आदि लिपि और मनुवादी छल कपट।

 

मेरे 85% मूलनिवासी साथियो,
सोहम, जय गुरुदेव!
आठवीं शताब्दी में गुजरात के राजा जय भट्ट के समय में देवनागरी लिपि के प्रचलन का प्रारंभ मिलता है। राष्ट्रकूट के नरेशों के शिलालेखों से ज्ञात होता है कि उन के समय में ही नागरी लिपि का प्रचलन शुरू हुआ था। उस समय भारतवर्ष में केवल तीन ही लिपियां मिलती हैं। सिंधुघाटी लिपि, जिसे अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है। खरोषट्री लिपि शाहबाज गढ़ी और मान सेता में मिले कुछ शिलालेखों से इस लिपि का पता चला है। ब्राह्मी लिपि का प्रचलन ईसवी पूर्व 500 से लेकर के 350 ईसवी तक रहा है। इस समय सम्राट अशोक के वंशज भारतवर्ष में शासन कर रहे थे, यानी कि इस समय भारतवर्ष में संस्कृत भाषा नहीं थी, जब कि भारत के वेद, पुराण और दर्शन- शास्त्रों की भाषा संस्कृत मानी गई है और संस्कृत के विद्वान इन को अपौरुषय मानते हैं अर्थात संस्कृत में लिखी गई पुस्तकें पुरूषों द्वारा नहीं लिखी गई हैं। जिन को दैवीय शक्तियों ने लिखवाया हुआ है। इसी भाषा को देववाणी कहा गया है।
युरेशियन का इतिहास:--- भारत का इतिहास बताता है कि, युरेशयन लोग जब कबीलों के रूप में बारी बारी आ कर भारत में घुसे थे, जिस के बारे में भारत के प्रथम प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू ने अपनी पुस्तक डिस्कवरी ऑफ इंडिया में विस्तार से वर्णन किया हुआ है, जिस से ज्ञात होता है कि ये लोग कितने सुशिक्षित थे, वे संस्कृत जैसी क्लिष्ठ भाषा के कितने बड़े मर्मज्ञ ज्ञानी हो सकते थे, सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। इस भाषा को कहा भी गया है "देववाणी"। हिंदी की लिपि का नाम भी देव नागरी मिलता है, जिस से स्पष्ट होता है कि युरेशियन लोगों ने भारत की सिंधु लिपि को बर्बाद कर के एक नई लिपि इजाद की थी, जिसे देवनागरी कहा गया है और वास्तव में ब्राह्मण लोग अपने आप को देवता ही कहलाते आए हैं। इतिहास में पूज्य सिद्ध करने के लिए कई प्रकार की तर्कहीन कथाएँ लिखी हुई हैं। आज ब्राह्मण अपने आप को सर्वोच्च मानता है, जब कि ऐसा कतई भी नहीं है। जितने भी ग्रंथ लिखे गए हैं, जितने अविष्कार किए गए हैं, उन में किसी ब्राह्मण का नाम तक नहीं है, फिर ये लोग देवता कैसे हो सकते हैं? इन की भाषा भी देववाणी कैसे हो सकती है? इन की लिपि का नाम भी देवनागरी कैसे हो सकता है? यदि सिंधु लिपि का कोई भी चिन्ह या नामोनिशान नहीं मिलता है और ना ही उसे पढ़ा जा सकता है, तो फिर यह अनुमान लगाया जा सकता है, कि सिंधु लिपि ही आदपुरुष से चली आ रही थी, जिस लिपि को ही पाली लिपि कहा जाता था। उस आदि लिपि को यूरेशियन ने भारत में आ कर के पूर्ण रूप से ध्वस्त कर दिया था, ताकि भारत के मानचित्र से मूलनिवासियों का इतिहास ही मिटा दिया जाए। भावी मूलनिवासी पीढ़ियों को अपने पूर्वजों का सुनहरा इतिहास ही उपलब्ध ना हो सके, इसलिए आज