ष के बाद आरक्षण जैसी सुविधाएं भी उपलब्ध हो चुकी हैं, इस के बावजूद भी 85% मूलनिवासी आज भी मनुव्यवस्था के गुलाम ही हैं, जिस का मुख्य कारण पूना पैक्ट है। पूना पैक्ट ने सभी मूलनिवासियों के अधिकारों को छीन कर पुन: मनुवादियों की गुलामी थोंप दी है, मगर फिर भी मूलनिवासी अपने वोट की कीमत नहीं पहचानते हैं। यदि मूलनिवासी अपने ही मूलनिवासी को वोटिंग करते, तब भी गुलामी का अंत हो सकता था, मगर मूलनिवासी राजनेताओं की अहंकार पूर्ण प्रवृत्ति के कारण ये घमण्डी लोग कभी एक फ्रंट में शामिल होकर 15% मनुवादियों के साथ मुकाबला नहीं करते हैं और अपनी अलग-अलग डफली बजा कर, अपनी अपनी राजनीतिक दुकाने चला कर के, अपने परिवार का पालन पोषण करते हैं। मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, राम विलास पासवान, मायावती, इस के वर्तमान खलनायक हैं। आरक्षण की सुविधा से बने अधिकतर कर्मचारी, अधिकारी, विधायक और सांसद इतने स्वार्थी बन चुके हैं, कि इन को अपने बच्चों के सिवाय कोई और गरीब नजर ही नहीं आता है, जब कि आरक्षण केवल अछूतों को ही दिया गया था, ताकि ये लोग अन्य जातियों के समान विकसित हो सकें मगर जो अछूत मनुवादियों के बराबर हो चुके हैं, वही आरक्षण को अपना जन्मसिद्ध अधिकार मान कर के गरीब अछूतों के पेट में लात मारते आ रहे हइन। मूलनिवासी राजनेता इतने काफर हैं कि अपने गरीब मूलनिवासी भाईयों और बहनों की हड्डियों पर अपनी रोटियाँ सेंकते आ रहे हैं, इन को 85% मूलनिवासियों के साथ हो रहे अत्याचारों, ब्लात्कारों, शोषणों को देख कर इन का सीना जरा भी नहीं फटता है। मनुवादी अपने वच्चों के भविष्य के लिए अपने गद्दार को मिट्टी में मिला देते हैं:---जब कोई मनुवादी राजनेता मनुवादियों के खिलाफ कोई काम करते हैं या मनुवादियों की इच्छा के अनुसार काम नहीं करते हैं, तब ये लोग अपने ही बड़े बड़े नेताओं को मिट्टी में मिला देते हैं। जब कांग्रेस की नीतियों से तंग आ कर पूर्व प्रधान मंत्री वीपी सिंह ने कांग्रेस से विद्रोह कर दिया और सारे विपक्ष को एक मंच पर इकट्ठा कर दिया था, तब मनुवादियों ने वीपी सिंह को एक सन्यासी करार दे दिया था और तब कहा था:----- बी पी सिंह फकीर है। भारत की तकरीर है। बीपी सिंह आगे बढ़ो। हम तुम्हारे साथ हैं। ऐसे नारों के साथ सारे देश की गलियां और कूचे थर्रा रहे थे, यही नारे हर स्थान पर सुनाई दे रहे थे मगर जब वी पी सिंह ने मनुवादियों की इच्छा के विरुद्ध, उन के नौकरी के अधिकारों को कम करने का काम किया था, तब इन्हीं मनुवादियों ने अपने ही योग्य, ईमानदार मनुवादी प्रधानमंत्री को गद्दी से उतार कर रद्दी की टोकरी में डालने के लिए सारे देश में खूनी आंदोलन की आग लगा कर सारा देश जला दिया था और अपने ही राजपूत भाई वी पी सिंह की सरकार को गिरा कर चैन ली थी, इस घटना से मूलनिवासी राजनेता तनिक भी सीख नहीं लेते। मनुवादी अपने गद्दारों को सत्ता से हटा देते:--- जब कोई भी मनुवादी मंत्री, मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री उन की इच्छा के विरुद्ध जा कर के काम करता है, तो मनुवादी अपने ही प्रधानमंत्री, मंत्री और मुख्यमंत्री को कुर्सी से हटा देते हैं। जिस का प्रमाण बंगाल की नेत्री ममता बनर्जी है जिस ने भाजपा की पूंछ पकड़ी और रेलमंत्री बन गई। जब आर एस एस और भाजपा के साथ उस की दाल नहीं गली तो भाजपा को धत्ता दिखा कर अपने पाँव पर खड़े हो कर मुख्यमन्त्री बन गई, अब अपने स्वार्थ के लिए कांग्रेस की पूंछ पकड़ रही, इसी तरह दिल्ली का मुख्यमन्त्री भी भाजपा की काली नीतियों का समर्थन करता रहता। कम्युनिस्ट भी स्वार्थी हैं:--भारत के कम्युनिस्टों ने मूलनिवासी वोटरों के सिर पर निरंतर 30-35 वर्षों तक पश्चिमी बंगाल में शासन किया और अन्य राज्यों में भी ये लोग चुनाव लड़ कर कांग्रेस के साथ मिल कर अपने विधायक और सांसद जिताते रहे हैं मगर जब कम्युनिस्टों ने कांग्रेस की बर्बादी करना शुरू कर दी थी, तो कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी ने खुद ही अपने ब्राह्मणों की कम्युनिस्ट सरकार को मिट्टी में मिला दिया और आज कम्युनिस्ट पार्टी का नामोनिशान तक मिटता जा रहा है, यदि यह कम्युनिस्ट कांग्रेस के खिलाफ गठबंधन नहीं बनाते तो आज इन की यह दुर्दशा नहीं हो सकती थी, अब कम्युनिस्ट फिर कांग्रेस की पूंछ पकड़ रहे हैं और कांग्रेस भी इन को अपनी छाती से लगा रही है। आप पार्टी गिरगिट का दूसरा नाम:---अपनी राजनीतिक यात्रा आरंभ करने से पहले दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल ने आरक्षण के विरोध में जंग लड़नी शुरू की थी जिसके परिणाम स्वरूप मनुवादियों ने उस को अपने सिर का ताज बना लिया और अन्ना हजारे आंदोलन में मनुवादियों ने अपनी बी टीम के रूप में केजरीवाल को उभारना शुरू कर दिया। तत्कालीन कांग्रेस की दिल्ली सरकार ने केजरीवाल को कानून का उल्लंघन करने के बावजूद भी जेल में नहीं डाला और केजरीवाल निडर हो कर के बिजली की तारों को जोड़ता रहा, मगर दिल्ली के बिजली विभाग ने कोई कार्यवाही नहीं की और उस को राजनीतिक क्षितिज में उभारते ही गए। बाद में जब दिल्ली विधानसभा का चुनाव हुआ तो उस को भी वोटिंग मशीन के द्वारा 70 विधानसभा सीटों में से सतासठ सीटों के ऊपर सफलता दिखा कर के दिल्ली का मुख्यमंत्री बना लिया। केजरीवाल बाहर से मोदी और शाह का दुश्मन प्रदर्षित करता है मगर अंदर से सभी मित्र ही हैं। केवल 85% मूलनिवासी जनता को मूर्ख बना कर मनुवादियों के लिए काम कर रहा है। जो भी अछूत नेता केजरीवाल को अछूतों के कल्याण के लिए कोई मांग करता है, उस को हटा देता है या उस को पार्टी से निकाल देता है, इसलिए आप पार्टी भी कांग्रेस और भाजपा की ही सगी बहन है, जिस पर मूलनिवासियों को तनिक भी विश्वास नहीं करना चाहिए। 