इतिहास और भाषा के शोधकर्ताओं को इस दिशा में काम करने की आवश्यकता है और सत्य को सामने लाने की कोशिश की जानी चाहिए, क्योंकि ब्राह्मणों ने जो कुछ सिंधु घाटी की सभ्यता के विध्वंस के बाद लिखा है, वह सारे का सारा कल्पनिक, झूठ और तर्कहीन साबित होता है। उन की कथाओं में तनिक भी सत्य नजर नहीं आता है, इसलिए इन की रचनाओं के ऊपर कोई भी विश्वास नहीं किया जा सकता है। देवी -देवताओं की मूर्तियों को देख कर के लगता है कि ये देवता ना हो कर के अति मानव हुए हैं, जिन का जन्म माता के गर्भ से कभी नहीं हो सकता है। किसी भी व्यक्ति के चार चार सिर कभी नहीं हो सकते हैं और ना ही किसी के मुँह जानवरों के मुखों की तरह हो सकते हैं, इसलिए ब्राह्मणों द्वारा लिखित संपूर्ण साहित्य अतार्किक, काल्पनिक और असत्य प्रतीत होता है। शिव शंकर ही सिंधु घाटी के अंतिम सम्राट थे और उनकी पत्नी गौरजाँ अंतिम सम्राज्ञी थी, जिन की मृत्यु के बाद उन का नामोनिशान खत्म कर के उन का चेहरा भी काले रंग में रंग कर के लोगों को भ्रमित कर दिया गया है, परंतु उन के मंदिरों और उन की मूर्तियों को आर्यों ने संभाल कर रख लिया है, ताकि उन के नाम से मंदिरों, छोटी बड़ी माढियों को संचालित कर के, निठल्ले बन कर के अपना पेट भरते रहे, जब उन के मंदिरों के नामों निशान नहीं मिटाए गए, तो फिर तत्कालीन सिंधु लिपि और सिंधु लिपि में लिखित दो करोड़ सालों से भी अधिक समय का विशाल साहित्य का भंडार संभाल कर क्यों नहीं रखा गया है? विचारणीय विषय है! उस से पहले भारत में जितने भी देवी देवता हुए हैं, उन का इन लोगों ने कोई इतिहास सुरक्षित नहीं रखा है, अगर इन का थोड़ा बहुत इतिहास सुरक्षित मिलता है, जो मूलनिवासियों की आदर्श सभ्यता और संस्कृति के मूल मंत्रों से अलग नहीं किया जा सका है, उदाहरण के रूप में सम्राट सिद्ध चानो, उनके पिता सम्राट कैलाश उन के पिता मंडल, बाबा चंडूर आदि का नाम उन के मंत्रों के बीच आज भी मिलता है, जिन मंत्रों को कोई भी आज तक बदल कर खत्म नहीं कर सका है और यही सच्ची शक्तियां हैं जिन को सच्ची सरकार के नाम से पुकारा जाता है। भारत के चारों वर्ण इन के सामने नतमस्तक हो कर के डरे डरे हुए रहते हैं, क्योंकि जब ये देवता किसी से कुपित हो जाते हैं, तो किसी के साथ कोई रिश्ता नहीं रखते हैं और जिस किसी व्यक्ति के ऊपर कुपित हो जाते हैं, उन के वंश को ही बड़ी निर्ममता से खत्म कर देते हैं, जब कि हिंदुओं के तेती करोड़ देवी-देवता, ब्रह्मा, विष्णु, महेश, राम कृष्ण किसी की ना तो सहायता करते हैं और ना ही कोई इन के पास शक्ति है और ना ही इन को कोई सच्ची सरकार कहता है बल्कि अपनी रक्षा के लिए धनुष बाण, सुदर्शन चक्र ले कर चलते थे, इन की मृत्यु भी आम आदमी की तरह ही हुई थी।
मनुवादी साहित्य :--- मनुवादी लोगों ने जो कथाएं लिखी हैं, वे सारी निराधार और असत्य की दहलीज के ऊपर खड़ी की गई हैं, इसीलिए इन को तर्क की कसौटी पर कसा जाए तो इन को स्वीकार नहीं किया जा सकता है, भले ही ये लोग धन दौलत के बल पर आज जगह जगह वेदों, रामचरितमानस और गीता के दस दस दिन व्याख्यान करते हैं, इन में से कथाएं लोगों को सुनाते हैं, मगर जो बुद्धिमान विद्वान होते हैं, वे तर्क के आधार पर विश्लेषण कर के सत्य को पहचानते हैं और तभी विश्वास कर के अंगीकार करते हैं। भारतवर्ष के 85% मूलनिवासियों को गीता, रामायण, पुराणों, दर्शन शास्त्रों और वेदों के अतिशयोक्तिपूर्ण वक्तव्यों के ऊपर कोई भी विश्वास नहीं होता है और ना ही इन कथाओं को कोई भी सुनना पसंद करता है, इसीलिए तो मूलनिवासी केवल संत मत के ऊपर विश्वास रखते हैं और जितने भी संत महापुरुष हुए हैं, वे सभी भारत के मूलनिवासी ही हुए हैं, उदाहरण के रूप में सतगुरु रविदास जी महाराज के नेतृत्व में संत मंडली के सदगुरु कबीर साहिब, सतगुरु नामदेव साहिब, सतगुरु सेन साहिब और सतगुरु साधना साहिब जी हैं।
देवनागरी लिपि का आरंभ:--- लगभग सात सौ वर्ष पहले देवनागरी लिपि का आरम्भ हुआ है अर्थात 700 वर्ष पहले यह लिपि नहीं थी। देश विदेश के भाषा वैज्ञानिकों के अनुसार देवनागरी लिपि का विकास ब्राह्मी लिपि से हुआ है, ब्राह्मी लिपि कई लिपियों के रूप में विभाजित हो चुकी है। ये दक्षिण और उत्तर भारत के नाम पर दो भागों में बंट गई थी। दक्षिण की भाषाएं ब्राह्मी लिपि से बिगड़ कर बनी हुई हैं, जिन्हें अपभ्रंश भी कहा जाता है मगर उत्तर भारत की ब्राह्मी लिपि को नगरों में बसने वाले लोगों ने सुधार कर के इस को नागरी लिपि का नाम दिया है। देवनागरी लिपि में केवल मनुवादी लेखक ही लिखा करते थे लिखने का काम भी केवल ब्राह्मण ही किया करते थे ताकि कोई दूसरी जाति का व्यक्ति उनके लिखी हुई कथाओं को पढ़ ही ना सके, यहां तक की राजपूत और वैश्य भी मनुवादी काल्पनिक कथाओं को पढ़ नहीं सकते थे, शूद्रों को तो पढ़ने लिखने का बिल्कुल भी अधिकार ही नहीं था ताकि ये पढ़ लिख कर के मनुवादी लोगों की हिप्नोटाइज करने वाली कथाओं को 85% मूलनिवासी पढ़ ही ना सकें, जिन को पढ़ कर, सुन कर मनुवादी, शूद्रों के साथ छुआछूत करते आए हैं, इसलिए गुरु रविदास जी महाराज को नई लिपि की खोज करनी पड़ी थी मगर उस गुरमुखी लिपि को भी मनुवादियों ने हाईजैक कर लिया था और गुरु रविदास महाराज के सेवकों को लाहौर हाईकोर्ट में कई वर्षों तक इस अन्याय के खिलाफ लड़ाई लड़नी पड़ी थी, सन 1932 में हाईकोर्ट ने अपने ऐतिहासिक निर्णय में कहा था कि गुरमुखी लिपि को गुरु रविदास जी महाराज ने ही इजाद किया था। गुरु रविदास जी महाराज और सभी 85% मूलनिवासियों के कवियों और लेखकों ने अपनी गुरुमुखी लिपि में लिखना शुरू किया था। यही रचनाएं तर्कसंगत और विवेकपूर्ण लगती हैं और मनुवादी साहित्य इन के सामने कहीं खड़ा नहीं हो पाता है।
राम सिंह आदवंशी।
महासचिव,
बहुजन मुक्ति पार्टी हिमाचल प्रदेश।

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