85% मूल निवासियों को कसम खा लेनी चाहिए:--- 85% मूलनिवासियों को कसम खा लेनी चाहिए, कि हम ने कांग्रेस, भाजपा और आप पार्टी को कभी वोट नहीं डालना है और ना ही अपने लोगों को वोट डालने देना है। जब ये लोग मूलनिवासियों को बरगलाने के लिए यह कहें, कि अगर आप ने वोट बहुजन मुक्ति पार्टी को दिया तो आप का वोट खराब जाएगा। आप को इस की चिंता नहीं करनी चाहिए और अपना वोट और नोट केवल मूलनिवासी उम्मीदबार को ही देना होगा, चाहे वोट जीते या हारे मगर वोट केवल मूलनिवासी अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़ी जाति और अल्पसंख्यक उम्मीदवारों को ही डालना होगा। कभी ना कभी तो एक दिन अवश्य ही काम आएगा, जब आप सभी मूलनिवासियों की सरकार बन सकेगी तभी भारत में मनुवादी गुंडागर्दी,बलात्कार,अत्याचार, माबलिंचिंग बंद हो सकेंगी। मूलनिवासी अपने रिश्तेदारों को भी समझा दे:--- 85% मूलनिवासी अपने बोटों को इकट्ठा करने के लिए अपने रिश्तेदारों को यह समझा दें कि आज के बाद आप ने कभी भी मनुवादी कम्युनिस्ट, कांग्रेस, आप और भाजपा आदि पार्टियों को कदापि वोट नहीं डालना है। केवल अपने ही मूलनिवासी उम्मीदवार को वोट डाल कर के अपनी सरकार बनानी है। आगे भी अपने रिश्तेदारों को कहें, कि आप केवल वहुजन मुक्ति पार्टी को ही वोट दो। बसपा ब्राह्मण समाज पार्टी बन चुकी है:--- साहिब कांशीराम के कंधे के साथ कंधा मिला कर के 85% मूलनिवासियों ने अपने खून पसीने की गाढ़ी कमाई से बहुजन समाज पार्टी बना कर सत्ता तक पहुंचाया मगर बसपा के खुदगर्ज ठेकेदारों ने बसपा को ब्राह्मणों के हाथ बेच दिया है, जिस से बसपा ब्राह्मण समाज पार्टी बन चुकी है, इसी लिए 85% मूलनिवासियों को बसपा से तत्काल किनारा कर लेना चाहिए और केवल बहुजन मुक्ति पार्टी को ही वोट डाल कर के वहुजन राज की स्थापना कर के साहब कांशी राम जी के अधूरे कारवां को पूरा कर के उन को सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित करनी होगी, सब की इसी में बेहतरी होगी क्योंकि यदि पुराना घर जल जाए तो फिर नया घर बनाना ही पड़ता है। बबुआ- बुआ वहुजन के दुश्मन:---मायावती और अखिलेश दोनो ने आपस में लड़-लड़ कर के 85% मूलनिवासियों को हैवानों के सुपुर्द कर दिया है। ये हैवान अपने बुलडोजर के साथ दिन प्रतिदिन अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़ी जाति और अल्पसंख्यकों के घरों को नेस्तनाबूद करते जा रहे हैं, यदि ये दोनों ही नेता मान्यवर वामन मेश्राम के सुझाव को मान लेते और दोनों मिल कर के चुनाव लड़ते तो आज उत्तर प्रदेश के मूलनिवासियों की दुर्दशा ना होती और ना ही वहां कोई बुलडोजर चलता, इसलिए समस्त  मूलनिवासी तत्काल वहुजन मुक्ति पार्टी के झंडे तले इकट्ठे हो कर वहुजन राज की स्थापना करने में सहयोग करें। राम सिंह आदवंशी। महासचिव, बहुजन मुक्ति पार्टी हिमाचल प्रदेश।

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